राजनीति

आंबेडकर विवाद : भ्रम फैलाने की साजिश…

आप पहले भी वर्ष दर वर्ष ऐसा देख चुके होंगे कि किस प्रकार हमारी संसद का अवमूल्यन किया जा रहा है। बढ़ते शोर-शराबे और व्यवधान के बीच यह एक तमाशा बनती जा रही है। पिछले सप्ताह हमारे सांसदों ने हमारी संसद को एक अखाड़ा बना दिया। भाजपा और कांग्रेस के सांसदों के बीच धक्का-मुक्की में भाजपा के 2 सांसद अस्पताल पहुंच गए और राहुल गांधी के विरुद्ध एफ.आई.आर. दर्ज की गई। इस सबका कारण आंबेडकर के अपमान का मुद्दा है, जो संविधान के जनक के बारे में किए जा रहे शोरगुल का एक प्रमाण है। सभी दल इस दलित महापुरुष से अपना संबंध जोडऩा चाहते हैं ताकि उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए भुनाया जा सके क्योंकि दलित समुदाय आज देश में 20 प्रतिशत वोट बैंक है और चुनावों में जिस पक्ष की ओर इनका झुकाव होगा, वह विजयी हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने आंबेडकर के बारे में कांग्रेस के पाखंड और उन्हें ऐतिहासिक रूप से नजरअंदाज करने, भारत रत्न से वंचित रखने और दो बार चुनावों में पराजित करवाने का आरोप लगाया। 

गृह मंत्री शाह ने अपने प्रतिद्वंद्वियों का यह कहकर मजाक उड़ाया कि वे अपने राजनीतिक लाभ के लिए आंबेडकर की विरासत का उपयोग कर रहे हैं और कहा कि कांग्रेस आंबेडकर, आंबेडकर के नाम का जाप एक फैशन बना रही है और अगर इतना नाम भगवान का लेते तो सात जन्म तक स्वर्ग मिल जाता। इसका प्रत्युत्तर कांग्रेस ने यह कहकर दिया कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आंबेडकर से घृणा करते हैं और मोदी से मांग की कि शाह को बर्खास्त किया जाए। इससे एक विचारणीय प्रश्न उठता है कि क्या हमारी राजनीति जातीय और धार्मिक आधार पर विभाजित हो गई है? इसमें राजनीतिक-वैचारिक मतभेद गहरे हो गए हैं? किसी भी दूरदर्शी, कुशल राजनेता का अभाव है, जो भविष्य की चिंता करे और जो वास्तव में आंबेडकर की विचारधारा पर विश्वास करता हो? बिल्कुल नहीं। ये नेता सर्वोपरि जाति को रखते हैं। कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन जातीय जनगणना की मांग करता है तो भाजपा इसका विरोध करती है और वे आंबेडकर के इन शब्दों को भूल जाते हैं, ‘‘यदि हिन्दू समाज को समानता के आधार पर पुनर्गठित किया जाना है तो जाति प्रथा को समाप्त किया जाना चाहिए। अस्पृश्यता का मूल जाति प्रणाली है।’’ 

भाजपा ने कांग्रेस पर यह कहकर प्रहार किया कि उसने दलितों के भगवान का जानबूझकर अपमान किया और धर्म का उपयोग अपने संकीर्ण, व्यक्तिगत और राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया, जिस कारण देश का वातावरण खराब हुआ, जिससे देश की एकता, अखंडता और सुदृढ़ता के लिए खतरा पैदा हुआ। कांग्रेस के नेतृत्व में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने अपनी ओर से एक समान नागरिक संहिता के अधिनियमन का इस आधार पर पुरजोर विरोध किया कि यह धार्मिक समूहों की धार्मिक स्वतंत्रता और उनके व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप करेगा बशर्ते कि धार्मिक समूह इस बदलाव के लिए स्वयं तैयार न हों। आंबेडकर एक समान नागरिक संहिता के प्रबल पक्षधर थे। उनका मानना था कि एक सभ्य समाज में धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों के बीच कोई संबंध नहीं है और इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में अतिक्रमण या अल्पसंख्यक विरोधी के रूप में क्यों देखा जाना चाहिए। 

बाबा साहेब की सलाह को एक दिवास्वप्न के रूप में माना गया। आज के राजनीतिक वातावरण में जहां पर धर्म को अपने संकीर्ण व्यक्तिगत राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विकृत किया जाता है, जिसके कारण देश का वातावरण खराब हुआ है और जिसका संबंध पूर्ण रूप से वोट बैंक की राजनीति से है, जहां पर राम और रहीम को चुनावी कट-आऊट बना दिया गया है, क्या इससे आंबेडकर सांप्रदायिक या कट्टर हिन्दूवादी बन जाएंगे? 30 वर्ष से अधिक समय के सार्वजनिक जीवन में आंबेडकर ने लगभग प्रत्येक दल के विचारों और कार्यों का विरोध किया, चाहे वह कांग्रेस हो, जनसंघ या हिन्दू महासभा। हिन्दू कोड बिल के मुद्दे पर वैचारिक मतभेद के कारण उन्हें नेहरू मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा। दूसरा उदाहरण अनुच्छेद 356 का है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रपति को राज्य सरकारों को बर्खास्त करने, विधानसभाओं को भंग करने और राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति दी गई है। आज आंबेडकर की यह आशंका सच साबित हुई है कि अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग किया जाएगा। 

शायद कम ही लोगों को पता हो कि बाबा साहेब अनुच्छेद 370 का भी विरोध करते थे जिसके अंतर्गत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया था। इस अनुच्छेद का अधिनियमन उनकी इच्छाओं के विरुद्ध किया गया था। इतिहास में यह दर्ज है कि उन्होंने शेख अब्दुल्ला से कहा, ‘‘आप चाहते हैं कि भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, वह आपके क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण करे, वहां खाद्यान्नों की आपूर्ति करे और कश्मीर को भारत के समान दर्जा मिले? फिर भी केन्द्र सरकार की वहां सीमित शक्तियां हों और भारतीय लोगों का कश्मीर पर कोई अधिकार न हो। इस प्रस्ताव को स्वीकृति देना भारत के हितों के विरुद्ध देशद्रोही कार्रवाई होगी और विधि मंत्री के रूप में मैं कभी ऐसा नहीं करूंगा।’’ यह आंबेडकर की महानता का प्रमाण है कि उनके निधन के 6 दशक बाद भी प्रत्येक दल उनका वर्णन करने का प्रयास कर रहा है। 1990 के दशक के बाद सामाजिक न्याय के पक्ष में मतदाताओं के रुझान और प्रत्येक दल द्वारा हाशिए पर खड़े तथा शोषित वंचित वर्गों तक पहुंचने का प्रयास यह बताता है कि उनके विचार वामपंथी, दक्षिणपंथी और मध्य मार्गी, सभी दलों के लिए आवश्यक हैं और इन वर्गों द्वारा उन पर चर्चा की जाती रही है। 

मोदी अक्सर कहते हैं कि उनकी पार्टी ने बाबा साहेब का नाम लेकर दलित तथा वंचित वर्गों तक पहुंचने तथा उन्हें लुभाने का पूरा प्रयास किया, जबकि कांग्रेस भी बाबा साहेब की विरासत की बातें करती है, ताकि वह दलित वोट बैंक को पुन: अपनी ओर आकॢषत कर सके और अक्सर कहती है कि इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस ने उन्हें संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया था। नि:संदेह आंबेडकर के नाम पर संविधानवाद और सामाजिक न्याय के लिए प्रतिस्पर्धी लोकप्रियतावाद चल रहा है। तथापि उनकी विरासत के लिए प्रतिस्पर्धी दावों से उस लोकतंत्र की जीवन्तता का प्रमाण मिलता है, जिसको स्थापित करने में उन्होंने सहायता की। 

कुल मिलाकर क्या हमारे राजनीतिक दल आंबेडकर की विरासत को आगे बढ़ाना चाहते हैं? यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे राजनेता विभिन्न वादों के अतिरिक्त बोझ से मुक्त होना चाहते हैं या नहीं और क्या वे वास्तविक धर्मनिरपेक्षता को अपनाना चाहते हैं? आज की राजनीतिक सामाजिक वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए आंबेडकर की बुद्धिमतापूर्ण सलाह को दिवास्वप्न बताने की संभावना अधिक है। समय आ गया है कि हमारे नेता उनकी सलाह पर ध्यान दें। उन्होंने कहा था कि मानव नश्वर है और इसी तरह विचार भी नश्वर हैं। आंबेडकर की विरासत का दावा करने की पाखंडी सर्कस की बजाय हमें इस संबंध में शब्दों की बजाय कार्य करना होगा। भारत और उसके नागरिक बेहतर भविष्य के हकदार हैं।-पूनम आई. कौशिश          

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