संपादकीय

संविधान के प्रति राजनीतिक जागरूकता पर्याप्त नहीं…

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। ब्रिटिश आधिपत्य से स्वाधीनता के समय भारत के नेतृत्व ने भावी पीढ़ियों के शासन-प्रशासन हेतु एक संविधान का निर्माण किया। दो वर्ष, 11 महीने और 18 दिन तक संविधान सभा की बैठकें हुईं। उसके परिणामस्वरूप हमें विश्व का विशालतम संविधान प्राप्त हुआ।

नौ दिसंबर 1946 से प्रारंभ कर 26 नवंबर 1949 तक हमारे संविधान निर्माताओं ने भारत के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक जीवन के विभिन्न आयामों पर वृहद विचार विमर्श किया। उन्होंने विश्व के अनेक विद्यमान संविधानों का भी गहन अध्ययन किया और भारत के संविधान में संसार भर के संविधानों के श्रेष्ठ और स्वीकार्य तत्व सम्मिलित किए गए। इस प्रकार भारत का संविधान ऐसा अभिलेख बन गया जो विश्व की श्रेष्ठतम लोकतांत्रिक संस्थाओं और परंपराओं का सहज समावेश करता है।

भारतीय संविधान की निर्मिति में संलग्न लगभग 300 व्यक्तियों की ओर दृष्टिपात करें तो यह ध्यान में आता है कि तत्कालीन भारत की श्रेष्ठतम मेधा, मनीषा, प्रतिभा संविधान सभा में उपलब्ध थी। वह संविधान सभा अनेक विचारधाराओं, क्षेत्रों, मतावलंबियों, भाषा-भाषियों, आजीविकाओं, समुदायों, संप्रदायों, राज-व्यवस्थाओं और रुचियों का प्रतिनिधित्व करती थी।

वहां राजनेता, साहित्यकार, लेखक, उपन्यासकार, दार्शनिक, वकील, चिकित्सक, किसान, आदिवासी सभी प्रकार के व्यक्ति थे। उन सबने लगभग प्रत्येक शब्द, प्रत्येक अनुच्छेद, प्रत्येक संस्था और प्रत्येक नियम-विधि पर गहन और गंभीर वाद विवाद भी किया। इसका ही परिणाम हुआ कि भारतीय संविधान अपनी प्रस्तावना में ही अपने दार्शनिक मूल्यों और व्यावहारिक आधार की स्पष्ट उद्घोषणा करता है। वह एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना का उद्घोष करता है।

कालांतर में 1976 में आंतरिक आपातकाल में यहां पंथनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द भी जोड़ दिए गए। यह संविधान भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के साथ-साथ विचार अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास तथा उपासना की स्वतंत्रता तथा स्तर और अवसर की समानता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह संविधान भारत के नागरिकों में आपसी बंधुता बनाए रखने को कटिबद्ध है। यह भारत की राष्ट्रीय एकता और अक्षुण्णता बनाने के लिए संकल्पित है।

भारतीय संविधान अपने चरित्र में कठोरता और नमनीयता के सम्मिश्रण से युक्त है। वह समकालीनता की अपेक्षाओं और परिवर्तनशील युगीन आकांक्षाओं के अनुरूप स्वयं को रूपांतरित करने में सक्षम है। वह अनेक प्रविधानों और उपबंधों के रूप में सामाजिक परिवर्तन का प्रमुखतम संवाहक भी बन गया है। वह भारत के प्रशासनिक नियमन का मुख्यतम स्रोत तथा आधार है। वह देश के सभी राजनीतिक तथा शासकीय संस्थानों का दिशा निर्देशक उपकरण है।

वह भारत की सांस्कृतिक परंपरा की रक्षा के भी प्रयास करता है तो आधुनिकता के आग्रहों का भी यथेष्ट सम्मान करता है। भारत का संविधान अपने 395 अनुच्छेदों, 22 भागों तथा 12 अनुसूचियों में भारतीय सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन के अनेक प्रश्नों को संबोधित करता है। भारतीय संविधान ने लगभग सवा सौ संशोधनों के माध्यम से स्वयं को नवीन आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला है। भारतवर्ष के नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति, धार्मिक मान्यता आदि के अधिकार संविधान से ही प्राप्त होते हैं।

इन मौलिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व भी संविधान भारतीय न्यायपालिका को प्रदान करता है। भारत में एक स्वतंत्र न्यायपालिका इस संविधान की व्याख्या और रक्षा के पुनीत अधिकार से संपन्न है। नागरिकता के प्रश्न भी भारतीय संविधान ही संबोधित करता है। एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन आयोग की संकल्पना संवैधानिक लोकतंत्र की संरचनात्मक आश्वस्ति बनती है। भारतवर्ष की वित्तीय संरचना, कार्यप्रणाली और व्यवहार के स्वायत्त पर्यवेक्षण, निरीक्षण तथा अंकेक्षण हेतु एक नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की व्यवस्था भी संविधान करता है।

राज्य अपनी नीति-निर्माण प्रक्रिया में किन मूल्यों तथा सिद्धांतों को ध्यान में रखे – इसके लिए राज्य के नीति निर्देशक तत्वों की व्यवस्था की गई है। संसदीय प्रणाली के अंतर्गत विभिन्न संस्थाओं, उपकरणों, अधिकरणों आदि का गठन करते हुए भारतीय संविधान आधुनिक भारत का सर्वप्रमुख नीतिग्रंथ और मार्गदर्शन केंद्र बन गया है।

आधुनिक समय में 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाए जाने की घोषणा के बाद से दसेक वर्षों में भारतीय संविधान के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है। गणतंत्र दिवस पर भी हम अपने संविधान निर्माताओं का श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। साथ ही इस दिन हम संविधान के प्रति अपने सम्मान और निष्ठा की शपथ भी लेते हैं। परंतु फिर भी प्रायः संविधान को मात्र विधि, न्यायालय, राजनीति विज्ञान तथा राजनीतियों की विषयवस्तु मान लिया जाता है।

जबकि सत्य और तथ्य यह है कि हमारे जीवन के लगभग प्रत्येक आयाम को भारतीय संवैधानिक व्यवस्था स्पष्टतः स्पर्श करती है। इसलिए भारतीय संविधान के प्रति जागरूकता हमारी सामूहिक आवश्यकता है। कतिपय लोगों द्वारा प्रतिदिन ‘संविधान पर खतरा’, ‘संविधान से छल’, ‘संविधान का विरोध’, ‘संविधान की धज्जियां’ आदि नारे लगाकर भ्रम उत्पन्न किया जाता है। संविधानिक निकायों में संविधान की प्रतियां लहराई जाती हैं। ऐसे में यह जानना अनिवार्य है कि संविधान में वास्तव में क्या लिखा है- यह समझना आवश्यक है।

संविधान को वस्तुतः किससे खतरा है, किसने संविधान पर असली हमला किया, कौन संविधान की धज्जियां उड़ाता रहा है, ऐसे प्रश्नों को ठीक से परखना जरूरी है। वास्तव में हमारे अधिकार क्या और कौन-कौन से हैं? हमारे राष्ट्रीय कर्तव्य क्या हैं? हमारी संवैधानिक संस्थाएं कैसी हैं? हमारे संविधान की व्याख्या कौन करता है और कैसे करता है? इस संविधान का आत्मा क्या है? हमारा संविधान विश्व में श्रेष्ठतम कैसे है? इन सभी प्रश्नों और जिज्ञासाओं का समाधान यह मानना प्रारंभ करने में है कि यह मेरा संविधान है। मेरा स्वाभिमान है। यह भारत का स्वाभिमान है!

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button