लेख

जनसांख्यिकीय बदलाव की साजिश का सच

सन् 2005 में सच्चर समिति की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 2100 तक भारतीय जनसंख्या में मुसलमानों का अनुपात 17 फीसदी से 21 फीसदी के बीच स्थिर हो जाएगा। प्यू रिसर्च सेंटर ने अनुमान लगाया है कि 2050 तक भारत की कुल 1.668 बिलियन आबादी में से 311 मिलियन मुसलमान होंगे, जो देश की जनसंख्या का 18.4 फीसदी होगा। उत्तराखंड में भी मुसलमानों की आबादी काफी बढ़ी है…

मैं इन दिनों सोशल मीडिया में लगातार आ रही उन पोस्ट्स को लेकर चिंतित हूं जिनमें अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल सहित भारतवर्ष के सभी राज्यों और शहरों में अचानक मुस्लिम समाज की निरंतर बढ़ती जनसंख्या से जनसांख्यिकीय संरचना में हो रहे बदलावों की झलक और चर्चा देखने को मिल रही है। इससे स्थानीय लोगों में बढ़ता आक्रोश और भय की तस्वीरें भी आने वाले समय में उपस्थित होने वाली संघर्षमयी परिस्थितियों की ओर इशारा करती हैं। वैश्विक स्तर पर मुस्लिम समुदाय की कट्टरवादी सोच, गतिविधियां एवं कृत्य किसी से छिपे हुए नहीं हैं। अभी पिछले दिनों दिल्ली में हुए कार विस्फोट में मुस्लिम समुदाय के शिक्षित लोगों की संलिप्तता ने समाज के अन्य वर्गों के लोगों की चिंताओं में इजाफा ही किया है। धर्म विशेष के मजहबी कट्टरपन ने जहां समुदाय विशेष के लोगों की बुद्धि और विचारधारा को ही बदल दिया है, वहीं इससे धर्म आधारित सामाजिक बिखराव/टकराव बढ़ रहा है। सोशल मीडिया में सुदूर अरुणाचल प्रदेश से आने वाले वीडियो दर्शाते हैं कि वहां अचानक बाहरी राज्यों के मुस्लिम लोगों के आगमन से किस प्रकार से वहां का स्थानीय युवा आंदोलित हो रखा है। इसी बीच एक अच्छी पहल करते हुए उत्तराखंड में ऑपरेशन कालनेमि के तहत देहरादून पुलिस अब तक अवैध रूप से रह रहे 17 बांग्लादेशी नागरिकों पर कार्रवाई कर चुकी है। जिनमें से 8 को जेल भेजा जा चुका है और 9 को डिपोर्ट किया गया है। इसी तरह उत्तरप्रदेश में भी अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की जांच पड़ताल जारी है। भारतवर्ष में पिछले 50 वर्षों में पाकिस्तान पोषित आतंकवाद की विभीषिका में हजारों लोगों की शहादतें हुई हैं और शायद ही कोई महीना बीतता होगा, जब कोई न कोई आतंकवादी वारदात भारत के किसी कोने में न घटती हो। यही वजह थी कि मई महीने में भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध ऑपरेशन सिंदूर द्वारा सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी।

देखा जाए तो अधिकांश आतंकवादी घटनाओं/मामलों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की ही भागीदारी और संलिप्तता, इनकी कार्यप्रणाली और कट्टरता के कारण दूसरे धर्म और समुदायों के नागरिकों में इनके प्रति नफरत और शक को ही बढ़ावा देती है। वैश्विक स्तर पर भी मुस्लिम समुदाय के लोगों की गतिविधियां दूसरे धर्म के अनुयायियों से मेल मिलाप और सद्भाव वाली नहीं हैं। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधी केंद्र के प्रकाशन ‘अ क्रोनोलॉजी ऑफ इंटरनेशनल टेररिज्म’ में भी कहा गया है कि, ‘भारत को किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक आतंकवादी घटनाओं का सामना करना पड़ा है।’ सन् 2005 में सच्चर समिति की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 2100 तक भारतीय जनसंख्या में मुसलमानों का अनुपात 17 फीसदी से 21 फीसदी के बीच स्थिर हो जाएगा। प्यू रिसर्च सेंटर ने अनुमान लगाया है कि 2050 तक भारत की कुल 1.668 बिलियन आबादी में से 311 मिलियन मुसलमान होंगे, जो देश की जनसंख्या का 18.4 फीसदी होगा। उत्तराखंड का गठन 9 नवंबर, 2000 में हुआ था। उस वक्त नए बने राज्य में 2001 की जनगणना के मुताबिक करीब 1 लाख आबादी ही मुस्लिमों की थी, जो 2011 में बढक़र 14 लाख से ज्यादा हो गई थी। इस दौरान हिंदुओं की आबादी की वृद्धि दर 16 फीसदी थी तो पूरे दशक के दौरान मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर 39 फीसदी थी।

ये आंकड़े तब के हैं, जब बीते डेढ़ दशक से भारत की जनगणना के आंकड़े जारी नहीं हुए हैं। हिमाचल प्रदेश में मुस्लिम जनसंख्या कुल 68.65 लाख में से 1.50 लाख (2.18 प्रतिशत) है। जबकि असली आंकड़ों में मुस्लिमों की आबादी इससे कहीं अधिक हो चुकी है। हिमाचल प्रदेश में मात्र मुस्लिम आबादी और बाहरी घुसपैठ ही एक समस्या नहीं है। राज्य में मस्जिद-मदरसे भी तेजी से बढ़े हैं। हिंदू जागरण मंच ने एक रिपोर्ट में बताया है कि राज्य में कोरोना काल से पहले 393 मस्जिदें थी। लेकिन कोरोना के बाद इनकी संख्या 520 हो गई है। बताया गया है कि सिरमौर जिले में ही सबसे अधिक 130 मस्जिदें बन गई हैं। इसके अलावा चंबा में 87 और ऊना में 52 मस्जिदें हैं। प्रदेश में मदरसों की संख्या भी 35 है। हिंदू जागरण मंच का आरोप है कि उन जगहों पर मस्जिदें बनाई जा रही हैं जहां कोई भी मुस्लिम नहीं रहता। शिमला में संजौली की मस्जिद असल में मात्र दो मंजिला थी। लेकिन बिना अनुमति के यहां भी पांच मंजिला मस्जिद खड़ी कर दी गई। यहां नगर निगम के नोटिस के बाद भी काम नहीं रोका गया। सिर्फ शिमला ही नहीं, बल्कि मंडी सहित पूरे हिमाचल में मुस्लिमों और मस्जिदों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है।

ऐसा प्रतीत होता है कि हिमाचल प्रदेश में मुस्लिम समुदाय को बसाने की सोची-समझी साजिश चल रही है। हिमाचल में अचानक बाहर से आए मुसलमानों की बढ़ती संख्या चिंताजनक है क्योंकि इनका आचरण हिमाचली संस्कृति से मेल नहीं खाता है। भारत के किसी भी राज्य में मुस्लिमों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए कोई विशिष्ट सरकारी नीति भी नहीं है और किसी भी समुदाय की आबादी में वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करना अनुचित माना जाता है। ऐसी आशंका है कि भारत के हिंदू बहुल इलाकों में मुस्लिम समुदाय की बढ़ती आबादी से आने वाले वर्षों में वर्ग और धर्म पर आधारित संघर्ष बढ़ेगा जो भारत के विकास और सामाजिक सौहार्द के लिए कतई ठीक नहीं होगा। भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह बदलते सामाजिक ढांचे के बीच अपनी एकता, शांति और संवैधानिक मूल्यों को कितनी मजबूती से संभाल पाता है। यही भारत की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ी परीक्षा भी।-अनुज आचार्य

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button