संपादकीय

शीतकालीन सत्र का पहला सप्ताह हंगामे की भेंट चढ़ा

संसद के शीतकालीन सत्र का पहला सप्ताह हंगामे की भेंट चढ़ गया। इसका अंदेशा पहले से था, क्योंकि कांग्रेस और कुछ अन्य दलों ने अदाणी प्रकरण, मणिपुर की हिंसा के साथ कुछ अन्य मामलों पर जोर देने का एलान कर दिया था। इनमें से एक मामला संभल की हिंसा का भी जुड़ गया, जो संसद सत्र शुरू होने के पहले ही सामने आया। अदाणी प्रकरण भी कुछ दिनों पहले चर्चा में आया था। क्या यह महज एक दुर्योग है कि पिछले कुछ समय से संसद सत्र के पहले कोई न कोई सनसनीखेज मामला सामने आ जाता है? यह प्रश्न इसलिए, क्योंकि अतीत में पेगासस जासूसी और अदाणी समूह पर हिंडनबर्ग की रपटें संसद का सत्र शुरू होने के पहले ही आईं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अचानक आए ऐसे मुद्दों को लपक लेते हैं।

संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के चंद दिन पहले अमेरिकी अदालत का यह सनसनीखेज आदेश आया कि अदाणी समूह की कंपनी अदाणी ग्रीन एनर्जी की ओर से भारत में सौर ऊर्जा की आपूर्ति के लिए कुछ राज्य सरकारों को रिश्वत दी गई और चूंकि सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए अमेरिका के निवेशकों से पैसा लिया गया, इसलिए अमेरिका के कानूनों के तहत इस मामले की जांच अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन की ओर से की जा रही है। इस मामले में अदाणी समूह के प्रमुख गौतम अदाणी, उनके भतीजे सागर अदाणी और अदाणी ग्रीन एनर्जी के कुछ अधिकारियों को आरोपित किया गया है। न्यूयार्क की अदालत की मानें तो अदाणी ग्रीन एनर्जी ने 22 सौ करोड़ रुपये से ज्यादा की रिश्वत दी।

अदाणी समूह पहली बार विवादों में नहीं आया। इसके पहले अमेरिकी रिसर्च एजेंसी हिंडनबर्ग की ओर से यह आरोप लगाया गया था कि इस समूह ने अपने शेयरों में हेराफेरी की। यह रिपोर्ट आने के बाद अदाणी समूह को अच्छा-खासा नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन बाद में एक बड़ी हद तक क्षति की भरपाई हो गई, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को सही नहीं माना। इसके कुछ समय बाद हिंडनबर्ग ने अदाणी समूह पर निशाना साधते हुए सेबी अध्यक्ष माधवी पुरी बुच को भी कठघरे में खड़ा किया। उसका आरोप था कि सेबी प्रमुख के रूप में उन्होंने अदाणी समूह पर लगे आरोपों की सही तरह जांच करने के बजाय उसका बचाव किया। इस आरोप का कोई असर निवेशकों पर नहीं पड़ा।

न्यूयार्क की अदालत की ओर से आए आदेश के बाद अदाणी समूह शेयर बाजार में हुए नुकसान से उबर रहा है। साफ है कि भारतीय निवेशक न्यूयार्क की अदालत के आरोपों को ज्यादा महत्व नहीं दे रहे हैं। अदाणी समूह का बचाव जाने-माने वकील महेश जेठमलानी की ओर से भी किया गया। उनके अनुसार अमेरिकी अदालत के अभियोग में भारत में रिश्वत देने को लेकर कोई सुबूत पेश नहीं किया गया और उसमें यह भी नहीं बताया गया कि भारत में किस कानून का उल्लंघन हुआ है। पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी का भी यह कहना है कि आरोप गौतम अदाणी या उनके भतीजे सागर अदाणी पर नहीं, बल्कि उनकी कंपनियों पर हैं और यह भी स्पष्ट नहीं कि रिश्वत कैसे दी गई? सच जो भी हो, यह देखना दिलचस्प है कि अदाणी मामले को तूल दे रही कांग्रेस को सहयोगी दलों का साथ नहीं मिल रहा है।

तृणमल कांग्रेस ने साफ संकेत दिया है कि वह संसद में अदाणी मामले को तूल नहीं देने वाली। यह भी कांग्रेस के लिए झटका है कि आइएनडीआइए की एक अन्य घटक माकपा भी इस मामले को तूल देने को तैयार नहीं। बीते दिनों ही माकपा के नेतृत्व वाली केरल की वाम मोर्चा सरकार ने अदाणी समूह के साथ बंदरगाह के विकास को लेकर एक समझौता किया है। देखना है कि इसके बाद कांग्रेस क्या करती है? कम से कम राहुल के रवैये में बदलाव की उम्मीद कम ही है, क्योंकि वह एक लंबे समय से अदाणी-अंबानी के सहारे मोदी सरकार को घेरने में लगे हुए हैं। वह यह आरोप लगाते ही रहते हैं कि मोदी सरकार अंबानी-अदाणी और कुछ अन्य उद्योगपतियों के हित में काम कर रही है। हालांकि उन्हें इससे कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिल रहा है, लेकिन वह अंबानी-अदाणी का राग अलापने से बाज नहीं आ रहे हैं। शायद वह यह समझने को तैयार नहीं कि यदि किसी मामले को बार-बार उठाने से कोई लाभ हासिल नहीं हो रहा है, तो फिर उसे तूल देने का कोई मतलब नहीं रह जाता। राहुल का अंबानी-अदाणी राग अलापते रहना उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता को ही दर्शाता है। लगता है उन्होंने राफेल मामले से कोई सबक नहीं सीखा, जिसमें उन्हें सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगनी पड़ी थी। राहुल गांधी के रवैये से यह भी साफ है कि वह परिणाम की परवाह किए बिना अपनी ओर से उठाए गए मुद्दे को तूल देते रहते हैं। इससे वक्त के हिसाब से अपनी रणनीति में बदलाव न करने के उनके अड़ियल रवैये का ही पता चलता है, जबकि नेताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह जनता के मूड और मिजाज को भांपकर अपनी रीति-नीति में बदलाव करें। लचीलेपन का यह अभाव राहुल को राजनीतिक रूप से नुकसान ही पहुंचा रहा है, मगर वह कुछ समझने को तैयार नहीं।

कांग्रेस संसद में अदाणी मामले के साथ मणिपुर की हिंसा को भी मुद्दा बना रही है, लेकिन यह स्पष्ट ही है कि उसके निशाने पर अदाणी ही हैं। निःसंदेह शांत होता मणिपुर फिर से अशांत हो गया है और वहां के हालात पर संसद में चर्चा होनी चाहिए, लेकिन कांग्रेस का उद्देश्य हंगामा करना ही अधिक नजर आता है। आखिर हंगामा बेहतर है या मणिपुर या फिर अन्य किसी मसले पर गंभीर चर्चा? आम तौर पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल संसद सत्र शुरू होने के पहले जो मसला खबरों में आ गया होता है, उसे ही तूल देने लगते हैं। इसमें हर्ज नहीं, लेकिन आखिर वे शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण समेत राष्ट्रीय महत्व के अन्य मुद्दों पर भी कोई ध्यान क्यों नहीं देते? ऐसा तो है नहीं कि ये मुद्दे जनता को प्रभावित न करते हों। यह ठीक नहीं कि विपक्ष संसद में जनता के जीवन से जुड़े वास्तविक मुद्दे उठाने के लिए न तो कोई प्रयत्न करता दिखता है और न ही तैयारी।

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