संपादकीय

भविष्य की आधारशिला रखने वाला मिशन एक्सिओम-4, वैश्विक अंतरिक्ष महाशक्ति बनने जा रहा भारत

 भारतीय वायुसेना में ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन-आइएसएस में दाखिल होकर एक नया इतिहास रचा। वह एक्सिओम-4 मिशन का हिस्सा हैं। यह मिशन नासा, इसरो और यूरोपियन स्पेस एजेंसी का समन्वित प्रयास है। इस मिशन के दौरान 60 वैज्ञानिक परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों में 31 देशों का योगदान होगा, जिनमें सात परीक्षणों में इसरो की सक्रिय भूमिका है। 

ये परीक्षण माइक्रोबायोलाजी, बायोटेक्नोलाजी, पदार्थ विज्ञान, मानव शरीर विज्ञान एवं अंतरिक्ष तकनीक जैसे विविध विषयों से जुड़े हैं। यह मिशन अंतरिक्ष अन्वेषकों को अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन तक ले जाने, प्रवास या अंतरिक्ष में प्रयोग-परीक्षण करने तक ही सीमित नहीं। इसमें उस भविष्य की कुंजी निहित है, जिसमें अंतरिक्ष केवल अन्वेषण का ही एक केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि वह व्यापक रणनीतिक एवं आर्थिक मोर्चे के रूप में भी स्थापित होगा।

यह स्पष्ट है कि आने वाले दशकों में अंतरिक्ष भूराजनीति, वैश्विक शक्ति समीकरण और आर्थिक वृद्धि को आकार देने में अहम भूमिका निभाएगा। चाहे उपग्रह संचार से लेकर रक्षा प्रणालियों का मामला हो या संसाधन उत्खनन से अंतरिक्ष पर्यटन का विषय, उनमें देशों की अंतरिक्ष क्षमताएं ही यह निर्धारित करेंगी कि कौन देश इसमें बढ़त बनाएगा और कौन अनुसरण करेगा। अंतरिक्ष में नियंत्रण का अर्थ है संचार पर नियंत्रण? यह स्थिति युद्ध और टकराव में बहुत उपयोगी साबित होती है। सैटेलाइट नेटवर्क की महत्ता तो सैन्य संचार से लेकर रियल टाइम नेविगेशन और जलवायु निगरानी के मोर्चे पर पहले ही सिद्ध हो चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध इसका उदाहरण है। जब रूस ने यूक्रेन के संचार ढांचे को तबाह कर दिया तब एलन मस्क की स्टारलिंक सैटेलाइट सुविधा ही यूक्रेन के काम आई।

आधुनिक समर नीति में भी अंतरिक्ष एक महत्वपूर्ण पहलू है। सशक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम वाले देशों को स्वाभाविक रूप से सामरिक बढ़त मिलती है। ईरान-इजरायल के हालिया युद्ध में भी इसका प्रमाण दिखा, जहां ईरान की कई बैलिस्टिक मिसाइलों को इजरायल के एयरो-3 डिफेंस सिस्टम ने पृथ्वी के वायुमंडल की सीमा से बाहर ही निष्प्रभावी कर दिया। यह दर्शाता है कि अंतरिक्ष परिसंपत्तियों पर नियंत्रण कैसे आधुनिक समर नीति को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है। बीते दिनों भारत के आपरेशन सिंदूर में भी सैटेलाइट कैमरों की उपयोगिता दिखी, जिन्होंने लक्ष्यों को चिह्नित करने और नुकसान के आकलन में अहम भूमिका निभाई। इन्हीं पहलुओं को देखते हुए अमेरिका ने अपनी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए स्पेस फोर्स नाम से एक अलग सैन्य इकाई का गठन किया है। भारत भी इस संकल्पना को साकार करने की दिशा में बढ़ने जा रहा है।

आर्थिक मोर्चे पर भी अंतरिक्ष नया अखाड़ा बन रहा है। अंतरिक्ष पर्यटन अब कोई कपोल-कल्पना नहीं। कुछ कंपनियों-संगठनों ने अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सेवाएं शुरू कर दी हैं। इसरो भी इस दिशा में काम कर रहा है और उसकी 2030 तक अंतरिक्ष पर्यटन शुरू करने की योजना है। 2030 तक वैश्विक अंतरिक्ष पर्यटन कारोबार के 85,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

चूंकि भारत की पहचान विश्वसनीय और किफायती प्रक्षेपण क्षमताओं वाले देश की है, इसलिए यह मानने के अच्छे भले कारण हैं कि इस बाजार में उसे बड़ा हिस्सा प्राप्त होने वाला है। विस्तार ले रही अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में वही देश बाजी मारने में सफल हो सकते हैं, जो मनुष्यों से लेकर मशीनों को अपने दम पर अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम होंगे। ऊंचे दांव वाली इस होड़ में भारत बिल्कुल सटीक मौके पर कदम बढ़ा रहा है। एक वैश्विक अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की भारत की यात्रा में एक्सिओम-4 मिशन एक मील का पत्थर है। सीधे तौर पर इसका सरोकार भारत के गगनयान कार्यक्रम से जुड़ा है, जिसके अंतर्गत स्वदेश निर्मित यान के जरिये भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा में भेजने की योजना है। 

यह 2027 तक संभव हो सकता है। हालांकि भारत के इरादे इससे कहीं ज्यादा बड़े हैं। भारत का लक्ष्य वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन-बीएएस के रूप में अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना है। यह केंद्र अत्याधुनिक शोध-अनुसंधान, नवाचार एवं लंबी अवधि वाले मिशन के लिए एक मंच की भूमिका निभाएगा। इसके साथ ही भारत अंतरिक्ष में स्थायी मानवीय उपस्थिति वाले चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा। एक्सिओम-4 मिशन के दौरान लाइफ साइंस, कक्षीय परिचालन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के मोर्चे पर सीखे जाने वाले सबक बीएएस के डिजाइन और संचालन ढांचे को आकार देने में अहम भूमिका निभाएंगे।

अंतरिक्ष में मूल्यवान संसाधनों का भंडार भी छिपा है। इस संदर्भ में मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित क्षुद्रग्रह (एस्टेरायड) बेल्ट सर्वाधिक संपन्न है। इनमें प्लेटिनम, सोना, कोबाल्ट, लीथियम जैसे वैसे दुर्लभ संसाधन हैं, जो बैटरी, इलेक्ट्रानिक्स और स्वच्छ ऊर्जा तकनीक जैसी आधुनिक आवश्यकताओं की पूर्ति में बेहद महत्वपूर्ण हैं। पृथ्वी पर सिकुड़ते संसाधनों को देखते हुए भविष्य की आर्थिकी में अंतरिक्ष खनन का महत्व बढ़ेगा। समझ लीजिए कि संपूर्ण विश्व का सकल घरेलू उत्पाद-जीडीपी करीब 100 ट्रिलियन (लाख करोड़) डालर है तो केवल क्षुद्रग्रह बेल्ट की हैसियत ही दुनिया के उत्पादन से करीब 8,000 गुना अधिक है। 

यानी वहां मौजूद खनिजों का मूल्य इतना अधिक है कि पूरी दुनिया अगली 80 शताब्दियों तक कमाई के जरिये ही उसकी बराबरी कर पाएगी। जो देश इन इलाकों में सबसे पहले पहुंचकर उसके कुछ हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित करेंगे, वही भविष्य के उद्योगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति के चक्र को नियंत्रित कर सकेंगे। वे कीमतों के निर्धारण, नए उद्यमों की स्थापना और वैश्विक बाजारों को आकार देंगे।

यही वजह है कि अंतरिक्ष में पैठ भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। अपनी क्षमताओं और महारत से भारत विभिन्न देशों के साथ साझेदारी और प्रशिक्षण के जरिये अंतरिक्ष में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का नेतृत्व कर सकता है। यह रणनीति कूटनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने के साथ ही अंतरिक्ष अन्वेषण को भी कहीं अधिक समावेशी एवं न्यायसंगत बनाएगी।

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