उत्कृष्टता की ओर अग्रसर स्वदेशी रक्षा प्रणाली

उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बन रहे दो रक्षा उत्पादन केंद्रों ने निजी और सरकारी क्षेत्र के निर्माण को गति दी है। भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में रुपए 21083 करोड़ का ऐतिहासिक रक्षा निर्यात किया, जो गत वर्ष की तुलना में 32.5 प्रतिशत अधिक है…
आधुनिक युग में विश्व के किसी भी राष्ट्र की महत्ता जिन शक्तिशाली संसाधनों के आधार पर निर्धारित होती है, उनमें युद्धक अस्त्र-शस्त्र प्रथम हैं। भारत के संदर्भ में विचार किया जाए तो गत साढ़े आठ दशकों से इस दिशा में यहां उत्तरोत्तर प्रगति होती रही। हमारे रक्षा वैज्ञानिकों, अनुसंधानकर्ताओं तथा अन्यान्य संबद्ध कर्मचारियों ने राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ मिलकर इस संबंध में अविस्मरणीय कार्य किए हैं। विशेषकर गत चौदह-पंद्रह वर्षों में रक्षा अनुसंधान, निर्माण, उत्पादन, मित्र राष्ट्रों के साथ सहयोग पर आधारित आधुनिक रक्षण प्रणालियों की खोज व निर्माण तथा अंतत: रक्षा उपकरणों के निर्माण में आत्मनिर्भर होने के बाद निर्यात में भी अग्रिम पंक्ति के देशों में सम्मिलित होने की उपलब्धि सराहनीय है। भारत की स्वदेशी रक्षा प्रणाली पिछले एक दशक में ‘आयात निर्भरता’ से ‘आत्मनिर्भरता’ की ओर तीव्रतापूर्वक बढ़ी है। सन 2026 तक भारत ने रक्षा क्षेत्र में न केवल अपनी तकनीकी व प्रौद्योगिकीय क्षमता को सिद्ध किया है, बल्कि हमारा देश वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख रक्षा निर्यातक के रूप में भी उभरा है। आज यहां आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों का बड़े पैमाने पर नवोन्नत ढंग से निर्माण हो रहा है। नित नवीन स्वदेशी रक्षा प्रणालियां विकसित की जा रही हैं। इस क्षेत्र में मित्र देशों के साथ खोज से लेकर उत्पादन तक उपयोगी साझेदारियां भी की जा रही हैं। वर्तमान में देश की आधुनिक प्रक्षेपास्त्र (मिसाइल) प्रणाली एक बड़ी उपलब्धि है। यह प्रक्षेपास्त्रीय तकनीक विश्व की सबसे उन्नत प्रणालियों में से एक है। इस उन्नतिकरण में ‘इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ की विशाल भूमिका रही है।
इसके अंतर्गत अग्नि-5 और अग्नि-6 अति उल्लेखनीय है। इस वर्ष तक भारत की अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता अत्यधिक परिष्कृत हो चुकी है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित अग्नि-5 की मारक क्षमता 5000 किलोमीटर से अधिक है। इस प्रयास से प्रेरित होकर अब अग्नि-6 का निर्माण हो रहा है, जो मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल रीएंट्री व्हीकल तकनीक से युक्त है। गत वर्ष मई माह में ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के साथ हुए अल्पावधि के युद्ध में देशवासियों ने ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र का युद्धक प्रदर्शन देखा ही था, कि कैसे इस वायु अस्त्र ने शत्रु देश के चिन्हित ठिकानों को ध्वस्ताधूत किया था। ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। भारत अब इसके हाइपरसोनिक संस्करण ब्रह्मोस-दो पर काम कर रहा है, जो मैक 7 से अधिक गति प्राप्त करने में सक्षम है। प्रलय मिसाइल का भी उल्लेख हो रहा है। यह एक कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे विशेष रूप में पारंपरिक युद्ध के लिए डिजाइन किया गया है। यह चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर भारत की आक्रामक क्षमता में वृद्धि करती है। राष्ट्र की वायु रक्षा प्रणाली भी प्रशंसनीय है। शत्रु के वायु मार्गीय आक्रमणों को वायुक्षेत्र में ही नष्ट करने के लिए भारत ने एक बहुस्तरीय सुरक्षा कवच तैयार किया है। इसके अंतर्गत पहले वर्णन आता है आकाश का। यह कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है, जिसके नए संस्करण ‘आकाश प्राइम’ में स्वदेशी एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर लगा है। वीशॉड्र्स नामक एक मैनपैड मिसाइल भी भारत में बनी है। ये बहुत कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली है, जो युद्धक प्रतिरोध के लिए विश्वसनीय होने के साथ-साथ पर्वतों में सैनिकों द्वारा सुगमता से कंधे पर लादकर उपयोग की जा सकती है। समर का उल्लेख भी आवश्यक है। ये भारतीय वायु सेना द्वारा विकसित प्रणाली है, जो पुरानी रूसी मिसाइलों को आधुनिक लॉन्चर के साथ जोडक़र बनाई गई है। इस समय स्वदेशी लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर के विनिर्माण में भी तेजी आई है। भारतीय वायु सेना मेक इन इंडिया के अंतर्गत विकसित विमानों पर अधिक भरोसा कर रही है। इस श्रृंखला का महत्त्वपूर्ण अंग है तेजस।
तेजस एमके1ए एवं एमके2 भी नवोन्नत विमान हैं। यह एक हल्का, चौथी पीढ़ी का बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है। इस वर्ष तेजस मार्क-2 का उत्पादन और परीक्षण अंतिम चरणों में है, जो राफेल के स्तर की तकनीक से लैस है। इसके अतिरिक्त एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट भी भारत का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर प्रोग्राम है। यह दुश्मन के रडार से बचने की क्षमता रखता है। साथ ही एलसीएच प्रचंड भी रक्षा हेतु एक अति उपयोगी अस्त्र है। ये दुनिया का एकमात्र लड़ाकू हेलीकॉप्टर है जो 5000 मीटर की ऊंचाई (सियाचिन जैसे क्षेत्रों) पर आवश्यकतानुसार उतर सकता है और उड़ान भर सकता है। थल एवं नभ ही नहीं, अपितु समुद्र में भी स्वदेशी रक्षा शक्ति नित नवीन उपलब्ध्यिां अर्जित कर रही है। इस आलोक में भारतीय नौसेना का लक्ष्य 2030 तक पूरी तरह स्वदेशी जलयान का निर्माण करना है। हालांकि आईएनएस विक्रांत इस लक्षित कार्य की दिशा में पहले से अर्जित एक उपलब्धि है ही। यह भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत है, जिसने भारत को उन विशिष्ट देशों की पंक्ति में खड़ा कर दिया है जो 40000 टन से अधिक भार के विशाल जलयान बना सकते हैं। इस श्रृंखला में आईएनएस अरिहंत का उल्लेख भी अनिवार्य है। ये वे स्वदेशी परमाणु पनडुब्बियां हैं, जो भारत की ‘न्यूक्लियर ट्रायड’ (जल, थल और नभ से परमाणु हमले की क्षमता) को पूर्ण करती हैं। साथ ही प्रोजेक्ट 75-आई के तहत भारत में ही अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक चालित पनडुब्बियों का निर्माण किया जा रहा है। आईएनएस विक्रांत के सफल संचालन के बाद भारत अब दूसरे स्वदेशी विमान वाहक आईएसी-2 की योजना पर काम कर रहा है। आर्टिलरी और बख्तरबंद वाहन के9 वज्र-टी एक स्वचालित हॉवित्जर तोप है जिसे एलएंडटी ने भारत में निर्मित किया है। ‘धनुष’ भी महत्वपूर्ण है, जो बोफोर्स का संशोधित संस्करण है। एटीएजीएस 155एमएम/52 कैलिबर दुनिया की सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली तोपों में से एक है। अर्जुन मार्क-1ए भारत का मुख्य युद्धक टैंक है, जो आधुनिक सुरक्षा प्रणालियों और हंटर-किलर क्षमता से लैस है। युद्धकौशल में वृद्धि हेतु भविष्य की रक्षा तकनीकों का वर्णन यदि होता है तो ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम केंद्र में होते हैं। आधुनिक युद्ध अब धरातल पर सैनिकों द्वारा नहीं, अपितु तकनीक और ड्रोन आधारित हो चुके हैं। इस बिंदु को ध्यान में रख तपस-बीएच-201 तैयार है। यह एक स्वदेशी मीडियम एल्टिट्यूड लांग एंड्युरेंस यानी कि ‘मेल’ ड्रोन है, जो निगरानी और गुप्त जानकारी एकत्र करने के लिए बनाया गया है।
डीआरडीओ ने एक एंटी-ड्रोन सिस्टम ‘डी-4’ प्रणाली विकसित की है जो शत्रु के ड्रोन को निष्क्रिय कर सकती है या लेजर से नष्ट कर सकती है। फिलीपींस को ब्रह्मोस की आपूर्ति के बाद कई दक्षिण-पूर्वी एशियाई और खाड़ी के देश इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल में रुचि दिखा रहे हैं। आर्मेनिया को पिनाका रॉकेट सिस्टम का निर्यात, भारत की बढ़ती साख का प्रमाण है। यह दुनिया के सबसे सफल मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम में से एक बन गया है। रक्षा क्षेत्र में आधुनिक खोजों तथा तकनीक को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रक्षा उत्कृष्टता हेतु नवप्रवर्तन पर ध्यान दिया जा रहा है, जिसके द्वारा स्टार्टअप्स और एमएसएमई को रोबोटीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में रक्षा समाधान खोजने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बन रहे दो रक्षा उत्पादन केंद्रों ने निजी और सरकारी क्षेत्र के निर्माण को गति दी है। भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में रुपए 21083 करोड़ का ऐतिहासिक रक्षा निर्यात किया, जो गत वर्ष की तुलना में 32.5 प्रतिशत अधिक है। भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। इस क्षेत्र में हम आगे बढ़ रहे हैं।
विकेश कुमार बडोला



