राजनीति

क्या अपने ‘झूठ’ में खुद फंस गए राहुल? संघ प्रमुख भागवत ने जो कहा ही नहीं उस बात पर विवाद

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा इंदौर के एक कार्यक्रम में स्वतंत्रता दिवस और अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पर दिए गए वक्तव्य से देश में बवंडर मचा हुआ है। विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि संघ 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता दिवस मानता ही नहीं और भागवत ने 22 जनवरी, 2024 यानी पौष शुक्ल द्वादशी से स्वतंत्रता दिवस मानने और मनाने की अपील की है।

भारतीय राज्य से संघर्ष

उसके बाद राहुल गांधी का बयान सबसे ज्यादा चर्चा और बहस में है कि भागवत ने जो कहा, वह संघ का विचार है और हम उसी के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने अपने केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर यहां तक कह दिया कि यह मत मानिए कि हमारा संघर्ष केवल संघ और BJP जैसे किसी राजनीतिक संगठनों से है। हमें पूरे इंडियन स्टेट यानी भारतीय राज्य से संघर्ष करना है।

सपने साकार होंगे

संघ प्रमुख के इंदौर के भाषण के विडियो उपलब्ध हैं। इसमें वह कह रहे हैं, ‘भारत स्वतंत्र हुआ 15 अगस्त को। राजनीतिक स्वतंत्रता आपको मिल गई। हमारा भाग्य निर्धारण करना हमारे हाथ में है। हमने एक संविधान भी बनाया, एक विशिष्ट दृष्टि, जो भारत के अपने स्व से निकलती है, उसमें से वह संविधान दिग्दर्शित हुआ, लेकिन उसके जो भाव हैं, उसके अनुसार चला नहीं और इसलिए, ‘हो गए हैं स्वप्न सब साकार कैसे मान लें, टल गया सर से व्यथा का भार कैसे मान लें।’

गांधी की आपत्ति

महात्मा गांधी ने 15 अगस्त, 1947 को कोई वक्तव्य जारी नहीं किया। उन्होंने अपने साथियों से कहा था कि क्या ऐसे ही स्वराज के लिए हमने संघर्ष किया था? उन्होंने स्पष्ट लिखा कि हमें अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिल गई किंतु सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए पहले से ज्यादा लंबे संघर्ष और परिश्रम की आवश्यकता है। क्या इस आधार पर आप गांधी जी को स्वतंत्रता दिवस विरोधी घोषित कर देंगे?

विरोधियों का झूठ

भागवत की अगली पंक्ति भी देखनी चाहिए,‘स्वतंत्रता में जो स्व का अधिष्ठान होता है, वह लिखित रूप में हमने संविधान से पाया है, लेकिन अपने मन को उसकी पक्की नींव पर आरूढ़ नहीं किया है। हमारा स्व क्या है? राम, कृष्ण, शिव, ये क्या केवल देवी-देवता हैं, या केवल उनकी पूजा करने वालों के हैं? ऐसा नहीं है। राम उत्तर से दक्षिण भारत को जोड़ते हैं।’ उन्होंने कहीं नहीं कहा कि पौष शुक्ल द्वादशी को स्वतंत्रता दिवस मनाना है। इसे प्रतिष्ठा द्वादशी के नाम से संपूर्ण देश से मनाने की अपील की।

मुक्ति का सतत संघर्ष

थोड़ा दुष्प्रचारों से अलग होकर सोचिए कि आखिर आक्रमणकारियों ने हमारे धर्मस्थलों पर हमले कर उनको ध्वस्त क्यों किया? इसीलिए कि हमारा स्व मर जाए। उन स्थलों, प्रतिस्थापित प्रतिमाओं या निराकार स्वरूपों को लेकर हमारे अंदर का आस्था विश्वास नष्ट हो। आक्रमण, ध्वंस, जबरन निर्माण और दासत्व के समानांतर प्रतिकार व मुक्ति के संघर्ष सतत चलते रहे। गुरु गोविंद सिंह, छत्रपति शिवाजी, लाचित बरफुकन आदि हमारे लिए स्वतंत्रता के महान सेनानी थे या नहीं?

संस्कृति का प्रतीक

इस संदर्भ में अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की मुक्ति का आंदोलन किसी के विरोध के लिए नहीं, स्व जागृत करने और पाने के लिए था। राजनीतिक नेतृत्व इस रूप में इसे लेता तो आंदोलन इतना लंबा चलता ही नहीं। भागवत ने कहा कि यह दिन अयोध्या में राम मंदिर के पुनर्निर्माण और भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना का प्रतीक बन गया है, जिनके लिए अयोध्या आंदोलन ही गलत हो वे इस भाव को नहीं समझ सकते।

झूठ फैलाना गलत

फिर भी यह स्वीकार किया जा सकता है कि किसी का भागवत या संघ की सोच से मतभेद होगा। किंतु जो उन्होंने कहा, बहस उस पर होगी या जो कहा नहीं, उस पर? क्या इस तरह का झूठ फैलाना और लोगों के अंदर गुस्सा, उत्तेजना, हिंसा का भाव पैदा करना संविधान की प्रतिष्ठा है?

नक्सलियों की बोली

सच यह है कि भागवत का भाषण नहीं होता तब भी किसी बहाने राहुल गांधी को यह सब बोलना ही था। वह परंपरागत माओवादी, नक्सलवादी या आरंभिक कम्युनिस्टों की तरह की भाषा लगातार बोल रहे हैं। वे लोगों को भड़काने के लिए यही बोलते थे कि धार्मिक कट्टरपंथियों, फासिस्ट शक्तियों का विस्तार हो रहा है, पूंजीपति-उद्योगपति शोषण के आधार पर सत्ता का लाभ लेते हुए धन इकट्ठा कर रहे हैं और इसलिए राज्य व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। यही बात राहुल गांधी बोल रहे हैं।

कांग्रेसी भी विचार करें

वास्तव में संघ प्रमुख ने एक संतुलित विचार दिया, लेकिन राहुल गांधी की बात हिंसा और उत्तेजना पैदा करने वाली है। कांग्रेस के परंपरागत नेताओं को भी विचार करना चाहिए कि क्या इस सोच से उनका जनसमर्थन बढ़ेगा? क्या यह उन मूल्यों के विरुद्ध आघात नहीं होगा जिनके लिए स्वतंत्रता संघर्ष हुआ?

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