लेख

… ‘बिगड़ैल बच्चों’ से निपटना

लगभग 1 साल पहले पुणे के मामले में, जो लड़का रैश ड्राइविंग के लिए जिम्मेदार था, वह एक टीनएजर था जो अपनी महिला साथियों को दिखावा कर रहा था, जो ‘बिगड़ैल बच्चों’ के साथ आम बात है। भारत भर के शहरों से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें अमीर परिवारों के नौजवान, अपने माता-पिता या दादा-दादी के लाड़-प्यार में पले-बढ़े और ड्राइविंग लाइसैंस न होने के बावजूद महंगी कारें चलाने की इजाजत पाले हुए हैं। ऐसे ज्यादातर मामलों में एक और आम बात यह है कि ये युवा लड़के और उनके दोस्त शराब के बार में पैसे उड़ाते हैं, नशे में गाड़ी चलाते हैं, जिससे हर तरफ बहुत ज्यादा नुकसान होता है।  हमारे देश में अमीर और ताकतवर लोगों को बहुत ज्यादा सुविधा है। जब वे कानून तोड़ते हैं, तो उनके माता-पिता उन ‘बड़ों’ को सजा देने की बजाय, नेताओं, वकीलों और अपने पैसे से गुनहगारों को बरी करवा देते हैं! इस तरह के हक की भावना और कानूनों के प्रति हमेशा बेइज्जती की भावना, जो आसानी से समझ आने वाले युवाओं में पैदा होती है, मजबूत हो जाती है।

इससे निपटने के लिए सीनियर अधिकारियों को ऐसी घटनाओं की जगह पर तुरंत जाने का काम सौंपा जाना चाहिए। पुलिस मैनुअल, जिसमें ए.एस.पी. या एस.डी.पी.ओ. (सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर) की ऐसी ‘विजिट्स’ को जरूरी बनाया गया था, अब उसमें उन कार एक्सीडैंट्स को भी शामिल किया जाना चाहिए, जिनमें अमीर परिवारों के कम उम्र के युवा शामिल हों या मीडिया या आम जनता द्वारा उनके शामिल होने का आरोप लगाया गया हो। सीनियर सुपरवाइजिंग ऑफिसर को घटनास्थल पर जल्दी भेजने से लोकल पुलिस के पैसे के दम पर असर पडऩे की संभावना काफी कम हो जाती है। कई परिवार दो नहीं, बल्कि 4 या उससे भी ज्यादा लग्जरी कारों की शान दिखाते हैं। उनके बच्चे इन कारों के ज्यादा दीवाने हैं और रोजमर्रा की बातचीत में खुलेआम इनकी कीमत बताते हैं। इससे उन्हें स्कूल और बाजार में अपने दोस्तों के साथ ज्यादा फायदा होता है। क्योंकि माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए बहुत कम समय होता है, इसलिए ‘बिगड़ैल बच्चे’ गैराज में छाए रहते हैं। ड्राइवर अपने छोटे मालिकों को लाड़-प्यार करते हैं। वे उन्हें गाड़ी चलाना सिखाते हैं, भले ही कानूनी तौर पर वे उस उम्र तक नहीं पहुंचे, जहां कानून कहता है कि वे ऐसा कर सकते हैं।

कानपुर के तम्बाकू टाइकून के बेटे को टैलीविजन पर दो हट्टे-कट्टे आदमियों द्वारा ड्राइवर सीट से उठाते हुए देखा, जिन्हें टैलीविजन चैनल ने ‘बाऊंसर’ बताया, लेकिन जो साफ तौर पर उनके प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड थे। आम लोग भी इस तमाशे के गवाह थे। फिर भी, टाइकून के वकील को लगा कि थोड़ी सी मदद से कहानी को आसानी से बदला जा सकता है! कम उम्र के लड़कों की वजह से सड़क पर बेगुनाह लोगों की मौत की घटना से तुरंत निपटना होगा। इसमें प्यार करने वाले माता-पिता की लापरवाही शामिल है, जिन्हें अपने बच्चों को उनके पिता की दौलत पर पैसे लुटाने की बजाय अच्छे संस्कार सिखाने चाहिए थे। ड्राइवर ही वह चुना हुआ ग्रुप है, जिसमें से बलि का बकरा ढूंढा जाता है। अगर उन्हें जेल जाना पड़े तो बड़े लोग उनका और उनके परिवारों का ख्याल रखते हैं। बेगुनाह ड्राइवरों को सजा से बचाने के लिए सरकार को इस खतरे को रोकने के लिए कुछ नया सोचना होगा। 

एक तरीका जो दिमाग में आता है, वह है सजाओं की सूची में जेल या जुर्माने के अलावा एक और क्लॉज जोडऩा। यह सजा, जिसे मैजिस्ट्रेट या जज को लगाने की इजाजत होनी चाहिए, वह है माता-पिता को ट्रैफिक ट्रेङ्क्षनग इंस्टीच्यूट में एक महीने या उससे भी ज्यादा समय के लिए वर्कशॉप में शामिल होने के लिए ‘इनवाइट’ करना, जहां देश के कानूनों का सम्मान करना सिखाया जाता है। कम उम्र के उल्लंघनकत्र्ताओं को अपने माता-पिता के साथ वर्कशॉप में शामिल होना चाहिए। जब मैं यह आॢटकल लिख रहा था, तो मैंने एक न्यूज चैनल पर सुना कि दिल्ली कैपिटल रीजन में 17 साल का एक लड़का अपने पिता की स्कॉॢपयो एस.यू.वी. को लापरवाही और गलत तरीके से चला रहा था, उसकी बहन उसकी बगल में बैठी थी। बहन का काम था कि वह गाड़ी चलाते समय अपने भाई की रील बनाए। वह अपने दोस्तों को इम्प्रैस करने के लिए यह रील अपने सोशल मीडिया अकाऊंट पर पोस्ट करता था।

इससे पहले भी गाड़ी का कई बार ड्राइविंग नियमों के उल्लंघन के लिए चालान कटा था, ज्यादातर तेज गाड़ी चलाने के लिए। पिता ने जाहिर है अपने बेटे की इन गलतियों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस बार पिता को ध्यान देना पड़ा क्योंकि लड़के ने सड़क की गलत साइड पर गाड़ी चलाई और सीधे एक आती हुई कैब और एक टू-व्हीलर को टक्कर मार दी, जिससे गाड़ी पलट गई। इस वजह से साहिल नाम के 23 साल के लड़के की मौत ने एक न्यूज चैनल का ध्यान खींचा, जिसने एक वीडियो हासिल किया, जिसमें पूरा मामला दिखाया गया था और उसे सभी को अपनी स्क्रीन पर दिखाया। चैनल ने कसम खाई है कि जब तक इंसाफ नहीं हो जाता, वे इस मामले को आगे बढ़ाएंगे।

अब समय आ गया है कि अधिकारी समझें कि सार्वजनिक सड़कों का इस्तेमाल करने वाले आम लोग भी इस देश के उतने ही नागरिक हैं, जितने अमीर और ताकतवर लोग, जिन्हें गरीबों की जान की कोई कीमत नहीं लगती। इस मामले में लड़के के पिता से पुलिस ने पूछताछ की और अनजान वकीलों की कानूनी सलाह पर उन्हें छोड़ दिया। और एक साथी इंसान की हत्या करने के बावजूद अपराधी को परीक्षा में बैठने दिया गया!-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)

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