संपादकीय

जेल में जंजाल

यह जेल अधिकारियों और अपराधियों की सांठगांठ की पराकाष्ठा ही है कि फिरोजपुर जेल के भीतर से 43 हजार फोन कॉल हुई और पांच हजार बैंक लेनदेन हुए। घटनाक्रम उजागर करता है कि जिन जेल अधिकारियों पर अपराधियों की सख्त निगरानी व समाज को भयमुक्त करने का जिम्मा है, वे अपराधियों से मिलीभगत करके व्यवस्था से विश्वासघात कर रहे हैं। जिस दायित्व के लिये सरकार उन्हें वेतन देती है, वे उससे छल ही कर रहे हैं। मानवीय मूल्यों के पतन की यह पराकाष्ठा ही है कि खाकी वर्दी में कुछ लोग निहित स्वार्थों व लालच के लिये समाज में तमाम लोगों के जीवन को संकट में डाल रहे हैं। उनकी इस संदिग्ध भूमिका से अपराधी अपने खतरनाक मंसूबों को जेल में रहते हुए भी अंजाम दे रहे हैं। यह संभव नहीं था कि बिना जेल अधिकारियों की मिलीभगत के अपराधी-तस्कर जेल के भीतर से अपराध का साम्राज्य चला सकें। यूं तो जेल-तंत्र में सडांध की खबरें पूरे देश से आती रहती हैं, लेकिन पंजाब में ऐसी खबरों की निरंतरता चिंताजनक है। अपराधी जेल के भीतर से निरंतर समानांतर शासन चला रहे हैं तो यह कानून के राज पर सवालिया निशान लगाता है। आखिर जेल के भीतर मोबाइल बिना जेलकर्मियों की मिलीभगत कैसे पहुंच रहे हैं? क्यों जेल के भीतर जैमर नहीं लगाए जाते ताकि अपराधी मोबाइलों का उपयोग न कर सकें? फिरोजपुर जेल के भीतर से 43 हजार फोन कॉल का होना, एक बड़े आपराधिक कृत्य को दर्शाता है। संभव है दुर्दांत अपराधियों के भय से कुछ जेल अधिकारी समर्पण करते हों। यदि ऐसा है तो उन्हें नैतिकता के आधार पर अपना पद छोड़ना चाहिए। आगे जांच से पता चलेगा कि बैंकिंग लेन-देन से किस-किस तक ड्रग मनी पहुंची और कौन इसका सूत्रधार था। निस्संदेह, इस आपराधिक कृत्य की व्यापक पैमाने पर जांच की जानी चाहिए। यह भी पड़ताल होनी चाहिए कि इन फोन कॉल में से कितनी परिजनों को की गई और कितनी अपराधियों को।

निस्संदेह, यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि क्या बैंक से लेन-देन जेल अधिकारियों को रिश्वत देने के लिये किया गया था? या यह धन नशीली दवाओं के भुगतान के लिये किया गया। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि देश की नामी जेलों में भी दुर्दांत अपराधियों को पांच सितारा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिये जेल अधिकारियों व कर्मचारियों को मोटी रकम चुकाई जाती है। निस्संदेह, यह खतरनाक खेल समाज में मानवीय मूल्यों के पतन की गाथा भी बताता है। दरअसल, फिरोजपुर जेल में जेल अधिकारियों की मिलीभगत से अपराधियों की इन करतूतों का मामला तब प्रकाश में आया था, जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए जेल में मोबाइल फोन के इस्तेमाल व नशीली दवाओं की तस्करी पर रिपोर्ट मांगी थी। कोर्ट ने पूछा था कि तीन तस्करों द्वारा अवैध रूप से इस्तेमाल किये गए फोन के जरिये जेल के अंदर से 43 हजार कॉल्स कैसे की गई। अदालत द्वारा इस मामले की जांच के आदेश दिये जाने के बाद पुलिस ने जेल विभाग के 11 अधिकारियों सहित 25 लोगों पर मामला दर्ज किया था। नौ जेल अधिकारियों के अलावा कुछ तस्करों, एक मोबाइल दुकान के मालिक और चाय के दुकानदार समेत 19 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इस जांच में जेल के भीतर से चलाए जा रहे ड्रग तस्करी के रैकेट का भी खुलासा हुआ। दो तस्करों की पत्नियों के खातों में करोड़ों रुपये का लेनदेन होने की बात सामने आई। निश्चित रूप से इन आपराधिक कृत्यों ने इस बात की जरूरत को बताया कि जेल अधिकारियों की कारगुजारी पर निगरानी रखने के लिये एक उच्चस्तरीय अधिकार संपन्न तंत्र विकसित किया जाए। जिसमें राज्य या केंद्र सरकार के उच्च पुलिस अधिकारी ऐसी किन्हीं साजिशों व कानून की अवहेलना की निगरानी रख सकें। इतना ही नहीं जेल अधिकारियों पर निगरानी के लिये नागरिकों के स्तर पर कोई व्यवस्था होनी चाहिए। निस्संदेह, जेल के भीतर से अपराधों का संचालन किसी कानून के राज पर सवालिया निशान की तरह है, जिस पर नियंत्रण बेहद जरूरी है।

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