संपादकीय

उड़ते ‘ताबूत’ का रहस्य …दादा कैसे गए?

अजीत पवार के असामयिक निधन का शोक और सूतक समाप्त हो चुका है। हिंदू शास्त्रों और रीति-रिवाजों के अनुसार तेरहवीं की रस्में पूरी हुईं और सुनेत्रा पवार ने उप मुख्यमंत्री का पदभार स्वीकार किया। प्रफुल्ल पटेल और अन्य लोगों ने दादा की मृत्यु के तीसरे दिन यानी सूतक के दिन ही श्रीमती पवार को शपथ दिलाई। इस पर समाज में बेचैनी का माहौल था। हालांकि, सुनेत्रा पवार और उनकी पार्टी अब अपना शोक भुलाकर अपने कर्तव्यों में लग गए हैं, लेकिन महाराष्ट्र की जनता के मन में अभी भी यह संदेह बना हुआ है कि दादा की दुर्घटना के पीछे कुछ साजिश है। कल दादा के भतीजे और विधायक रोहित पवार ने जोरदार प्रस्तुति देते हुए इस दुर्घटना के पीछे किसी रहस्य की ओर इशारा किया, जिससे हलचल मच गई है। रोहित पवार ने विश्वास के साथ कहा कि बारामती हवाई अड्डे के पास अजीत पवार की विमान दुर्घटना महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश थी। रोहित पवार ने इस बारे में स्पष्ट प्रस्तुति दी। इसमें उन्होंने पायलटों, निजी विमानों के प्रबंधन, उनकी लापरवाही, झूठ, छिपाव, पायलटों की अक्षमता और अन्य संदिग्ध राजनीतिक मामलों को उजागर किया। पवार ने खराब मौसम और लो विजिबिलिटी के कारण विमान के रनवे पर लैंडिंग न कर पाने जैसी बातों को झूठा बताया। विमान में अचानक तकनीकी खराबी वैâसे आ गई और पायलट को इसकी जानकारी पहले से क्यों नहीं थी? यह विमान पिछली रात गुजरात गया था और वहां से अजीत पवार को बारामती ले जाने के लिए मुंबई आया था। यह खुलासा कि निजी विमानों के मेंटेनेंस संबंधित कंपनी प्रफुल्ल पटेल की है, चौंकाने वाला है। अगर यह सच है तो रोहित पवार द्वारा उठाए गए मुद्दों की
जांच किसी तीसरी एजेंसी
द्वारा करना आवश्यक है और यह जांच किसी भारतीय एजेंसी द्वारा कराए जाने से एक और घोटाले की संभावना बढ़ जाती है। दुर्घटना से एक मिनट पहले विमान का ट्रांसपोंडर बंद कर दिया गया था। जिस एयरलाइन के विमान में अजीत पवार ने दुर्घटना वाले दिन यात्रा की थी, उस पर यूरोप में संचालन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। तो फिर इस कंपनी को भारत में ‘ताबूत’ उड़ाने का लाइसेंस किसने दिया? अगर कोई बस चालक दुर्घटना का कारण बनता है तो उसके खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया जाता है, लेकिन इतनी भयानक दुर्घटना के बावजूद एयरलाइन के मालिक पर गैर इरादतन हत्या का आरोप नहीं लगाया जाता है और फडणवीस कहते हैं, ‘दादा की दुर्घटना का राजनीतिकरण करोगे तो याद रखें।’ फडणवीस इस तरह की बयानबाजी करके किसे बचा रहे हैं? एयरलाइन का मालिक आपका कौन है? यह पहला सवाल है और किन राजनीतिक नेताओं की इस एयरलाइन में बेनामी भागीदारी है? यह है दूसरा सवाल। अजीत पवार एक दिन पहले कार से ही बारामती जाने वाले थे। शाम को उनकी गाड़ियों का काफिला ‘देवगिरी’ बंगले के बाहर जमा हो गया था, लेकिन पूर्वी विदर्भ के एक बड़े नेता ने दादा को इंतजार करने के लिए कहा। ‘एक जरूरी फाइल पर हस्ताक्षर करना ही होगा, मैं पहुंच रहा हूं’ कहने के बाद, वे सज्जन दो-तीन घंटे देरी से पहुंचे और दादा का कार से बारामती जाना रद्द हो गया। पूर्वी विदर्भ का यह नेता कौन है? या वह कौन है जिसने दादा को दो-चार घंटे तक इंतजार करवाया और उन्हें अगले दिन ‘ताबूत’ टाइप विमान से जाने के लिए मजबूर किया? सवाल यह है कि अजीत पवार के सामने कौन सी ऐसी जरूरी फाइल आने वाली थी जिस पर अगर उन्होंने तुरंत हस्ताक्षर नहीं किए होते तो महाराष्ट्र की प्रगति रुक ​​जाती?
फाइल का मामला
चूंकि रोहित पवार ने उठाया है इसलिए इसे फिर से कहना चाहिए। ‘हमारे पास भाजपा के घोटालों और सिंचाई भ्रष्टाचार की फाइल है। अगर इसका खुलासा हुआ तो विस्फोट हो जाएगा,’ अजीत दादा के इस बयान के बाद से ही उन पर जमकर निशाना साधा जा रहा था। इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि पूर्वी विदर्भ का भाजपा नेता दुर्घटना से एक रात पहले फाइल पर हस्ताक्षर कराने आया था या दादा से भाजपा के भ्रष्टाचार की फाइल छीनने। पूर्वी विदर्भ का वह नेता कौन है, जिसने पवार को इतने घंटों तक रोके रखा? अगर रोहित पवार उसका नाम बता दें तो संदेह दूर हो जाएगा। मुख्यमंत्री कहते हैं कि अजीत पवार की दुर्घटना का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। तो क्या फिर इस मामले को दबा देना चहिए और अपराधियों को अगले शिकार के लिए खुला छोड़ देना चाहिए? देवेंद्र फडणवीस को अपने कार्यों से यह दिखाना चाहिए कि वे अजीत पवार जैसे मित्र को खोने से दुखी हैं। गोपीनाथ मुंडे की आकस्मिक मृत्यु पर लोगों को संदेह था और अब लोग अजीत पवार विमान दुर्घटना पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं। पवार परिवार गुहार लगा रहा है और सबूत दे रहा है कि अजीत पवार का ‘कांटा’ इजरायल की मोसादी पद्धति से निकाला गया। सुनेत्रा पवार और अजीत दादा के बच्चे दुख भूलकर काम में व्यस्त हो गए हैं। प्रफुल्ल पटेल, तटकरे, मुश्रीफ और दादा के अन्य सहयोगी भी राजनीतिक गतिविधियों में जुटते नजर आ रहे हैं, लेकिन सूरत से मुंबई आए ‘उड़ते ताबूत’ ने अजीत पवार की जान ले ली। वह साजिश ही थी यह साबित करने की कोशिश रोहित पवार ने की। उन्होंने इसके लिए खूब मेहनत और स्टडी की। वे दादा के निधन के सदमे से उबर नहीं पाए हैं। महाराष्ट्र का दिल भी इसी गम में डूबा है!

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