संपादकीय

महिला सशक्तिकरण के लिए भी मील का पत्थर…

गरीबों को बैंकिंग प्रक्रिया से जोड़ने की यह गति अभी भी जारी है। पिछले 11 वर्षों में 56.16 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं। इनमें से 67 प्रतिशत खाते ग्रामीण या अर्ध शहरी क्षेत्रों में खोले गए और 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं। इस प्रकार जनधन योजना वित्तीय समावेशन के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण के लिए भी मील का पत्थर साबित हुई।

 इसे विडंबना ही कहेंगे कि आजादी के 67 साल बाद भी देश के आधे परिवारों के लिए बैंकिंग तक पहुंच दूर का सपना था। वित्तीय सुरक्षा के अभाव में गरीबों के सपने कभी साकार नहीं हो पाते थे। तब भले ही बैंकों को गरीबों का हितैषी कहा जाता हो, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर उनका ढांचा गरीबों के अनुकूल नहीं रहा। देश में गरीबी की व्यापकता एवं उद्यमशीलता के माहौल में कमी का एक बड़ा कारण बैंकों तक गरीबों की पहुंच न होना रहा।

1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद यह उम्‍मीद बंधी थी कि अब बैंकों की चौखट तक गरीबों की पहुंच बढ़ेगी, पर समय के साथ यह उम्मीद धूमिल पड़ती गई। 2013 में रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने वित्तीय समावेशन पर नचिकेता मोर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। समिति ने सभी लोगों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाने के लिए अधिक व्यापक वित्तीय ढांचे की सिफारिश करते हुअ कहा कि चूंकि गरीब बचत करते हैं, इसलिए उनके लिए एक ऐसी सुरक्षित एवं ब्याज कमाने वाली औपचारिक योजना की जरूरत है, जिस तक आसानी से पहुंच सुनिश्चित की जा सके।

आजादी के 67 वर्षों तक जहां आम आदमी को आसानी से बचत खाता तक नसीब नहीं हुआ, वहीं भ्रष्ट नेताओं-नौकरशाहों-ठेकेदारों के बैंक खाते विदेशी बैंकों में खुले। बैंकों की सीमित पहुंच का दुष्परिणाम यह हुआ कि हर स्‍तर पर बिचौलियों-भ्रष्टाचारियों की भरमार हो गई। इसे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह कहकर स्वीकार भी किया था कि विकास के लिए दिल्ली से चला एक रुपया गरीबों तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसा ही रह जाता है।

स्पष्ट है शेष 85 पैसा बिचौलियों-भ्रष्टाचारियों की जेब में जाता था। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने “सबका साथ-सबका विकास” के लिए आम जनता को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ने का जो बीड़ा उठाया था, उसी के तहत थी जनधन योजना। “हर घर का पासबुक” जैसा महत्वाकांक्षी लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2014 को लाल किले की प्राचीर से पीएम जनधन योजना शुरू करने का ऐलान किया।

इस योजना की शुरुआत 28 अगस्त 2014 को हुई और इस दिन बैंकों ने गरीबों का खाता खोलने के लिए देश भर में 60,000 शिविर लगाए। पहले ही दिन देश भर में डेढ़ करोड़ बैंक खाते खोले गए। इस कामयाबी को देखते हुए प्रधानमंत्री ने 28 अगस्त को ‘वित्‍तीय स्वतंत्रता दिवस” करार दिया। आम तौर पर गरीबों की हितैषी वाली योजनाएं शुरू में तो धूम-धड़ाके के साथ होती हैं, लेकिन बाद में वे भ्रष्ट तत्वों के जीने-खाने का जरिया बन जाती हैं, परंतु जनधन योजना के साथ ऐसा नहीं हुआ। मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते 2014 के पांच महीनों में दस करोड़ से ज्यादा बैंक खाते खोले गए, जो एक विश्व रिकार्ड है।

गरीबों को बैंकिंग प्रक्रिया से जोड़ने की यह गति अभी भी जारी है। पिछले 11 वर्षों में 56.16 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं। इनमें से 67 प्रतिशत खाते ग्रामीण या अर्ध शहरी क्षेत्रों में खोले गए और 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं। इस प्रकार जनधन योजना वित्तीय समावेशन के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण के लिए भी मील का पत्थर साबित हुई। इन खातों में कुल जमा राशि 2.68 लाख करोड़ है। इन खातों से जुड़े 38 करोड़ से अधिक रूपे कार्ड जारी किए गए हैं। इससे डिजिटल लेन-देन आसान हुआ है। एक तरह से इस योजना ने नकदी रहित भुगतान के लिए नींव का काम किया।

पीएम जनधन योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि हर स्तर पर भ्रष्टाचारियों-बिचौलियों का उन्मूलन हो गया। आज केंद्र सरकार की 327 सरकारी योजनाओं का पैसा प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में जा रहा है। यदि केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्यों की योजनाओं को भी मिला लें तो कुल 1200 योजनाओं में से 1100 योजनाएं डीबीटी के दायरे में आ चुकी हैं। डीबीटी की सफलता में जेएएम यानी जनधन, आधार और मोबाइल का महत्वपूर्ण स्थान है। जेएएम के कारण ही भारत में डिजिटल पेमेंट का आंदोलन संभव हो पाया।

आज भारत में विश्व का 40 प्रतिशत रियल टाइम डिजिटल पेमेंट हो रहा है। इसीलिए भारत की डिजिटल क्रांति दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी है। ब्लू क्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन के एक अध्ययन के अनुसार भारत की डीबीटी प्रणाली कल्याणकारी कार्यक्रमों में रिसाव को रोककर देश को 3.48 लाख करोड़ रुपये बचाने में मदद की है। रिपोर्ट में भी यह भी पाया गया कि डीबीटी के क्रियान्वयन के बाद से सब्सिडी आवंटन कुल सरकारी व्यय के 16 प्रतिशत से घटकर 9 प्रतिशत रह गया है, जो सार्वजनिक व्यय की दक्षता में एक बड़ा सुधार है।

जनधन योजना को मिली अभूतपूर्व सफलता को देखते हुए इस योजना के 11 साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री मोदी ने यह रेखांकित किया कि जब अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति वित्तीय रूप से जुड़ जाता है तो पूरा देश एक साथ आगे बढ़ता है। उन्होंने इसे उचित ही भारत की वित्तीय क्रांति की नींव बताया।

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