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 ‘अडानीस्तान’ बनती हुई मुंबई …

बई समेत २९ नगरपलिकाओं के नतीजे भारी अफरा-तफरी और अराजकता के बीच घोषित हुए। मतगणना की गड़बड़ी देर रात तक जारी ही है। भारत की निगाहें महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई पर टिकी थीं। प्रचंड भ्रष्टाचार, स्याही घोटाला, ईवीएम घोटाला, धन वितरण, बोगस और डबल मतदान के बल पर उद्योगपति अडानी की भाजपा ने मुंबई पर कब्जा जमाने की कोशिश शुरू कर दी है। पूरे नतीजे घोषित होने से पहले ही भाजपा द्वारा शुरू किया गया जश्न भी चुनावी घोटाले का हिस्सा है। यह महाराष्ट्र और मराठी माणुस के लिए एक चेतावनी है। अगर सत्ता, पैसा और चुनाव आयोग ही कठपुतलियों की भूमिका निभा रहे हैं तो चुनावों में किसी भी ऐरे-गैरे की लहर आ सकती है। इन लहरों और हलचलों का कोई मतलब नहीं है। मुंबई समेत २६ नगरपालिका में भाजपा की लहर आई और उस लहर पर सवार होकर ‘शाहसेना’ जैसे ‘ऐरे-गैरे’ किनारे लग गए। चूंकि ‘न विचार न भूमिका’ सूत्र है इसलिए अब किसी भी चुनाव का कोई मतलब नहीं रह गया है। भाजपा और शाहसेना ने सौ का आंकड़ा पार कर लिया है। हालांकि, शिवसेना-मनसे ने जबरदस्त टक्कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग और सरकार की मनमानी ने घात कर दिया। सैकड़ों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर सके और चुनाव आयोग अजगर की तरह पड़ा रहा। मोदी के अमृतकाल में न तो अदालतों में न्याय मिलता है और न ही चुनावों में निष्पक्ष परिणाम। मतदाताओं को पैसों का चस्का लगाकर संपूर्ण चुनाव पर ही कब्जा कर लेने का नया तंत्र यह आज लोकतंत्र की नहीं परिभाषा तैयार की जा चुकी है। मतदान के २४ घंटे बीत जाने के बाद भी आयोग और पालिका आयुक्त मतदान प्रतिशत नहीं बता सके, लेकिन जब मतदाता कतारों में खड़े थे उस दौरान भाजपा के सहूलियत वाले एग्जिट पोल समाचार चैनलों पर दिखाए जा रहे थे।
आचार संहिता उल्लंघन का यह नया चमत्कार
जनता ने देखा। चुनाव अधिकारी खुलेआम मतदाताओं के नाम खोजने के लिए ‘भाजपा ऐप’ का इस्तेमाल कर रहे थे। चुनाव अधिकारी मतदान केंद्रों पर बैठकर भाजपा की खुलेआम मदद कर रहे थे और अगर चुनाव आयोग इस संबंध में शिकायतों का संज्ञान नहीं लेता है तो इसके आगे चुनाव कराने के बजाय विधायकों, सांसदों और नगरसेवकों को सीधे नियुक्त करके सदन में भेजा जाना चाहिए। मुंबई समेत २९ नगरपालिका के चुनाव इतने घिनौने तरीके से कराए गए। मराठी माणुस को धत्ता बताकर भाजपा का मुंबई में ‘अडानी’ प्रायोजित महापौर लाने का महाराष्ट्रद्रोही सपना था और उसने यह सपना सिरफिरे औलाद मिंधे की मदद से इसे पूर्ण करने कोशिश की, यह बात महाराष्ट्र के इतिहास में हमेशा के लिए काले अक्षरों में लिखी जाएगी। १०६ शहीदों के बलिदान से मराठी माणुस को जो मुंबई मिली थी वह शिंदे जैसे लोगों की बेईमानी के कारण हाथ से चले जाने की नौबत आ गई, लेकिन हम यह नहीं होने देंगे। अगर यह जीत चोरी से खरीद-फरोख्त से हासिल हुई है तो यह साफ है कि गौतम अडानी, अमित शाह और उनकी भाजपा मुंबई को खरीद-फरोख्त की उस योजना को मिंधे के जरिए साकार करने की कोशिश में हैं। ठाणे में मिंधे, छत्रपति संभाजीनगर पर भाजपा, नासिक, पुणे, पिंपरी-चिंचवड़, जलगांव और धुले की नगरपालिका पर भाजपा का नियंत्रण हो गया। अजीत पवार की घड़ी बंद पड़ गई। लातूर में कांग्रेस और वंचित सत्ता में आसीन हुए। मराठवाड़ा के परभणी में शिवसेना का विजयी ध्वज फहराना खुशी की बात है। कांग्रेस और वंचित ने इन चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन मुंबई में वे २५ सीटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर सके। डॉ. आंबेडकर का दृढ़ मत था कि महाराष्ट्र अखंड और मुंबई
मराठी माणुस के हाथ में ही
रहे। उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी प्रकाश आंबेडकर ने एक अलग मार्ग अपनाया। कांग्रेस-वंचित गठबंधन को लातूर को छोड़कर कहीं अधिक सफलता नहीं मिली। प्रकाश आंबेडकर के गढ़ अकोला में भाजपा की पैठ की तस्वीर विचारोत्तेजक है। भारतीय जनता पार्टी का भ्रष्ट और अहंकारी रुख सबको निगल रहा है। सबको निगलने के बाद यह मुंबई और फिर विदर्भ को भी निगल जाएगा। आज भाजपा की जीत का जश्न मना रहे ये मराठी मिंधे महाराष्ट्र की आनेवाली पीढ़ियों को बर्बाद करने में योगदान दे रहे हैं। भाजपा और इन मिंधे ने धन का उपयोग किया। इस हराम के धन से महाराष्ट्र और मराठी जनता की पीठ में छुरा घोंपा गया। यह छत्रपति शिवाजी का राज्य है। हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे ने यहां के मराठी माणुस को स्वाभिमान और अस्मिता की बाल घुट्टी पिलाई थी। भाजपा के मिंधों ने उस बाल घुट्टी में जहर मिलाने का काम किया। अब महाराष्ट्र की गौरवशाली राजधानी मुंबई का भविष्य क्या है? यहां के मराठी मानूस का समर्थन किसका है? मुंबई पर हो रहे हमलों और अतिक्रमणों को कौन रोकेगा? क्या मुंबई के ‘अडानीस्तान’ बनते जाने के दौरान इस पानीपत का मराठी ध्वज रह पाएगा? कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। इनके जवाब तो समय ही बताएगा, लेकिन शिवसेना-महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विरोध में योगदान देनेवालों ने मुंबई में हुतात्मा स्मारक के लिए सौदा किया। मुंबई के ‘अडानीस्तान’ बनने के दौरान वे १०६ शहीद न सिर्फ आंसू बहाएंगे, बल्कि इसी मुंबई में अगले संघर्ष के लिए पुनर्जन्म लेंगे। बेहद विपरीत परिस्थितियों में शिवसेना और मनसे ने संघर्ष किया, दांव लगाया। एक कठिन लड़ाई लड़ी गई। यह लड़ाई जारी रहेगी। मुंबई और मराठी अस्मिता की लड़ाई नहीं रुकेगी!

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