संपादकीय

पारदर्शिता की ओर

सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने पर जो सहमति जताई है, उसके पीछे कारण चाहे जो भी हो, वह सही दिशा में उठाया गया वाजिब कदम है। इससे न्यायपालिका में पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिलेगी और आम लोगों का उस पर भरोसा मजबूत होगा।

दूर होगा संदेह : देश में सुप्रीम कोर्ट को ऐसी संस्था के रूप में देखा जाता है, जो आम लोगों के लिए न्याय की आखिरी उम्मीद है। फिर भी जस्टिस यशवंत वर्मा के घर कथित तौर पर जली हुई नोटों की गड्डी मिलने जैसी घटनाओं और उनसे उपजे विवादों से कहीं न कहीं कुछ संदेह भी बनता है। जस्टिस वर्मा के मामले में आंतरिक समिति बनाई गई है। जांच से सारी बातें साफ हो जाएंगी, लेकिन यह भी जरूरी था कि इस घटना के चलते जो संदेह पैदा हुआ, उसे दूर किया जाए।

पुरानी बहस : यह विषय बहुत पुराना है कि न्यायधीशों को भी अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए। 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसके अनुसार हर न्यायाधीश को अपनी प्रॉपर्टी और देनदारियों के बारे में चीफ जस्टिस को बताना होता है। बाद में, एक और प्रस्ताव आया कि न्यायाधीश चाहें तो अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक कर सकते हैं।

अदालत में उठा मामला : पिछले लगभग तीन दशक में, यह मामला कई बार उठा है। सूचना का अधिकार लागू होने के बाद यह बहस भी हुई कि न्यायपालिका इसके दायरे में क्यों नहीं। इसके पीछे यही तर्क रहा कि किसी निजी जानकारी को तब तक साझा करने की जरूरत नहीं, जब तक उससे सार्वजनिक हित न जुड़े हों। 2010 और 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट में यह केस आया था, तब इसी नुक्ते को आधार बनाकर कहा गया कि जानकारी सार्वजनिक करना न्यायाधीशों की इच्छा पर है।

सरकार का स्टैंड : सरकार की एक संसदीय समिति ने 2023 में सिफारिश की थी कि न्यायाधीशों के लिए संपत्ति की घोषणा अनिवार्य की जाए। हालांकि सरकार इस मामले में आगे नहीं बढ़ी और बाद में कहा कि उसका ऐसा कोई इरादा भी नहीं है। यह रुख गलत नहीं कहा जा सकता। सरकार की तरफ से किया गया कोई भी प्रयास यह संदेश देता कि न्यायपालिका में अनावश्यक राजनीतिक दखल हो रहा है। न्यायपालिका की साख के लिए उसका स्वतंत्र होना और दिखना भी उतना ही जरूरी है।

सभी के लिए संदेश : हालांकि यह कदम काफी नहीं है। न्यायपालिका के कामकाज में कई तरह की गड़बड़ियां हैं। कई स्तरों पर न्यायिक सुधार के प्रयास आगे बढ़ाने की जरूरत है। लेकिन इस कदम से एक पॉजिटिव संदेश जरूर गया है कि सर्वोच्च अदालत के जज खुद को भी उन कसौटियों पर कसने में नहीं हिचकते जिन्हें वे दूसरों के लिए जरूरी मानते हैं।

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