महंगाई के डर पर ग्रोथ के संकल्प की जीत…

यह इस तथ्य को साबित करता है कि डब्ल्यूपीआई की तुलना में सीपीआई सही लक्ष्य नहीं है। हम समझते हैं कि सीपीआई खाद्य कीमतों से काफी प्रभावित होता है। तीसरा, हालांकि अकेले सीपीआई, मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के लिए उपयुक्त एंकर नहीं लगता है, थोक मूल्य सूचकांक भी सर्वथा उचित लक्ष्य नहीं है…
एक लंबे समय (लगभग पांच साल) तक भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को लगातार बढ़ाने के बाद पहली बार रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की दर में कटौती करते हुए उसे 6.5 प्रतिशत से घटा कर 6.25 किया है। यह फैसला हाल ही में संपन्न मौद्रिक नीति समिति की बैठक में किया गया। जानकारों का मानना है कि इससे उधार सस्ता हो जाएगा, जिससे हाऊसिंग और अन्य प्रकार के उधारों पर ईएमआई कम हो जाएगी, जिससे हाऊसिंग और उपभोक्ता मांग को बल मिलेगा। साथ ही साथ बिजनेस के लिए भी उधार सस्ता हो सकेगा, जिससे ग्रोथ को गति मिल सकेगी। हाल ही में मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के तीन सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने के बाद सरकार ने एमपीसी में तीन नए सदस्यों की नियुक्ति की है। हालांकि यह पता नहीं चल पाया है कि किसने क्या कहा, लेकिन ऐसा लगता है कि नए सदस्यों के साथ-साथ कुछ पुराने सदस्यों ने भी रेपो रेट में कटौती का समर्थन किया है। उल्लेखनीय है कि पिछली दो एमपीसी बैठकों में, बाह्य सदस्यों अशिमा गोयल और जयंत वर्मा ने दरों में कटौती के पक्ष में मतदान किया था, तथा तर्क दिया था कि आरबीआई द्वारा दरें ऊंची रखने पर जोर देने से विकास को नुकसान हो रहा है। जबकि अन्य चार सदस्य इसके खिलाफ थे। स्पष्ट है कि एमपीसी में नए सदस्यों के आने से रेट घटाने का रास्ता साफ हो गया। इस बार महंगाई के थोड़ा कम होने से रेपो दर में 0.25 प्रतिशत बिंदु की कमी की गई है। भविष्य में महंगाई दर कम रहने के संकेत और अनुमान के साथ हम रेपो रेट में और कटौती की उम्मीद कर सकते हैं, जिससे मांग में विस्तार से अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
ब्याज दर घटाने में क्या थी अन्य अड़चनें : ब्याज दरों में बदलाव या ठहराव देश की मौद्रिक नीति का एक मुख्य आयाम होता है, और इन्हें देश का केन्द्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक निर्धारित करता है। दुनिया भर में नीतिगत ब्याज दरें अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती हैं। इसमें बैंक दर, रेपो दर, रिवर्स रेपो दर आदि शामिल होते हैं। 2016 में सरकार ने निर्णय लिया कि ब्याज दर का निर्धारण मौद्रिक नीति समिति करेगी, जिसमें रिजर्व बैंक के गर्वनर से अलावा 6 सदस्य होते हैं। बराबर के वोट होने पर रिजर्व बैंक के गर्वनर का वोट निर्णायक होता है। मौद्रिक नीति समिति 27 जून 2016 को पहली बार अस्तित्व में आई। मौद्रिक नीति समिति के लिए यह निर्धारित किया गया कि वो देश में महंगाई की दर को ध्यान में रखते हुए ही ब्याज दर का निर्धारण करेगी। यह तय किया गया कि महंगाई दर को 4 प्रतिशत, जमा-घटा 2 प्रतिशत की सीमा में रखने का लक्ष्य रखा जाए। इसे तकनीकी भाषा में महंगाई लक्ष्य यानी ‘इनफ्लेशन टारगेटिंग’ कहा जाता है। सामान्यत: भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति के बारे में अपनी धारणा के आधार पर ब्याज की नीतिगत दरों की घोषणा करता है। लेकिन इसके साथ ही अर्थव्यवस्था में ऋण की मांग और आपूर्ति पर भी इसे नजर रखनी होती है। इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक का मुख्य उद्देश्य मुद्रास्फीति को उसकी सीमा के बाहर जाने से रोकना है। हालांकि इनफ्लेशन टारगेटिंग तो 2016 से ही शुरू हुई थी, लेकिन 2014 से पहले, भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति को लक्षित करने के लिए थोक मूल्य सूचकांक का उपयोग कर रहा था। 2014 में, जब रघुराम राजन भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर थे, तब भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन डिप्टी गवर्नर उर्जित पटेल की अध्यक्षता में एक समिति ने मुद्रास्फीति को लक्षित करने के लिए थोक मूल्य सूचकांक के बजाय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के उपयोग की सिफारिश की थी। उल्लेखनीय रूप से, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य उत्पादों का भार 46 प्रतिशत होता है, जबकि थोक मूल्य सूचकांक में खाद्य उत्पादों (निर्मित खाद्य उत्पादों सहित) का भार केवल 30 प्रतिशत ही होता है। यानी कहा जा सकता है कि मौद्रिक नीति समिति द्वारा अब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का उपयोग अनिवार्य हो गया, जिसमें खाद्य उत्पादों का भार ज्यादा होता है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार को विरासत में ही ऊंची मुद्रास्फीति मिली थी।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक दोनों ही तेजी से बढ़ रहे थे। यूपीए सरकार के अंतिम 3-4 सालों (जुलाई 2011-2014 तक) में ऊंची मुद्रास्फीति के चलते रेपो रेट काफी अधिक 7.25 से 8.5 प्रतिशत तक बनी रही। विरासत में मिली 8.00 प्रतिशत रेपो रेट को एनडीए सरकार के शुरुआती वर्षों, महंगाई के थमने के साथ अगस्त 2017 तक 6.00 प्रतिशत तक लाया गया। लेकिन 2016 में मौद्रिक नीति समिति के अस्तित्व में आने के बाद थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति में कमी आने के बावजूद सीपीआई मुद्रास्फीति लक्ष्य पर आधारित रेपो दर बढऩे लगी। थोड़ा बढ़ते-घटते यह जून 2019 में 6.00 से 6.5 प्रतिशत तक उच्च स्तर पर बनी रही। एनडीए सरकार के बाद के वर्षों में, सीपीआई में भी काफी गिरावट आई थी, और यह 3 प्रतिशत से भी कम पर बनी रही। मई 2020 और मई 2022 के बीच लंबी अवधि में रेपो दर मात्र 4.00 प्रतिशत के निम्न स्तर पर बनी रही। लेकिन उसके बाद मुद्रास्फीति और खास तौर पर सीपीआई मुद्रास्फीति की ऊंची दर के चलते रेपो दर लगातार बढ़ते हुए फरवरी 2023 तक 6.5 प्रतिशत तक पहुंच गई और पिछली मौद्रिक नीति समिति की बैठक तक इसी स्तर पर बनी रही। हालांकि इस दौरान थोक मुद्रास्फीति कई बार नीचे भी आई, लेकिन सीपीआई मुद्रास्फीति लक्षित मौद्रिक नीति के चलते रेपो रेट को मौद्रिक नीति समिति ने नहीं घटाया।
मुद्रास्फीति लक्षित मौद्रिक नीति पर मतभेद : कई अर्थशास्त्रियों ने अब सीपीआई आधारित मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। हालांकि, मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आम जनता मुद्रास्फीति से परेशान न हो, क्योंकि इसका सबसे अधिक असर गरीबों पर पड़ता है, लेकिन मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के आधार के रूप में सीपीआई या यहां तक कि डब्ल्यूपीआई की उपयुक्तता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सर्वप्रथम, मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण का विचार पश्चिम से आयातित विचार है। हम समझते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश में मौद्रिक नीति के उद्देश्यों में विकास, रोजगार और गरीबों तथा वंचितों का उत्थान शामिल है। इन उद्देश्यों को संबोधित किए बिना कोई भी मौद्रिक नीति पूरी नहीं होती है। दूसरा, अगर हम देखें तो ऐसे कई मौके आए हैं, जब एमपीसी द्वारा सीपीआई आधारित मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण का पूर्णरूपेन पालन करने के बावजूद, मुद्रास्फीति न केवल नियंत्रित नहीं हुई, बल्कि कई मौकों पर 6 प्रतिशत के लाल निशान को भी पार कर गई। यह इस तथ्य को साबित करता है कि डब्ल्यूपीआई की तुलना में सीपीआई सही लक्ष्य नहीं है। हम समझते हैं कि सीपीआई खाद्य कीमतों से काफी प्रभावित होता है। तीसरा, हालांकि अकेले सीपीआई, मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के लिए उपयुक्त एंकर नहीं लगता है, थोक मूल्य सूचकांक भी सर्वथा उचित लक्ष्य नहीं है। इसलिए कुछ लोग सुझाव देते हैं कि इन दो सूचकांकों का अवश्य ही संयोजन या मिश्रण होना चाहिए।
क्या सीपीआई आधारित मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का एजेंडा है : जबकि विकासशील देश मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के बारे में बहस कर रहे हैं, न केवल मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की अनिवार्यता के बारे में, बल्कि विकासशील देशों के लिए मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सीपीआई लक्षित मौद्रिक नीति हेतु दबाव डाल रहा है। यह कुछ ऐसा है, जो आपत्तिजनक है।-डा. अश्वनी महाजन



