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महाकुंभ का पर्व…

सोशल वर्क के न जाने कितने सिद्धांत पढ़ लिए। सब कुछ उपनिवेशवादी शासकों द्वारा सिखाए गए। उत्तर भारत, दक्षिण भारत, एसटी, एससी, मंगोल, द्राविड़, न जाने कितनी कितनी बातें। भारत को तोडऩे वाली बातें। लेकिन भारत के लोगों का यह महा उत्सव तो खुद भारतीयों ने सजाया था। ऐसा उत्सव जहां पैंसठ करोड़ भारतीय आ-जा रहे थे। मुझे आशा थी भारतीय विश्वविद्यालयों के समाजशास्त्र और सोशल वर्क विभागों के तंबू तो महाकुंभ में सज गए होंगे क्योंकि ‘केस स्टडी’ के लिए यह अवसर फिर कब मिलेगा, पर ऐसा नहीं हुआ…

महाकुंभ का पर्व दो दिन पहले शिवरात्रि के दिन समाप्त हो गया। कुंभ पर्व तो आगे भी आते रहेंगे लेकिन ग्रह नक्षत्रों का इस प्रकार का संयोग अब 144 साल बाद ही आएगा। जितने श्रद्धालु इस कुंभ के अवसर पर संगम में स्नान करने के लिए प्रयागराज आए, उन्होंने किसी भी जमावड़े में संख्या के हिसाब से विश्व के सब नए-पुराने रिकार्ड तोड़ दिए हैं। इस महाकुंभ में एक अनुमान के अनुसार 65 करोड़ श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई। मैं भीड़ से प्राय: डरता हूं। इसलिए रेलगाड़ी में टिकट बुक करवा कर भी यात्रा से बचता रहा। लेकिन कनाडा से बेटा तपन फोन करता रहा कि कुंभ का इस प्रकार का संयोग अब न आपके जीवन काल में आएगा और न ही हमारे जीवन काल में आएगा। इसलिए प्रयागराज जाना अनिवार्य ही है। वैसे छोटा भाई विजय कुमार तो अमेरिका से कुंभ स्नान के लिए पहुंच गया था। एक चार्टड रेलगाड़ी प्रयागराज जा रही थी, छोटे भाई देवदत्त ने उसमें सीटें आरक्षित करवा ली थीं। लेकिन गाड़ी में अव्यवस्था देखकर वह अपने बेटे समेत शिव शंकर का नाम लेकर चंडीगढ़ से प्रयागराज जाने वाली बस में सवार हो लिया। बस को 18 घंटे में प्रयागराज पहुंचना था, लेकिन उसने यह काम 29 घंटों में किया। वहां जाकर कितना पैदल चलना पड़ा, इसका हिसाब न भी लगाएं तो वापसी की बस दो जगह खराब हो गई तो लिफ्ट ले-लेकर वापस आना पड़ा। भानजा अमित कार में ही प्रयागराज पहुंच गया था। उसके बावजूद उसे लगभग बीस किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। ऐसी साहसपूर्ण कहानियों ने मुझे हौसला दिया। वैसे प्रयागराज में जाने को लेकर तपन की अम्मा का उत्साह कभी भी मद्धम नहीं हुआ था।

उधर जैसे-जैसे कुंभ को लेकर देश में उत्साह और श्रद्धा का उफान आया हुआ था, वैसे-वैसे विपक्षी दलों में निराशा घर करती जा रही थी। लेकिन गहराई से जांचने पर पता चलता था कि यह निराशा कुंभ को लेकर नहीं थी। कुंभ में आस्था बराबर थी और बिना राजनीतिक भेदभाव से सभी संगम पर जा रहे थे, लेकिन दिल्ली, लखनऊ में अपनी राजनीतिक निराशा को जरूर व्यक्त कर रहे थे। ममता बनर्जी तो इतना घबरा गईं कि कुंभ का नाम भूल कर उसे मृत्यु कुंभ ही कहने लगीं। लालू यादव भी विष्णु सहस्रनामा पढ़ते-पढ़ते बड़बड़ाने लगे कुंभ बकबास है। यादवों ने जाकर समझाया क्यों महाराज बुढ़ापे में अंट-संट बतिया रहे हो। बीमारी ठिमारी के चलते आप का भीड़भाड़ में जाना ठीक नहीं है, लेकिन बिरादरी को तो बदनाम मत कीजिए। अखिलेश यादव संगम में नहाते भी जा रहे थे और चचिया भी रहे थे, लेकिन चच्चा को लेकर नहीं गए त्रिवेणी घाट। राजनीति जो न कराए सो थोड़ा। सारा भारत प्रयागराज की ओर चला हुआ था और सारा विपक्ष संगम स्नान भी कर रहा था और स्नान के बाद गिरिया भी रहा था। इस प्रकार के वातावरण में हमने भी प्रयागराज की तैयारी ठानी। प्रयागराज में हिंदुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी के ब्यूरो चीफ राजेश तिवारी पहले से ही मोर्चा संभाले थे। मैं भी कभी हिंदुस्तान समाचार के निदेशक मंडल में रहा था। बात चाहे पुरानी थी, लेकिन थोड़ा बहुत लिहाज अब भी बचा हुआ था। इसलिए पहले वहीं बात करना जरूरी समझा। तिवारी जी को फोन मिलाया और मेरा सौभाग्य था कि उन्होंने उठा भी लिया। मैंने प्रयागराज आने की अपनी इच्छा जाहिर की तो उन्होंने सलाह दी कि बारह और तेरह को यहां आने से बच सकते हैं तो ठीक रहेगा, क्योंकि इन दिनों भीड़ बहुत ज्यादा होगी। लेकिन मेरी असली जिज्ञासा यह खबर निकालने की थी कि कहीं एक दिन रहने की व्यवस्था क्या संभव है। इसका उत्तर तिवारी जी ने सकारात्मक दिया। उनका कहना था कि सरकार ने नेशनल मीडिया के लिए एक बड़ा आवास बनाया हुआ था, जिसमें अनेकों सैट ठहरने के लिए उपलब्ध थे। केवल उपलब्ध ही नहीं, बल्कि नि:शुल्क थे। मेरे लिए उस दिन की यही हैडलाईन थी। चौदह फरवरी को चंडीगढ़ से पहली फ्लाईट प्रयागराज के लिए पकड़ी।

राजेश तिवारी जी का भाई वहां आया हुआ था। वहां से निकले तो उत्साह में थे, लेकिन जैसे जैसे शहर के नजदीक पहुंचे तो मामला बिगड़ गया। सारे रास्ते जाम थे। पैदल चलने वालों का हुजूम था। युवा-युवतियां। बच्चे-बूढ़े। सिर पर गठरियां। एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए। हर हर महादेव। कुछ-कुछ तो दूर-दूर से पैदल ही आ रहे थे। जिनकी बस या ट्रक जहां रुक गया या रोक दिया गया, वहीं से पैदल चले आ रहे थे। कौन कितने किलोमीटर से चला आ रहा था, यह जान लेना कठिन था। लेकिन हैरानी की बात कि किसी के चेहरे पर थकान नहीं बल्कि उत्साह था। हर हर महादेव। तिवारी जी समझ गए कि अब इस जनसमूह से पार पाना मुश्किल है। उन्होंने अपनी गाड़ी शहर के अंदर के रास्तों पर मोड़ ली। कभी एक रास्ता कभी दूसरा। कोई बंद कोई खुला। लगभग दो बजे हम एक ऐसे स्थान पर पहुंच गए जहां से आगे जाना मुश्किल था। वहां से पांव पांव चले। लेकिन श्रद्धालुओं का अब तक महासागर बन गया था। नजदीक ही मीडिया के लिए बनाए गए कार्यालय थे। शुक्र था कि हिंदुस्तान समाचार का कार्यालय सबसे नजदीक था। वहां पहुंचकर तसल्ली हुई। राजेश तिवारी वहीं थे। उन्होंने चाय पिलाई। कुछ खाने के लिए मीठा भी। ‘कुछ मीठा हो जाए’ वाला मीठा नहीं बल्कि दूध से बना मीठा जिसे पंजाब में खोआ कहा जाता है। उसके बाद निकले नहाने के लिए। राजेश तिवारी जी नंगे पांव ही चले।

अब हम सब जन सैलाब का हिस्सा थे। बड़ी उम्र के लोग। छोटे बच्चे पांच-छह साल तक के। एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए। कुछ लोगों ने रस्सी भी पकड़ रखी थी। कुछ भी हो जाए रस्सी को नहीं छोडऩा है। बड़ी उम्र के जो लोग चल नहीं सकते थे उनके परिवार वाले उनको किसी रेहड़ीनुमा गाड़ी पर लिटा कर खींच रहे थे। संगम पर स्नान हर हालत में करना है। यह अवसर अब फिर कहां मिलेगा। इतना पढ़ते-सुनते रहे थे कि भारत में छूतछात है। एक जाति के लोग दूसरी जाति के व्यक्ति के हाथ का छुआ नहीं खाते। यह सबसे पढ़ते-पढ़ते आंखें पथरा गईं। समाजशास्त्र के अध्यापक इसे पढ़ाते-पढ़ाते खुद भी पक गए। सोशल वर्क के न जाने कितने सिद्धांत पढ़ लिए। सब कुछ उपनिवेशवादी शासकों द्वारा सिखाए गए। उत्तर भारत, दक्षिण भारत, एसटी, एससी, मंगोल, द्राविड़, न जाने कितनी कितनी बातें। भारत को तोडऩे वाली बातें। लेकिन भारत के लोगों का यह महा उत्सव तो खुद भारतीयों ने सजाया था। ऐसा उत्सव जहां पैंसठ करोड़ भारतीय आ-जा रहे थे। मुझे आशा थी भारतीय विश्वविद्यालयों के समाजशास्त्र और सोशल वर्क विभागों के तंबू तो महाकुंभ में सज गए होंगे क्योंकि ‘केस स्टडी’ के लिए यह अवसर फिर कब मिलेगा। भेद तलाशने वाले अकादमीशियन भारत के ‘अभेद’ होने का दृश्य भी देख लेंगे। केस स्टडी से अपने निष्कर्षों में भी शायद कुछ परिवर्तन करेंगे। लेकिन इस ‘भारत उत्सव’ में भारत तो था लेकिन भारत को समझने का दावा करने वाले गायब थे। शायद वे भारत का सामना करने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। हम संगम पर पहुंच गए थे। यह महाकुंभ ऐसा महाकुंभ है, जहां आधे से अधिक भारतीयों ने पवित्र स्नान किया।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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