राष्ट्रीय

संघीय कशमकश और तमिल राजनीति

पिछले कुछ महीनों में तमिलनाडु सरकार ने तीन भाषा सूत्र, चुनाव-क्षेत्र परिसीमन और नीट परीक्षा जैसे मसलों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। तीनों मामलों के कारण राजनीतिक कोलाहल तो हुआ है, पर बुनियादी तौर पर कुछ हुआ नहीं है। यह सब अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव की पूर्व-पीठिका तैयार कर रहे हैं।

तमिलनाडु विधानसभा से पास होने के बावज़ूद दस विधेयकों को रोक कर रखने के राज्यपाल आरएन रवि के फैसले को अवैध करार देते हुए उच्चतम न्यायालय ने एक संवैधानिक पेच को दुरुस्त ज़रूर किया है, पर इससे केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यपालों की भूमिका से जुड़ी पहेलियों का हल पूरी तरह अब भी नहीं होगा। हाल के वर्षों में कुलपतियों की नियुक्ति, राज्य विधान परिषदों में नामांकन और राज्यपाल द्वारा पारंपरिक अभिभाषण के संपादन या सदन को बुलाने पर दुर्भाग्यपूर्ण रस्साकशी तो हुई ही है, विधानमंडलों से पारित विधेयकों को मंजूरी देने में देरी या इनकार जैसे कार्य भी हुए हैं।

विधानमंडल से पास हुए विधेयकों को रोकने की शक्ति को लेकर 2023 में, पंजाब राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि राज्यपाल निर्वाचित विधायिका द्वारा पारित विधेयकों पर समयबद्ध तरीके से कार्य करने के लिए बाध्य हैं। अदालत के इस बार के फैसले ने उस समयबद्धता को परिभाषित भी कर दिया है। इससे विधानमंडल से पास हुए विधेयकों के बारे में राज्यपालों का विशेषाधिकार सीमित हो गया है।

इस निर्णय का महत्व तमिलनाडु के राज्यपाल की निंदा से कहीं अधिक है। राज्यपाल अब जांच के बहाने कानून को अनिश्चितकाल तक विलंबित नहीं कर सकते। न्यायालय ने एक संवैधानिक सिद्धांत की पुष्टि की है कि राजभवनों को पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ काम करना चाहिए। अब सिद्धांत यह बना है कि किसी विधेयक को जब विधानमंडल दुबारा राज्यपाल के पास भेजें, तब उसे स्वीकृति दे दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल को ‘शीघ्रता से काम करना चाहिए’ और किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोककर वे ‘पॉकेट वीटो’ का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अनुच्छेद 200 को अनुच्छेद 163 के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो राज्यपाल को कैबिनेट की सलाह पर काम करने के लिए बाध्य करता है। यदि कैबिनेट की सलाह के विपरीत राज्यपाल किसी विधेयक को मंजूरी नहीं देते हैं या उसे सुरक्षित रखते हैं, तो उन्हें ऐसा तीन महीने के भीतर करना होगा। दोबारा पारित विधेयकों के लिए समय-सीमा घटाकर एक महीना कर दी गई है।

राज्यपालों के मामले में भारत का अनुभव निराशाजनक रहा है। इस पद का दुरुपयोग लगभग सभी ताकतों ने अलग-अलग वक्त पर किया है। दिल्ली में जिसकी सरकार रही उसने राज्य सरकारों को बर्खास्त करने में राज्यपालों का सहारा लिया। दशकों से देश राज्यपालों की भूमिका को लेकर विमर्श कर रहा है, पर रास्ता अभी तक नहीं निकला है। हां, इतना जरूर हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के बोम्मई मामले में फैसले के बाद राज्यों में सरकारों की बर्खास्तगी का चलन खत्म हो गया और सरकारों के बनने-बिगड़ने का स्वीकृत सिद्धांत बन गया। इस बार के फैसले से राज्यों की प्रशासनिक स्वायत्तता बढ़ेगी और संवैधानिक पदों का कामकाज नियंत्रित होगा, जिसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ेगा। यह न्यायिक-हस्तक्षेप ऐसे समय में हुआ है, जब गैर-भाजपा दलों द्वारा शासित राज्यों में राज्यपालों और सरकारों के बीच तनाव चरम पर है। इस संवैधानिक सफलता का राजनीतिक श्रेय एमके स्टालिन की डीएमके सरकार को जाता है, पर वहीं मेडिकल प्रवेश के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ से छूट हासिल करने में तमिलनाडु सरकार को मुंह की खानी पड़ी है।

इस मामले को लेकर भी वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा चुके हैं, पर यह मामला उतना सरल नहीं है, जितना राज्यपालों के विशेषाधिकार का है। इस दौरान ‘नीट’ को लेकर कई तरह की शिकायतें सामने आई हैं, पर उच्चतम न्यायालय ने उसे लगातार बरकरार रखा है। राज्य सरकार ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है, पर संवैधानिक-व्यवस्थाएं उसके पक्ष में नहीं हैं।

पिछले कुछ महीनों में तमिलनाडु सरकार ने तीन भाषा सूत्र, चुनाव-क्षेत्र परिसीमन और नीट परीक्षा जैसे मसलों को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। तीनों मामलों के कारण राजनीतिक-कोलाहल तो हुआ है, पर बुनियादी तौर पर कुछ हुआ नहीं है। यह सब अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव की पूर्व-पीठिका तैयार कर रहे हैं। बुधवार को एमके स्टालिन की अध्यक्षता में विधायक दलों के प्रतिनिधियों की बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि तमिलनाडु सरकार चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए ‘नीट’ से राज्य को छूट दिलाने के लिए अपना कानूनी संघर्ष जारी रखेगी।

‘नीट’के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा 2023 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका के माध्यम से अपने प्रयासों को तेज करने के अलावा, आवश्यक हो तो एक नया मामला दायर करने के बारे में भी विधि-विशेषज्ञों से परामर्श किया जाएगा। पिछले हफ्ते ही खबर आई थी कि राष्ट्रपति ने ‘तमिलनाडु अंडरग्रेजुएट मेडिकल डिग्री कोर्सेस बिल, 2021’ को मंज़ूरी नहीं दी, जिसके बाद, मुख्यमंत्री ने विधायक दलों के प्रतिनिधियों की बैठक बुलाई थी। तमिलनाडु का यह विधेयक सितंबर, 2021 में विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया था। राज्यपाल द्वारा विधेयक लौटाए जाने के बाद फरवरी, 2022 में एक सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई थी। इसके बाद विधेयक को विधानसभा में फिर से पारित किया गया और राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया। केंद्र सरकार की सिफारिशों के आधार पर राष्ट्रपति ने इस विधेयक पर मंजूरी रोक दी। शुक्रवार 4 अप्रैल को विधानसभा में इसकी घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री स्टालिन ने केंद्र सरकार पर राज्य द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण की अनदेखी करने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा, ‘नीट’की शुरुआत के बाद, ग्रामीण और वंचित छात्रों के लिए मेडिकल कोर्स करना मुश्किल हो गया है, जो कोचिंग क्लास का खर्च नहीं उठा सकते। यह प्रणाली भविष्य में राज्य के ग्रामीण और अविकसित क्षेत्रों में प्रदान की जाने वाली चिकित्सा सेवाओं को भी प्रभावित करेगी। ‘नीट’ को शहरी छात्रों के पक्ष में बनाया गया है, जो कोचिंग क्लास का खर्च उठा सकते हैं। यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।

डीएमके की दीर्घकालीन राजनीति में केंद्र से प्रतिस्पर्धा एक महत्वपूर्ण कारक है। ‘नीट’ से छूट हासिल करना राज्य के दशकों पुराने नीतिगत विमर्श का फिलहाल अनिर्णीत अध्याय है। केंद्रीय नीति के खिलाफ राज्य का कानून बनाने का इतना लंबा कोई अन्य प्रयास नहीं रहा है। सितंबर, 2017 में, ‘नीट’ विरोधी दो विधेयकों का राष्ट्रपति भवन में यही हश्र हुआ। चार साल बाद, सत्तारूढ़ डीएमके ने, जिसने ‘नीट’ से छूट को अपना चुनावी वादा बनाया था, जस्टिस एके रंजन कमेटी की सिफारिशों के आधार पर विधानसभा में विधेयक पारित किया। राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए इसे आगे बढ़ाने के बजाय राज्यपाल आरएन रवि ने पहले इसे पांच महीने बाद सदन को लौटा दिया।

विधानसभा ने सर्वसम्मति से विधेयक को फिर से पास किया और उसे राज्यपाल के पास भेज दिया, जिसे उन्होंने राष्ट्रपति को अग्रसारित कर दिया। राज्य सरकार कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा के अंकों के आधार पर सरकारी कोटा मेडिकल सीटों के लिए प्रवेश आयोजित करने की अपनी नीति पर अड़ी हुई है। संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के अनुसार यदि किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाई गई विधि का कोई उपबंध केंद्रीय विधि के किसी उपबंध के प्रतिकूल है, तो संसद द्वारा बनाई गई विधि, प्रभावी होगी। चूंकि शिक्षा समवर्ती सूची में है, इसलिए केंद्रीय कानूनों के प्रतिकूल विधेयकों के लिए राष्ट्रपति से मंजूरी लेनी होती है।-प्रमोद जोशी

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