राष्ट्रीय

जाति जनगणना तय करेगी भावी राजनीति

नरेंद्र मोदी सरकार ने जाति जनगणना प्रक्रिया की औपचारिक घोषणा कर दी है।  घोषित कार्यक्रम से स्पष्ट है कि प्रक्रिया लम्बी चलेगी और भावी राजनीति पर दूरगामी असर डालेगी। भारत सरकार की घोषणा के मुताबिक अप्रैल से सितम्बर, 2026 तक घरों को सूचीबद्ध किया जाएगा। उसके बाद लोगों की गिनती होगी। दरअसल जाति जनगणना दो चरणों में होगी। एक अक्तूबर, 2026 से पहले चरण में पहाड़ी राज्यों ( जम्मू-कश्मीर,लद्दाख,हिमाचल और उत्तराखंड) में जनगणना होगी। दूसरे चरण में एक मार्च, 2027 से शेष सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जनगणना होगी।

जाहिर है, भारत जैसे विशाल देश में जनगणना की प्रक्रिया पूरी होने और अंतिम आंकड़े आने में लंबा समय लग सकता है। ऐसे में इस साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव ही नहीं, अगले साल होने वाले असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल एवं पुडुचेरी तथा 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड,पंजाब, मणिपुर, गुजरात और गोवा विधानसभा चुनाव भी जाति जनगणना के शोर और उसके श्रेय के दावों-प्रतिदावों के बीच ही निपट जाएंगे। बेशक इससे बचने का कोई विकल्प नहीं है। हमारे राजनीतिक दल तो वैसे भी हर मुद्दे को चुनाव में भुनाने में माहिर हैं।

नियमानुसार यह जनगणना 2021 में होनी थी  लेकिन कोरोना आ गया। कोरोना के बीच ही सावधानियों के साथ कई राज्यों में चुनाव तो कराए गए लेकिन जनगणना नहीं। 5 साल विलंब से लंबित जनगणना में अब जातियों की गणना भी की जाएगी। हमारे देश में जाति जनगणना भले ही आजादी के बाद पहली बार हो रही हो, पर उस पर राजनीति पुरानी है। कांग्रेस और भाजपा, दोनों की छवि अतीत में जाति जनगणना विरोधी की रही है  लेकिन अब वे ही उसका श्रेय लेना चाहती हैं। सरकार, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जाति जनगणना को देश और समाज की विकास योजनाओं के लिए उपयोगिता से जोड़ कर पेश कर रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी कह रहे हैं कि यह तो पहला कदम है, हमें आगे जा कर पता करना है कि उच्च पदों में किसकी कितनी हिस्सेदारी है।

सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति करने वाले लालू यादव, नीतीश कुमार और अखिलेश यादव में भी श्रेय की होड़ शुरू हो गई है। समझ पाना मुश्किल नहीं कि सारा खेल सत्ता-राजनीति का है। जनगणना केंद्र  सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय होते हुए भी बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना राज्य सरकारों ने जाति सर्वे का दांव चला। इसीलिए जाति जनगणना कराने के मोदी सरकार के फैसले में भी राजनीतिक दबाव की भूमिका मानी जा रही है। कांग्रेस नीत यू.पी.ए. शासनकाल में 2011 की जनगणना में सामाजिक- आॢथक स्थिति और जाति के आंकड़े तो जुटाए गए लेकिन जारी नहीं किए गए। अगली जनगणना 2021 में होनी थी जो कोरोना महामारी के चलते नहीं हो पाई।  

जनगणना के इंतजार में चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन भी रुका हुआ है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण भी परिसीमन के बाद ही लागू होगा। इसलिए जाति जनगणना और उसके आधार पर होने वाला चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन तथा महिलाओं के लिए आरक्षण भारत की चुनावी राजनीति पर दूरगामी  असर डालने जा रहा है  जिसका अभी आकलन कर पाना भी बेहद मुश्किल है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह आदर्श स्थिति तो हरगिज नहीं है पर इस सच से मुंह नहीं चुराया जा सकता कि धर्म और जाति महत्वपूर्ण चुनावी कारक बन गए हैं। 

शायद इसलिए भी, जाति जनगणना के विरोधी समझे जाते रहे राजनीतिक दलों में भी अब उसकी होड़ नजर आती है। जाति जनगणना की घोषणा के बाद उसकी पहली चुनावी परीक्षा इसी साल के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में होगी। सबसे पहले जाति सर्वे वाला बिहार ही बताएगा कि यह मोदी सरकार का ‘मास्टर स्ट्रोक’ साबित होता है या विपक्ष के दबाव में लिया गया फैसला। 1990 में भारतीय राजनीति के मंडल-कमंडल के बीच ध्रुवीकरण के बाद भाजपा की ङ्क्षहदुत्ववादी राजनीति का जादू सिर चढ़ कर बोला है लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में ओ.बी.सी. नेताओं से उसे कड़ी चुनौती मिली है। ये सभी डा. राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह की समाजवादी, लोकदलीय राजनीति से निकले हैं। लोहिया ने ही सबसे पहले नारा दिया था,‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’। बाद में बसपा संस्थापक कांशीराम ने भी नारा दिया,‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’। उच्च वर्गों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा को पिछले 3 लोकसभा चुनावों, और ज्यादातर विधानसभा चुनावों में भी  अन्य दलों से ज्यादा ओ.बी.सी. वोट मिले तो दलित वर्ग में भी उसकी पैठ बढ़ी। 

अभी तक जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या तय होती रही है। इसीलिए दक्षिण भारतीय राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण बेहतर ढंग से लागू करने का अब उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है  क्योंकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तर भारतीय राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ जाएगी। इसी आशंका के आधार पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन दक्षिण भारतीय राजनीतिक गोलबंदी में भी जुट गए हैं।-राज कुमार सिंह 

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