संपादकीय

खुदरा महंगाई दर शिखर पर

अक्तूबर में खुदरा महंगाई दर 6.2 फीसदी रही है। यह बीते 14 माह के उच्चतम स्तर पर है और भारतीय रिजर्व बैंक के 4-5 फीसदी के संतोषजनक स्तर से भी बहुत ज्यादा है। देश में हरी सब्जियों की कीमतें अक्तूबर में ही 42.2 फीसदी तक बढ़ी हैं। खाद्य और शीतलपेय वाले समूह में महंगाई सितंबर में 8.36 फीसदी थी, लेकिन अक्तूबर में बढ़ कर 9.69 फीसदी तक पहुंच गई। राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई में प्याज खुदरा में 70-80 रुपए प्रति किलो बेचा जा रहा है, जबकि महाराष्ट्र में ही नासिक सबसे अधिक प्याज का उत्पादन करता है। वहां की मंडियों में भी प्याज औसतन 50 रुपए किलो बेचा जा रहा है। बाजार के जानकारों का आकलन है कि प्याज के दाम 100 रुपए किलो तक बढ़ सकते हैं और टमाटर इससे भी काफी महंगा बिक सकता है। सिर्फ सब्जियां ही नहीं, अनाज, दालें, खाद, खाद्य तेल और खेती के लिए अनिवार्य वस्तुएं भी महंगी हुई हैं। किसानों को रबी फसलें बोनी हैं, लेकिन बाजार में खाद का संकट है। खाद की दुकानों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं। खाद की जो बोरी 50 किलो की मिलती थी, वह अब कम कर दी गई है, लेकिन बोरी 300 रुपए तक महंगी कर दी गई है। किसान औसतन सस्ती फसल कैसे बो सकता है और उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य कैसे मिल सकता है? रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास का आकलन है कि महंगाई अभी और बढ़ेगी। भारत सरकार और रिजर्व बैंक ने मिल कर तय किया था कि खुदरा महंगाई दर 4-5 फीसदी के बीच रहनी चाहिए। आदर्श स्थिति 4 फीसदी की है। अभी तक कोशिशें भी की गईं कि महंगाई वहीं तक सिमट कर रहे, लेकिन अब हदें लांघ दी गई हैं। सितंबर में खुदरा महंगाई दर 5.5 फीसदी पर पहुंच गई थी। बढ़ोतरी के संकेत वहीं से मिल गए थे। अब यह महंगाई दर 6.2 फीसदी हो गई है, जो सर्वाधिक है। ये तमाम आंकड़े भारत सरकार के ‘सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय’ ने जारी किए हैं। जो संगठन निजी क्षेत्र में सक्रिय हैं, उनका डाटा भिन्न हो सकता है और महंगाई दर भी ज्यादा हो सकती है। बहरहाल अभी जो चुनाव किए जा रहे हैं, उनमें महंगाई प्रमुख चुनावी मुद्दा नहीं है। चुनावों में मुफ्तखोरी की रेवडिय़ों की प्रतिद्वंद्विता है अथवा बांटने, काटने, डरने, मरने की ही चर्चाएं हैं। महंगाई के अलावा बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य सरीखे मुद्दों पर कभी भी जनादेश तय नहीं होते, जबकि ये आम आदमी की बुनियादी समस्याएं और जरूरतें हैं।

एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, देश के 23 राज्यों में से छत्तीसगढ़ में, बीते एक साल के दौरान, महंगाई सबसे अधिक 6.4 फीसदी बढ़ी है। मप्र में 3 फीसदी, उप्र, बिहार, केरल, तमिलनाडु में 2.3 फीसदी महंगाई बढ़ी है। पंजाब और हरियाणा ऐसे राज्य हैं, जहां साल भर में महंगाई क्रमश: 0.4 फीसदी और 0.7 फीसदी ही बढ़ी है, लेकिन महंगाई दर 5 फीसदी से अधिक रही है। सिर्फ राजस्थान ही ऐसा इकलौता राज्य है, जहां महंगाई दर घटी है। देश में पांच राज्य ऐसे हैं, जहां महंगाई दर 7 फीसदी से ज्यादा रही। ओडिशा 7.5 फीसदी महंगाई दर के साथ इन राज्यों में शिखर पर है। डाटा में यह भी बताया गया है कि 11 राज्यों में महंगाई दर 6 फीसदी से कम रही है। बहरहाल आकलन किया जा रहा है कि ऐसी बढ़ोतरी के बावजूद वित्त वर्ष 2024-25 में महंगाई दर औसतन 4.8 फीसदी रहेगी, जो रिजर्व बैंक के लक्ष्य की परिधि में है। गौरतलब यह है कि खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर अक्तूबर में 10.87 फीसदी रही है, जो सितंबर में 9.24 फीसदी थी। बताया जाता है कि मौसम की अनिश्चितता से कई राज्यों में फसलें प्रभावित हुईं। आलू-टमाटर समेत प्रमुख सब्जियों के उत्पादन कम हुए। मांग और आपूर्ति में फासला बढ़ा। बहरहाल सरकारी आंकड़ों में महंगाई की जो भी तस्वीर सामने आती है, वह आम आदमी को चुभने वाली है। उसकी जेब पर असर पड़ रहा है। कोरोना महामारी के बाद आम आदमी की औसतन आय नहीं बढ़ी, बल्कि बचत भी मात्र 9 फीसदी रह गई है। ऐसे में वह महंगाई का सामना कैसे करे? कारण कुछ भी हों, लेकिन 2023 में 2851 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। देश न जाने किसके लिए आर्थिक महाशक्ति है, लेकिन आम आदमी महंगाई से बेदम, बेहाल है। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार को इस मुद्दे पर जरूर सोचना चाहिए। अगर महंगाई को तुरंत लगाम नहीं लगाई गई, तो गरीब व मध्यम वर्ग का जीना निश्चय ही कठिन हो जाएगा।

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