संपादकीय

नया कानून क्यों

महाराष्ट्र विधानसभा में स्पेशल पब्लिक सिक्यॉरिटी बिल ध्वनिमत से पास हुआ। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने राज्य में कानून-व्यवस्था की मजबूती के लिए इसे जरूरी बताया है। लेकिन इस बिल से जुड़े कुछ सवाल हैं, जिनके जवाब मिलने चाहिए। विपक्ष ने भी जो आशंकाएं जाहिर की हैं, उन्हें यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि विपक्ष तो विरोध करेगा ही।

क्या है परिभाषा: सीएम फडणवीस ने कहा है कि यह बिल ‘अर्बन नक्सलियों’ के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने को लाया गया है। नक्सलवाद की समस्या से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन महाराष्ट्र सरकार जिस ‘अर्बन नक्सल’ की बात कह रही है, उसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं बताई जा रही। यह शब्द पिछले दशक से चलन में आया है। लेकिन, इसकी स्पष्ट व्याख्या की जरूरत है, ताकि इस शब्द की आड़ में वैचारिक विरोध और असहमति की आवाज को न दबाया जा सके।

स्पष्ट हों प्रावधान: विपक्ष को भी मुख्य एतराज इसी बात पर है कि बिल में लेफ्ट विंग उग्रवादी विचारधारा की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। हालांकि सीएम भरोसा दे रहे हैं कि नए कानून का उपयोग राजनीतिक प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ नहीं किया जाएगा। उन्होंने यही बात लेफ्ट पार्टियों के लिए भी कही, लेकिन इतना काफी नहीं है। किसी भी कानून में सबसे अहम है प्रावधानों की स्पष्टता, ताकि उसे लागू करने में किसी तरह की परेशानी न आए।

जरूरत पर सवाल: हालांकि महाराष्ट्र इस तरह के कानून लाने वाला कोई पहला राज्य नहीं है। इससे पहले चार अन्य राज्यों में ऐसा कानून लाया जा चुका है। लेकिन इससे यह सवाल समाप्त नहीं हो जाता कि आखिर ऐसा कानून लाने की क्या जरूरत आन पड़ी है। देश में नक्सलवाद की समस्या, सरकार के ही दावों के मुताबिक, अब अपनी आखिरी सांसें गिन रही है। देश में नक्सल प्रभावित जिलों की जो संख्या एक समय 180 तक चली गई थी, वह अब 18 रह गई है। इनमें भी ज्यादा प्रभावित जिले 6 बताए जाते हैं। फडणवीस के ही मुताबिक महाराष्ट्र में केवल दो तालुकाओं में नक्सली गतिविधियां बची हैं। तो जो समस्या यों भी खत्म होने पर है, उसके लिए इतने कड़े इस नए कानून की जरूरत क्यों समझी जा रही है?

दूर हों आशंकाएं: महाराष्ट्र में मकोका और UAPA जैसे सख्त कानून पहले से हैं। ऐसे में ‘अर्बन नक्सल’ जैसी अस्पष्ट सोच के साथ जोड़कर इतना कड़ा कानून लाए जाने से यह आशंका मजबूत होती है कि कहीं इसका दुरुपयोग आम लोगों के असंतोष को दबाने में न किया जाने लगे। बेहतर होगा सरकार कानून लागू करने से पहले इससे जुड़ी आशंकाओं को दूर करने पर ध्यान दे।

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