11 लाख करोड़ का भूकंप …क्या हिल जाएगी सरकार ?

केंद्र की मोदी सरकार चाहे कितना भी दिखावा करे, लेकिन अमेरिका-ईरान युद्ध का सीधा परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था पर हुआ है और वह रोज उजागर हो रहा है। सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में आए बड़े भूकंप के झटके ने इसी सच को दोबारा सामने ला दिया। सोमवार को ‘सेंसेक्स’ करीब १,८०० से अधिक अंकों तक गिर गया, जबकि ‘निफ्टी’ का सूचकांक २२ हजार के नीचे आ गया। इस भूकंप के झटके से निवेशकों के करीब ११ लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। कुल मार्वेâट वैâप ४१८ लाख करोड़ तक नीचे आ गया। किसी भी युद्ध का दूरगामी परिणाम देश की अर्थव्यवस्था पर होता है। पश्चिम एशिया का युद्ध अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच हो रहा है, लेकिन इसकी आंच भारत सहित पूरी दुनिया को ही लग रही है, क्योंकि ईरान ने ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से होनेवाले व्यापारिक आवागमन पर ही पाबंदी लगा दी है। इसके अलावा पश्चिम एशिया के अन्य देश भी ईरान के हमलों के कारण युद्धग्रस्त हो गए हैं। इसलिए वहां से भारत आने वाले कच्चे तेल और गैस के आयात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसका सबसे बड़ा झटका उद्योग क्षेत्र को लगा है। फिर यह
युद्ध रुकने के कोई लक्षण
नहीं हैं। इसके विपरीत, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच हमले, प्रति-हमले और धमकियां-चेतावनी कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही हैं। सोमवार की सुबह भारतीय शेयर बाजार के करीब ११ लाख करोड़ स्वाहा होने के पीछे यही कारण है। मोदी सरकार उठते-बैठते पांच ट्रिलियन इकोनॉमी का सपना दिखाती रहती है। मगर एक झटके में उड़े इन ११ लाख करोड़ ने यह सपना कितना दूर है, यही दिखा दिया है। एक झटके में शेयर बाजार के लाखों करोड़ रुपए उड़ जाते हैं, इसका अर्थ ही यह है कि भारत के आर्थिक-औद्योगिक निवेशकों की मानसिकता पर युद्ध और अन्य घटनाक्रम का बड़ा प्रभाव पड़ा है। ईरान युद्ध यह कारण तात्कालिक है, ऐसी चतुराई मोदी समर्थक अब करेंगे, लेकिन निवेशकों का यह विश्वास डगमगाने के पीछे सिर्फ युद्ध ही एकमात्र कारण नहीं है। डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिर ही रहा है। सोमवार को वह प्रति डॉलर ९३.८९ के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें भी बढ़ रही हैं। उसका भी प्रभाव आयात-निर्यात और रुपए के मूल्य पर पड़ रहा है। अनुमान है कि निकट भविष्य में
रुपया प्रति डॉलर
९५ तक गिरेगा। ईरान युद्ध की अनिश्चितता और रुपए की रिकॉर्ड गिरावट के अनुमान के चलते ही विदेशी निवेशक पिछले केवल १५ दिनों में भारतीय शेयर बाजार के करीब एक लाख करोड़ रुपए के शेयर्स बेचकर निकल गए हैं। ईरान युद्ध लंबा चला तो एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में इसका सर्वाधिक आर्थिक झटका भारत को लगनेवाला है। भारत का जीडीपी सीधे चार प्रतिशत तक गिर जाएगा, ऐसा अनुमान व्यक्त किया जा रहा है। पुन: यह अनुमान मोदी विरोधियों ने नहीं, बल्कि ‘मूडीज’ जैसी वैश्विक मान्यता प्राप्त संस्था ने जताया है। उसमें महंगाई और व्यापार घाटे के भड़कने एवं जनता की क्रय शक्ति कम होने का डर है। मोदी सरकार वैसे भी पांच ट्रिलियन इकोनॉमी और दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का शिगूफा छोड़ती रहती है। मगर ईरान युद्ध के कारण उत्पन्न आर्थिक चुनौतियां यह सरकार कैसे झेलेगी? विदेशी निवेश में लगी भयानक गिरावट और रुपए की तेज फिसलन को वैâसे रोकेगी? शेयर बाजार में सोमवार को हुए ११ लाख करोड़ के भूकंप से क्या मोदी सरकार हिलेगी? सरकार के बंद कान और आंखें क्या खुलेंगी?



