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Kainchi Dham Mela 2025: नीम करौली बाबा की कृपा पाने को तैयार कैंची धाम, उमड़ेगा श्रद्धालुओं का सैलाब

Kainchi Dham Mela 2025: कल यानी 15 जून को बाबा नीम करौली महाराज के विश्वप्रसिद्ध कैंची धाम में स्थापना दिवस का भव्य आयोजन होने जा रहा है. कार्यक्रम की तैयारियां अंतिम चरण में हैं. ट्रैफिक प्रबंधन से लेकर प्रसाद वितरण तक हर स्तर पर विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं. आयोजकों का अनुमान है कि इस शुभ अवसर पर लगभग 5 लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए कैंची धाम पहुंच सकते हैं.

क्यों खास है कैंची धाम का मेला?

कैंची धाम का मेला बेहद खास माना जाता है क्योंकि यह स्थान भक्तों की गहरी आस्था का केंद्र है. नीम करोली बाबा को वीर हनुमान जी का अवतार माना जाता है, और उनका यह धाम उत्तराखंड में स्थित है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर इच्छा जरूर पूरी होती है. हर साल 15 जून को मंदिर की स्थापना वर्षगांठ के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, भंडारे और भक्ति कीर्तन जैसे दिव्य आयोजन किए जाते हैं, जिसमें देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं.

मिलेगा मालपुए का प्रसाद

इस वर्ष कैंची धाम मंदिर प्रशासन ने विशेष तैयारी की है ताकि किसी भी श्रद्धालु को प्रसाद से वंचित न रहना पड़े. नीम करोली बाबा के भक्तों की आस्था को देखते हुए इस बार केवल 15 जून ही नहीं, बल्कि 16 और 17 जून को भी मालपुए का प्रसाद वितरित किया जाएगा. यानी कुल तीन दिन तक हर आने वाले भक्त को बाबा के दर्शनों के साथ-साथ मालपुए का पवित्र प्रसाद भी प्राप्त होगा. मंदिर प्रशासन की इस पहल से श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखा जा रहा है, और हर कोई प्रसाद लेकर संतुष्ट मन से घर लौट सकेगा.

जानें कौन थे नीम करोली बाबा

नीम करोली बाबा 20वीं सदी के महान संतों में गिने जाते हैं, जो अपनी अद्भुत दिव्य शक्तियों और भक्तों के प्रति करुणा के लिए प्रसिद्ध हैं. उनका जन्म लगभग 1900 के आसपास उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था. जन्म के समय उनका नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था.

बचपन से ही वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे और हनुमान जी के परम भक्त माने जाते हैं. जीवन में उन्होंने कई नामों से प्रसिद्धि पाई—जैसे लक्ष्मण दास, तिकोनिया बाबा, तलईया बाबा और सबसे लोकप्रिय नाम, नीम करोली बाबा. मान्यता है कि वे कलियुग में हनुमान जी के अवतार थे.

बचपन में ही, मात्र 11 वर्ष की आयु में, उनके माता-पिता ने उनका विवाह कर दिया था. लेकिन वैराग्य की भावना ने उन्हें जल्द ही घर-परिवार से दूर कर दिया. हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने भक्तिभाव से युक्त होकर गृहस्थ जीवन को भी अपनाया, लेकिन उनका मन सदा भक्ति और साधना में ही रमा रहा. उनके जीवन की यह अनोखी यात्रा आज भी असंख्य श्रद्धालुओं को प्रेरणा देती है.

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