राष्ट्रीय

होली के अब बदरंग होते रंग

होली आ गई। इस त्यौहार के बारे में सोचते ही तरह-तरह के गाने कानों में गूंजते रहते हैं। अमिताभ बच्चन की आवाज में ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे’ या कि ‘आज बिरज में होली रे रसिया’ फाल्गुन का महीना शुरू होते ही होली की आहट सुनाई देने लगती है। जिस ब्रज प्रदेश से आती हूं वहां की होली के तो कहने ही क्या। मथुरा-वृंदावन में रंगों के साथ-साथ फूलों और दही की होली भी खेली जाती है। यह उत्सव 7 दिन चलता है। बरसाने की लट्ठमार होली को तो दूर-दूर से लोग देखने आते हैं। 

बचपन में गांव-गांव होली के हुरियारे घरों की स्त्रियों को गुलाल लगाने और उन पर रंग डालने के लिए उद्धृत रहते थे और महिलाएं हाथों में कपड़ों से बने कोड़े थामे रहती थीं। एक तरह से प्रतियोगिता होती थी कि कौन रंग लगाता है, कौन कोड़े खाता है। सब कुछ हास-परिहास से भरा हुआ। कीचड़ की होली भी खूब होती थी। रंगों की होली से एक दिन पहले पूजा वाली होली होती थी। लकड़ी, उपले और जो मिला उससे होली सजाई जाती थी। दिलचस्प यह होता था कि यदि किसी की लकड़ी की बुनी  चारपाई मिल गई तो उसे भी होली के हवाले कर दिया जाता था।

इसलिए इस दौरान अपने घरों की चारपाइयों और उपलों को घर के भीतर ही रख दिया जाता था क्योंकि इस अवसर पर न किसी से कोई शिकायत की जाती थी न ही कोई शिकायत सुनता था। सब कुछ आनंद और मजे के लिए था। घरों में गोबर की गूलरियां महीने भर पहले बना-बनाकर सुखा ली जाती थीं और आंगन में छोटी होली जलती थी। गांव भर के लोग गेहूं की बालियां लेकर घर-घर जाते थे। उन्हें भूनकर खाने का रिवाज था। जिस घर में कोई शोक हुआ, उस बहाने नवान्न देकर, इस अवसर पर उस घर का शोक भी उठाया जाता था यानी  कि शोक अब विदा हुआ। फिर से जीवन की गति और आनंद में शामिल हो जाओ।

यह नवान्न यानि कि अब उपयोग के लिए नया अन्न आ गया  और सबके घर धन-दृधान्य से भरे रहें। वैसे भी कृषि समाजों में उत्सवों की टाइमिंग वही है, जब खेतों में फसल तैयार होती है, खेतों में कोई खास काम नहीं होता और लोगों के पास आम तौर पर उत्सव मनाने के लिए समय होता है। इस अवसर पर  घरों में तरह-तरह के पकवान बनते थे। गुझिया, नमकीन, कांजी, दही बड़े और दिलचस्प यह है कि हर घर में बने पकवानों का स्वाद अलग। शाम को सबके घरों में होली मिलन के लिए जाया जाता था और इन पकवानों का आनंद लिया जाता था।  यही भारतीय खान-पान की विशेषता भी है। फाल्गुन शुरू होते ही शाम के वक्त आंगन में आटे का चौक पूरकर उसे सत्यानाशी के पीले फूलों से सजाया जाता था। फिर ढोलक पर फाग गाया जाता था। इसमें मोहल्ले भर की स्त्रियां इकट्ठी हो जाती थीं। खूब गाना-बजाना, नाच भी होता था। एक तरह  से ये स्त्रियों के मनोरंजन और अभिव्यक्ति का उत्सव भी था। 

अब वक्त बदल गया है। जो पकवान घरों में बनते थे, सबके सब बाजार में उपलब्ध हैं। महानगरों में कामकाजी महिलाओं के पास इतना समय भी नहीं कि वे इन सबको घर में बना सकें। लेकिन फिर भी होली रंगों का उत्सव है। मेल-मिलाप और गिले-शिकवे मिटाने का अवसर भी है। एक बार होली से कुछ दिन पहले  मध्य प्रदेश के कान्हा नैशनल पार्क गई थी। यह पार्क बाघों के लिए मशहूर है। हम सौभाग्यशाली थे कि बाघ हमें दिखा भी था। यात्रा की शुरूआत से ही चारों ओर ऊंचे-ऊंचे घने पेड़, चिडिय़ों की चहचहाअट, न धूल, न धुआं, बस शांति ही शांति।कुछ दूर गए तो लगा जैसे आसमान लाल हो गया। हर तरफ  खिले हुए पलाश के फूल ही फूल। इन्हें अंग्रेजी में फ्लेम आफ  फारैस्ट कहा जाता है।

महान बंगला उपन्यासकार विभूतिभूषण बंधोपाध्याय ने अपने उपन्यास आरण्यक में पलाश के जंगल के बारे में लिखा है। इसे देखकर लगता है जैसे जंगल में आग लग गई हो। पलाश का एक नाम टेसू भी है। इनके फूलों को सुखाकर होली के अवसर पर पीला रंग भी तैयार किया जाता है। इसे आर्गेनिक रंग भी कहते हैं जिसका कोई नुकसान भी नहीं है। घरों में इन्हें पानी में भिगोकर रंग तैयार किया जाता है। यह पीला होता है। अकसर होली के अवसर पर कहा जाता है कि मिलावटी रंगों और मिलावटी गुलाल से बचें। इनके प्रयोग से त्वचा और आंखों को नुकसान हो सकता है। मिठाइयों में मिलावट की बात भी होती है। यह बात सच है कि रासायनिक रंग और गुलाल हानिकारक हैं, मगर अगर थोड़ा-बहुत उपयोग कर रहे हैं, तो कर सकते हैं। बस आखों को बचाएं और सांस में न जाने पाए। खैर, इन सब बातों से इतर होली एक ऐसा त्यौहार है, जिसे हंसी-खुशी का त्यौहार कहा जाता है। होली खेलने के बाद शाम को होली मिलन का अर्थ पुराने गिले-शिकवे भुला देना भी है।-क्षमा शर्मा

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