संपादकीय

बाढ़ का तांडव, ठोस कदम उठाने जरूरी

उत्तराखंड हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में कई स्थानों पर पुल बह गए सड़कें टूट गईं और घर क्षतिग्रस्त हो गए। जान-माल की अच्छी-खासी क्षति भी हुई। पर्वतीय क्षेत्रों में इस तबाही के साथ मैदानी इलाकों में भी बाढ़ ने कहर ढाया। पंजाब और हरियाणा में नदियों में पानी का स्तर अचानक बढ़ गया और बांधों में जमा पानी छोड़ना पड़ा।

 इस वर्ष उत्तर और पश्चिम भारत में जिस तरह अधिक वर्षा हुई और अभी भी हो रही है, उसने कई राज्यों को बाढ़ की भयावह स्थिति में धकेल दिया है। आम तौर पर बाढ़ की विभीषिका उत्तर-पूर्वी राज्यों और बिहार में देखने को मिलती है, क्योंकि ये इलाके पारंपरिक रूप से नदियों के उफान के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस बार अलग स्थिति देखने को मिल रही है।

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्यों के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र तक बाढ़ के प्रकोप का सामना कर रहे हैं। दिल्ली भी बाढ़ की समस्या से त्रस्त है और पंजाब में तो बाढ़ का इतना विकराल रूप दिखाई दे रहा है, जितना हाल के समय में पहले कभी नहीं देखा गया। इसे केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह बदलते मौसम चक्र और सरकारी तंत्र के साथ आम लोगों की अनदेखी का भी परिणाम है।

पर्वतीय राज्यों में अधिक बारिश के कारण नदियां उफान पर आ गईं। इन राज्यों में बारिश का असर हमेशा से अधिक होता है, क्योंकि यहां की भौगोलिक स्थिति नाजुक है। ढलानों पर बसे गांव और कस्बे थोड़ी सी तेज बारिश में भी खतरे में आ जाते हैं। इस बार हालात और गंभीर हो गए, क्योंकि बादल फटने जैसी घटनाओं ने तबाही को और बढ़ा दिया।

उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में कई स्थानों पर पुल बह गए, सड़कें टूट गईं और घर क्षतिग्रस्त हो गए। जान-माल की अच्छी-खासी क्षति भी हुई। पर्वतीय क्षेत्रों में इस तबाही के साथ मैदानी इलाकों में भी बाढ़ ने कहर ढाया। पंजाब और हरियाणा में नदियों में पानी का स्तर अचानक बढ़ गया और बांधों में जमा पानी छोड़ना पड़ा। इससे बड़ी आबादी वाले कई जिलों में बाढ़ का पानी घुस गया और अनेक स्थानों पर त्राहिमाम की स्थिति बन गई। पंजाब की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है।

यह राज्य बाढ़ के लिए जाना नहीं जाता। यहां इतनी अधिक वर्षा हुई कि पिछले 25 साल का रिकार्ड टूट गया। खेती प्रधान इस राज्य में हजारों एकड़ खेत जलमग्न हो गए, जिससे फसलें चौपट हो गईं और किसानों की मेहनत पर पानी फिर गया। यह केवल आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट भी है, क्योंकि खेतों पर निर्भर लाखों परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई।

मौसम विज्ञानियों का कहना है कि इस बार उत्तर-पश्चिम और पूर्व की हवाएं असामान्य रूप से सक्रिय हो गईं, जिसके कारण इतनी भारी बारिश हुई। जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ लंबे समय से आगाह कर रहे हैं कि मौसम का चक्र अब स्थिर नहीं रहने वाला। कभी बहुत कम बारिश होगी, तो कभी सामान्य से कई गुना अधिक और वह भी कम समय में। इस बार हम यही देख रहे हैं। यह सही है कि अतीत में भी भारत में कभी-कभी भारी वर्षा हुई है, लेकिन आज की स्थिति अलग है, क्योंकि अब हमारी आबादी अधिक है, शहरीकरण तेज है और बुनियादी ढांचा पर्याप्त मजबूत नहीं है। इसी कारण तबाही का दायरा अधिक दिख रहा है।

भारत में बाढ़ की समस्या केवल प्राकृतिक नहीं है। मानवीय कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। नदियों और नालों पर अतिक्रमण आम हो गया है। कई जगह पूरे मोहल्ले नदी किनारे बसा दिए गए हैं। यहां तक कि नालों को पाटकर भवन खड़े कर दिए जाते हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। नतीजा यह है कि बारिश के दिनों में थोड़ी सी वर्षा भी जलभराव का कारण बन जाती है। सड़कें घंटों जाम रहती हैं और सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। लोग समय से काम पर नहीं पहुंच पाते। यह भी एक तरह का नुकसान ही है। इस समस्या का एक और पहलू है शहरों का सीवेज सिस्टम।

अधिकांश शहरों में सीवेज सिस्टम खराब है। सीवेज की गंदगी नालों के माध्यम से सीधे नदियों में पहुंच जाती है और गाद की मात्रा बढ़ा देती है। इससे नदियां उथली हो जाती हैं और बरसात में जल्दी उफन जाती हैं। गाद हटाने का काम नियमित और गंभीरता से नहीं किया जाता, बल्कि अक्सर इसे खानापूरी तक ही सीमित रखा जाता है। इसके अलावा भवन निर्माण और सड़क निर्माण में भी मानकों की अनदेखी की जाती है। आधारभूत ढांचे के निर्माण में खराब इंजीनियरिंग और भ्रष्टाचार ने बुनियादी ढांचे को कमजोर बना दिया है।

यही वजह है कि भारी वर्षा को सहने में हमारे शहर सक्षम नहीं हो पाते। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत एशिया के जिस भूभाग में स्थित है, वहां हिमालय से निकलने वाली नदियां बालू और गाद अपने साथ लाती हैं। मैदानी इलाकों में पहुंचकर ये नदियां और उथली हो जाती हैं। इसे देखते हुए और भी सावधानी बरतने की आवश्यकता है। स्पष्ट है कि केवल जलवायु परिवर्तन को दोष देकर सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। उन्हें अपने हिस्से की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। इससे इन्कार नहीं कि बदलता मौसम चक्र एक चुनौती है, लेकिन उससे निपटा जा सकता है, यदि दूरदर्शी नीतियों और ठोस योजनाओं पर सही तरह अमल किया जाए। यदि भवन निर्माण के मानकों को नियंत्रित किया जाए, नदियों और नालों पर अतिक्रमण रोका जाए, सीवेज और जल निकासी की व्यवस्था सुधारी जाए, तो बाढ़ की तबाही काफी हद तक कम की जा सकती है।

भारत को हर वर्ष बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर काम करना होगा। अल्पकालिक उपायों से समस्या हल नहीं होगी। दीर्घकालिक योजनाओं की जरूरत है। इसमें नदियों की गाद हटाने का काम ईमानदारी से करना होगा, जल निकासी के लिए आधुनिक तंत्र विकसित करना होगा और आधारभूत ढांचे का निर्माण तय मानकों के अनुसार करना होगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शहरों में तेजी से बढ़ती आबादी के घनत्व को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनाई जाएं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन और शहरी अव्यवस्था का असर और भी विनाशकारी रूप में दिखाई पड़ सकता है। इससे होने वाला नुकसान देश की प्रगति में बाधक बनेगा ही और इसके नतीजे में विकसित भारत के सपने को सही तरह पूरा करना कठिन होगा।

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