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रामचरित मानस खंड-15 जब राम भरत मिलाप देखकर भयभीत हो गए स्वर्ग में देवता

राम अपनी पूरी भव्यता-दिव्यता के साथ उसमें विराजमान हो रहे हैं. इस पावन अवसर पर अपने पाठकों के लिए तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कथा का हिंदी रूपांतरण पेश है इसका 15वां खंड.

सबके मन में यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता! श्रीरामचंद्रजी का अयोध्या जाना होगा या नहीं. भरतजी को न तो रात को नींद आती है, न दिन में भूख ही लगती है. वे पवित्र सोच में ऐसे विकल हैं, जैसे नीचे (तल) के कीचड़ में डूबी हुई मछली को जल की कमी से व्याकुलता होती है. भरतजी सोचते हैं राज्याभिषेक किस प्रकार हो, मुझे तो एक भी उपाय नहीं सूझ पड़ता. गुरुजी की आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्या को लौट चलेंगे. परंतु मुनि वसिष्ठजी तो श्रीरामचंद्रजी की रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे. माता कौशल्याजी के कहने से भी श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं; पर भला, श्रीरामजी को जन्म देने वाली माता क्या कभी हठ करेगी? मुझ सेवक की तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है और विधाता प्रतिकूल है. यदि मैं हठ करता हूं तो यह घोर कुकर्म होगा, क्योंकि सेवक का धर्म शिवजी के पर्वत कैलास से भी भारी है. एक भी युक्ति भरतजी के मन में न ठहरी. सोचते-ही-सोचते रात बीत गई. भरतजी प्रातःकाल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचंद्रजी को सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजी ने उनको बुलवा भेजा. भरतजी गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गए. उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री आदि सभी सभासद आकर जुट गए.

श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले- हे सभासदो! हे सुजान भरत! सुनो. सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्रीरामचंद्र धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान हैं, वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेद की मर्यादा के रक्षक हैं. श्रीरामजी का अवतार ही जगत के कल्याण के लिए हुआ है. वे गुरु, पिता और माता के वचनों के पिता और माता के वचनों के अनुसार चलने वाले हैं. दुष्टों के दल का नाश करने वाले और देवताओं के हितकारी हैं. नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थ को श्रीरामजी के समान यथार्थ कोई नहीं जानता. ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चंद्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल. शेषजी और राजा आदि जहां तक प्रभुता है, और योग की सिद्धियां, जो वेद और शास्त्रों में गाई गई हैं, हृदय में अच्छी तरह विचार कर देखो, तो यह स्पष्ट दिखाई देगा कि श्रीरामजी की आज्ञा इन सभी के सिर पर है. अतएव श्रीरामजी की आज्ञा और रुख रखने में ही हम सबका हित होगा. इस तत्त्व और रहस्य को समझकर अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो. श्रीरामजी का राज्याभिषेक सबके लिए सुखदायक है. मंगल और आनंद का मूल यही एक मार्ग है. अब श्रीरघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें? विचारकर कहो, वही उपाय किया जाए. मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी की नीति, परमार्थ और स्वार्थ लौकिक हित में सनी हुई वाणी सबने आदरपूर्वक सुनी. पर किसी को कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले हो गए. तब भरत ने सिर नवाकर हाथ जोड़े और कहा- सूर्यवंश में एक-से-एक अधिक बड़े बहुत से राजा हो गए हैं. सभी के जन्म के कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मों का फल विधाता देते हैं.

आपकी आशीष ही एक ऐसी है जो दुखों का दमन करके, समस्त कल्याणों को सज देती है; यह जगत जानता है. हे स्वामी! आप वही हैं जिन्होंने विधाता की गति (विधान) को भी रोक दिया. आपने जो निश्चय कर दिया उसे कौन टाल सकता है? अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है. भरतजी के प्रेममय वचनों को सुनकर गुरुजी के हृदय में प्रेम उमड़ आया. वे बोले- हे तात! बात सत्य है, पर है रामजी की कृपा से ही. रामविमुख को तो स्वप्न में भी सिद्धि नहीं मिलती. हे तात! मैं एक बात कहने में सकुचाता हूं. बुद्धिमान लोग सर्वस्व जाता देखकर आधे की रक्षा के लिए आधा छोड़ दिया करते हैं. अतः तुम दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) वन को जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्रीरामचंद्र को लौटा दिया जाए. ये सुंदर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गए. उनके सारे अंग परमानन्द से परिपूर्ण हो गए. उनके मन प्रसन्न हो गए. शरीर में तेज सुशोभित हो गया. मानो राजा दशरथ जी उठे हों और श्रीरामचंद्रजी राजा हो गए हों! अन्य लोगों को तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई. परंतु रानियों को दुख-सुख समान ही थे (राम-लक्ष्मण वन में रहें या भरत-शत्रुघ्न, दो पुत्रों का वियोग तो रहेगा ही), यह समझकर वे सब रोने लगीं. भरतजी कहने लगे- मुनि ने जो कहा, वह करने से जगत भर के जीवों को उनकी इच्छित वस्तु देने का फल होगा. चौदह वर्ष की कोई अवधि नहीं, मैं जन्मभर वन में वास करूंगा. मेरे लिए इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है.

श्रीरामचंद्रजी और सीताजी हृदय की जानने वाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं. यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ! अपने वचनों को प्रमाण कीजिए. भरतजी के वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठजी विदेह हो गए. भरतजी की महान महिमा समुद्र है, मुनि की बुद्धि उसके तटपर अबला स्त्री के समान खड़ी है. वह उस समुद्र के पार जाना चाहती है, इसके लिए उसने हृदय में उपाय भी ढूंढ़े! पर उसे पार करने का साधन नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती. भरतजी की बड़ाई और कौन करेगा? तलैया की सीपी में भी कहीं समुद्र समा सकता है? मुनि वसिष्ठजी के अन्तरात्मा को भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाजसहित श्रीरामजी के पास आए. प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने प्रणाम कर उत्तम आसन दिया. सब लोग मुनि की आज्ञा सुनकर बैठ गए.श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसर के अनुसार विचार करके वचन बोले- हे सर्वज्ञ ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञानके भंडार राम! सुनिए- आप सबके हृदय के भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भाव को जानते हैं. जिसमें पुरवासियों का, माताओं का और भरत का हित हो, वही उपाय बतलाइए.दुखी लोग कभी विचारकर नहीं कहते. जुआरी को अपना ही दांव सूझता है.

मुनि के वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे- हे नाथ! उपाय तो आप ही के हाथ है. आपका रुख रखने में और आपकी आज्ञा को सत्य कहकर प्रसन्नता पूर्वक पालन करने में ही सबका हित है. पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षा को माथे पर चढ़ाकर करूं. फिर हे गोसाईं! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से सेवा में लग जाएगा. मुनि वसिष्ठजी कहने लगे- हे राम! तुमने सच कहा. पर भरत के प्रेम ने विचार को नहीं रहने दिया. इसीलिए मैं बार-बार कहता हूं, मेरी बुद्धि भरत की भक्ति के वश हो गई है. मेरी समझ में तो भरत की रुचि रखकर जो कुछ किया जाएगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा. पहले भरत की विनती आदरपूर्वक सुन लीजिए, फिर उसपर विचार कीजिए. तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ (सार) निकालकर वैसा ही उसी के अनुसार कीजिए. भरतजी पर गुरुजी का स्नेह देखकर श्रीरामचंद्रजी के हृदय में विशेष आनंद हुआ. भरतजी को धर्मधुरन्धर और तन, मन, वचन से अपना सेवक जानकर श्रीरामचंद्रजी गुरु की आज्ञा के अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याण के मूल वचन बोले- हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजी के चरणों की दुहाई है मैं सत्य कहता हूं कि विश्वभर में भरत के समान भाई कोई हुआ ही नहीं, जो लोग गुरु के चरणकमलों के अनुरागी हैं, वे लोक में भी और वेद में पारमार्थिक दृष्टि से भी बड़भागी होते हैं! फिर जिसपर आप (गुरु) का ऐसा स्नेह है, उस भरत के भाग्य को कौन कह सकता है?

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