संपादकीय

बजट-पूर्व विमर्श, फोकस 7-8 फीसदी की आर्थिक विकास दर पर

प्रधानमंत्री मोदी ने बजट-पूर्व का विमर्श शुरू कर दिया है, तो उनका फोकस 7-8 फीसदी की आर्थिक विकास दर पर है। वैश्विक चुनौतियों, अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद अर्थव्यवस्था की गति और बढ़ोतरी ऐसी रहनी चाहिए, जिससे 2047 में ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य हासिल किया जा सके। फिलहाल विकास दर कुछ पिछड़ी हुई है, लेकिन भारत इस संदर्भ में, विश्व में, प्रथम स्थान पर है। बहुत जल्द भारत की अर्थव्यवस्था, जापान को पछाड़ कर, चौथे स्थान पर आ सकती है। प्रधानमंत्री का मानना है कि 2047 का लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब अर्थव्यवस्था संबंधी मानसिकताएं बदलेंगी। प्रधानमंत्री के इस विमर्श में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और नीति आयोग के नेतृत्व के साथ-साथ कई अर्थशास्त्री भी शामिल थे। विकास-दर के अलावा विमर्श का फोकस यह रहा कि यदि अमरीका और चीन के बीच ‘टैरिफ वार’ छिडऩे की नौबत आती है, तो भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए? भारत को ऐसी योजनाएं तैयार करनी चाहिए, जिनसे हम उन स्थितियों का लाभ उठाते हुए अवसरों को बटोर सकें। फिलहाल आर्थिक विशेषज्ञों ने सुझाव दिए हैं कि हमें देश में रोजगार-सृजन, कौशल-विकास, कृषि उत्पादकता को बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और निर्यात बढ़ाने सरीखे मुद्दों पर विशेष फोकस रखना होगा। बेरोजगारी भारत की प्रमुख समस्या है, जिससे अलग-अलग तनाव पैदा होते हैं। किसान भी आंदोलित है, क्योंकि आज भी वह आर्थिक तौर पर विपन्न है और फसलों के व्यापार के संकट भी उसके सामने हैं।

देश के जीडीपी में कृषि का योगदान 17 फीसदी से ज्यादा है। आर्थिक विकास-दर की एक चिंता सामने आई कि जुलाई-सितंबर की तिमाही में बढ़ोतरी 5.4 फीसदी हुई, जो सात तिमाहियों में कम है। जाहिर है कि नीति-निर्माताओं में ‘खतरे की घंटी’ बज गई होगी! विशेषज्ञों ने आर्थिक विकास-दर और कुछ सुधारों की व्यापकता पर भी विमर्श किया। जो आर्थिक पतन सामने आया है, उससे भारतीय रिजर्व बैंक समेत कई एजेंसियां सचेत हुई हैं। हालांकि आरबीआई की हालिया रपट में कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष की छमाही के बाद निजी खपत और ग्रामीण मांग में बढ़ोतरी होगी। त्योहारी मौसम की अर्थव्यवस्था के आंकड़े भी स्पष्ट होंगे, नतीजतन विकास-दर में सुधार दिखाई देगा। बहरहाल विशेषज्ञों के सुझाव हैं कि कृषि क्षेत्र और कराधान क्षेत्र में सुधार जरूरी हैं। टमाटर, प्याज, आलू के क्षेत्रों में कीमतें स्थिर होनी चाहिए। इन फसलों का फायदा किसान को भी मिलना चाहिए। जलवायु-परिवर्तन और ऊर्जा संक्रमण संबंधी रणनीतियां बनाने के सुझाव भी दिए गए। व्यापार और निर्यात से जुड़े मुद्दों पर भी विमर्श किया गया। मुक्त व्यापार समझौतों, टैरिफ रणनीति, रुपए के अंतरराष्ट्रीयकरण आदि पर विशेषज्ञों ने सुझाव दिए। खासकर रोजगार के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण गहरा किया जाए और श्रम की गरिमा पैदा की जाए, ऐसे सुझाव भी दिए गए। यह चिंतित पहलू भी सामने आया कि जीडीपी में बीमा क्षेत्र की हिस्सेदारी सिकुड़ कर 3.7 फीसदी ही रह गई है। यह बीते दो सालों से लगातार घट रही है। विमर्श के बाद मीडिया को जो खुलासा किया गया, उसमें रोजगार के अवसर और अधिक से अधिक नौकरियां पैदा करने की बात प्रमुख थी। उसी से निजी समृद्धि, निजी मांग और खपत तथा अंतत: बाजार जुड़े हैं। वे ही किसी अर्थव्यवस्था की विकास-दर को बढ़ा सकते हैं। बहरहाल तमाम गतिविधियों के बावजूद भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से फिलहाल कुछ दूर रहेगा। यदि 4.5 ट्रिलियन डॉलर तक भी भारत पहुंचता है, तो वह दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था होगा।

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