संपादकीय

युद्ध की हवाई पट्टी

प्रधानमंत्री मोदी ने असम के डिब्रूगढ़ में, पूर्वोत्तर की, प्रथम आपात हवाई पट्टी पर सी-130 जे विमान से लैंडिंग की, तो वह प्रथम विश्व नेता, प्रथम शासनाध्यक्ष बन गए। यह कीर्तिमान बड़ी उपलब्धि है, बहुअर्थी है। हमारे राफेल, सुखोई-30 और तेजस लड़ाकू विमानों ने भी आपात हवाई पट्टी को छुआ और फिर वे उड़ गए। यह 40 मिनट का युद्धाभ्यास वहां से 200 किलोमीटर दूर चीन ने भी देखा होगा और विश्व के कई देश चौकन्ने हुए होंगे! प्रधानमंत्री मोदी ने हवाई पट्टी का औपचारिक उद्घाटन किया और वह युद्धाभ्यास के साक्षी भी बने। दुनिया के सर्वप्रथम प्रधानमंत्री की यह लैंडिंग सिर्फ चुनावी, राजनीतिक नेरेटिव ही नहीं है, बल्कि यह युद्धाभ्यास हमारी रक्षा तैयारियों, सामरिक शक्ति, प्रौद्योगिकी सक्षमता और बेशक राष्ट्रीय सुरक्षा कवच का प्रदर्शन भी है। आत्मनिर्भर भारत की अभिव्यक्ति भी है। यह वायु रक्षा मोर्चेबंदी और आपात हवाई पट्टी इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि युद्ध की शैली बदलती जा रही है। अब दुश्मन सबसे पहले वायुसेना बेस, अड्डों और ठिकानों पर हमले कर दुश्मन देश की वायुसेना को विकलांग करता है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों और मिसाइलों ने पाकिस्तान के प्रमुख एयरबेसों पर हमले कर उन्हें ध्वस्त कर दिया था। एयरबेसों में गहरे गड्ढे कर दिए थे। बहुत कुछ मिट्टी-मलबा हुआ था। बताया जाता रहा है कि हमारे विमानों ने दुश्मन के 9 एयरबेस, रडार, अवॉक्स सिस्टम आदि ऐसे तबाह किए थे कि वहां से वायुसेना ऑपरेशन को करना और एयरबेस को युद्ध के लिए हमलावर बनाने में लंबा वक्त लगेगा। हालांकि चीन के साथ हमारे संबंध बदल और सुधर रहे हैं, लेकिन चीन एक प्रतिद्वंद्वी, अविश्वसनीय देश रहा है, लिहाजा भारत में ही सत्ता और सियासत का एक वर्ग उसे ‘दुश्मन नंबर वन’ मानता रहा है। बहरहाल 4.2 किमी लंबी यह हवाई पट्टी, राष्ट्रीय राजमार्ग 37 पर, 100 करोड़ रुपए की लागत से बनाई गई है। इस पर 40 टन के लड़ाकू विमान उतर सकेंगे। यहां से 74 टन के परिवहन विमान भी ऑपरेट किए जा सकेंगे। युद्ध या किसी भी आपात स्थिति में बचाव और सैन्य ऑपरेशन तुरंत संभव हो सकेंगे। उप्र के पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर भी आपात हवाई पट्टी बनाई गई थी। वहां भी प्रधानमंत्री ने लैंडिंग की थी। दरअसल ऐसी सामरिक तैयारियां दर्शाती हैं कि भारत में रक्षा उत्पादन और सैन्य रणनीति की दुनिया ही बदल चुकी है।

बेशक 2026-27 के बजट में 7.85 लाख करोड़ रुपए रक्षा मंत्रालय को आवंटित करना एक राष्ट्रीय, सालाना औपचारिकता हो सकती है, लेकिन भारत का अपना रक्षा उत्पादन 2024-25 में 1.54 लाख करोड़ रुपए से अधिक का रहा, जो एक कीर्तिमान है और 2014-15 की तुलना में 174 फीसदी अधिक है। भारत ने 23622 करोड़ रुपए के ब्रह्मोस मिसाइल, डोर्नियर-228 विमान, बुलेटप्रूफ जैकेट, चेतक हेलीकॉप्टर, हल्के टॉरपीडो, इंटरसेप्टर नौकाएं और गोला-बारूद आदि 100 से अधिक देशों को निर्यात किए हैं। अमरीका और फ्रांस सरीखे देश भी हमारे रक्षा-सामान के खरीददार हैं। क्या यह सामरिक रूप से आत्मनिर्भर होते भारत का बिंब नहीं है? युद्धाभ्यास में जिस तेजस लड़ाकू विमान ने भी हिस्सा लिया, वह स्वदेशी, भारतीय विमान है। अब देश में राफेल लड़ाकू विमान के 60 फीसदी कल-पुरजे, उपकरण आदि का निर्माण और उत्पादन भी भारत में ही होगा। यह फ्रांस के साथ 114 राफेल विमानों के नए करार में निहित है, लिहाजा 96 राफेल विमान भारत में ही बनाए जाएंगे। शेष 18 विमान फ्रांस से निर्मित होकर आएंगे। भारत ने 2029 तक 3 लाख करोड़ रुपए तक रक्षा उत्पादन को बढ़ाने और निर्यात को 50,000 करोड़ रुपए तक ले जाने का लक्ष्य तय किया है। इस बार बजट में 2.19 लाख करोड़ रुपए का पूंजीगत बजट भी रखा गया है, ताकि हथियारों, मिसाइलों, विमानों, ड्रोन और सेनाओं की अन्य शक्तियों आदि का पर्याप्त आधुनिकीकरण किया जा सके। उन्हें मजबूती दी जा सके। गौरतलब यह है कि घरेलू रक्षा उत्पादन बढऩे से आयात पर निर्भरता कम हुई है। इस तरह 16,000 से अधिक लघु, सूक्ष्म, मध्यम उद्यमों को रक्षा उत्पादन क्षेत्र में जोड़ा जा सका है। बेशक भारत रक्षा उत्पादन में भी एक महाशक्ति बनता जा रहा है। भारत को जहां रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी है, वहीं उसे रक्षा निर्यात को भी बढ़ाना है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद हमारी मिसाइलों की विदेशों में मांग बढ़ी है। रक्षा निर्यात में उछाल भी आया है। मिसाइलों के अलावा अन्य सैन्य हथियार भी निर्यात किए जा रहे हैं। इससे भारत को पर्याप्त आय भी होगी, जिससे सेना के खर्चे पूरे करने पर व्यय किया जा सकता है। संभावना है कि भारत जल्द ही रक्षा उत्पादन और निर्यात में नए मुकाम हासिल करेगा और उसकी सैन्य शक्ति में बढ़ोतरी होगी।

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