संपादकीय

भारत ‘नेपाल’ नहीं हो सकता

आजकल कुछ स्वयंभू राजनीतिक विश्लेषक, स्वघोषित जाट-किसान नेता और डॉ. संजय निषाद जैसे कुंठित और असंतुष्ट मंत्री सोशल मीडिया पर भविष्यवाणी कर रहे हैं अथवा बयान दे रहे हैं कि भारत में भी नेपाल जैसे हालात बन सकते हैं! मोदी सरकार के खिलाफ विद्रोह फूट सकता है, क्योंकि भारत में भी बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक असमानता खूब है। खासकर रोजगार को लेकर युवा वर्ग बेहद परेशान है, लिहाजा आक्रोशित है, बगावत पर उतारू हो सकता है! उद्धव की शिवसेना के झोलाटाइप नेता संजय राउत ने तो तब भी भारत में व्यापक बगावत की आशंकाएं जताई थीं, जब श्रीलंका और बांग्लादेश में जन-विद्रोह भडक़े थे। दरअसल भारत की तुलना छोटे, असंतुलित और निरंकुश देशों की अराजकता के साथ नहीं की जा सकती। ऐसे जन-विद्रोह लोकतांत्रिक नहीं माने जा सकते, क्योंकि इनमें पर्याप्त हिंसा, हत्याएं, आगजनी, सरकारी संपत्तियों के विध्वंस समाहित होते हैं। भारत का लोकतंत्र और संविधान भी अप्रतिम और अतुलनीय हैं। ऐसी ही टिप्पणी देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई ने भी की है कि हमारा संविधान ऐसा है कि देश स्थिर है और आगे भी रहेगा। प्रधान न्यायाधीश सरकार के ‘भोंपू’ नहीं हुआ करते। संजय निषाद उप्र सरकार में मंत्री हैं और उनकी पार्टी एनडीए का एक घटक है। उनकी कुंठाओं और असंतोष के मायने सिर्फ ये हैं कि उन्हें अपेक्षित और वांछित हिस्सा नहीं मिल पा रहा होगा! भारत में सबसे अलोकतांत्रिक, तानाशाह, न्यायपालिका पर भी अंकुश रखने वाला दौर ‘आपातकाल’ (1975-77) का था। तब भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एकतंत्रवादी निर्णयों के खिलाफ विद्रोह नहीं हुआ, बल्कि राजनीतिक लामबंदियां की गईं। देश के बड़े नेताओं-सांसदों, पत्रकारों, लेखकों, गीतकारों आदि को 19 महीने तक जेलों में ठूंसा गया। उन्हें यातनाएं भी दी गईं। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली ‘संपूर्ण क्रांति’ बगावत में भी बदल सकती थी, लेकिन भारतीय के संस्कार, मूल्य, विश्वास पूरी तरह लोकतांत्रिक हैं।

वह दौर भी अंतहीन नहीं रहा। अंतत: चुनाव कराने पड़े और देश को एक नया राजनीतिक नेतृत्व मिला। दरअसल भारत के विभिन्न हिस्सों में कई आंदोलन किए जा चुके हैं। छात्रों, आरक्षणवादियों, आदिवासियों और किसानों के कई बड़े आंदोलन सामने आए हैं, लेकिन निरंकुश, हिंसक विद्रोह एक बार भी नहीं भडक़ा। मोदी सरकार के दौरान ही किसान आंदोलन एक साल से भी अधिक समय तक जारी रहा। कई किसान मारे गए। अंतत: तंबू समेटने पड़े। मांगें आज तक भी अपूर्ण हैं, लेकिन किसानों ने देश की निर्वाचित सरकार के खिलाफ बगावत नहीं की। संवाद आज भी जारी हैं। बहरहाल खालिस्तान या पूर्वोत्तर राज्यों के उग्रवाद कोई आंदोलन नहीं, आतंकवाद के करीब थे। उन्हें भी सरकार के साथ संवाद की मेज पर आना पड़ा। दरअसल विश्व की आर्थिक महाशक्तियों के देशों में भी बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक तनाव, विरोध-प्रदर्शन के हालात बने रहे हैं। भारत 146 करोड़ से अधिक की सर्वाधिक आबादी वाला देश है, जिसकी आर्थिक विकास दर औसतन 6 फीसदी से ज्यादा रही है। बेशक टॉप 1 फीसदी लोगों के पास करीब 40 फीसदी संपत्ति है और निचले 50 फीसदी के पास सिर्फ 13 फीसदी है। यह आर्थिक असमानता गुलाम भारत में भी थी और आज स्वतंत्र भारत में भी है। यह अमरीका, जर्मनी, फ्रांस और चीन में भी है। हमारे 543 सांसदों में से 504 सांसद करोड़पति हैं। जो 324 सांसद फिर से 2024 में भी जीत कर आए हैं, उनकी संपत्ति 5 साल में करीब 43 फीसदी बढ़ी है। प्रत्येक भारतीय पर औसतन कर्ज 4.8 लाख रुपए है। यह कर्ज दो साल में करीब 90,000 रुपए बढ़ा है। देश में महंगाई दर 1.55 फीसदी और बेरोजगारी दर 5.2 फीसदी से कुछ अधिक है। बेशक स्थितियां बेहतर हुई हैं, लेकिन कुछ प्रवक्ताओं को आज भी 1970-80 वाला भारत लगता है, जब मुद्रास्फीति 15-20 फीसदी के बीच रहती थी। कमोबेश आज भी भारत में नेपाल जैसी स्थितियां नहीं हैं। कुछ विदेशी, दुराग्रही कंपनियों के डाटा दिखा कर भारत को भी ‘नेपाल’ या ‘श्रीलंका’ की तरह चित्रित किया जा रहा है, लेकिन भारत ही ऐसा लोकतंत्र है, जहां सत्ता का हस्तांतरण, चुनाव के बाद, सहजता और सौहार्द से हो जाता है। नेपाल में प्रधानमंत्री का कार्यकाल औसतन एक साल से भी कम रह पाता है, क्योंकि वह बहुमत खो देता है। संविधान और लोकतंत्र की मजबूती ही बुनियादी कारण है, जिसके आधार पर भारत कभी भी नेपाल नहीं हो सकता। यह भी सच्चाई है कि भारत ने हमेशा अपने पड़ोसियों की मदद की है और वहां शांति का समर्थन किया है।

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