कौन बंटेगा, कौन कटेगा?, विवाद जारी

‘बंटेंगे, तो कटेंगे।’ यह नारा उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिया था। वह अब तिल का ताड़ बन गया है। उसकी अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं। राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। यदि इस नारे के जरिए ‘हिंदू’ का आह्वान किया गया था, तो हिंदुओं का विश्वास है कि वे खतरे में नहीं हैं और न ही वे चिंतित हैं। यह नारा समाज में तनाव पैदा करने के लिए है। हम हिंदू हैं, लेकिन हम तटस्थ हैं। नारे की भाषा अमर्यादित है। ऐसी भाषा की अपेक्षा भाजपा और संघ परिवार से नहीं की जा सकती। क्या हिंदू मूर्ख हैं, जो ऐसे नारे का निहितार्थ नहीं समझते? क्या नारे के जरिए ही हिंदू लामबंद होगा और भाजपा की ओर उसका ध्रुवीकरण होगा? ऐसे आह्वान भाजपा की ओर से किए जाते रहे हैं, ताकि उसका स्थायी बहुमत बरकरार रहे। संघ परिवार भी हिंदूवाद को ही राष्ट्रवाद मानता रहा है। मुख्यमंत्री योगी के इस नारे को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधनों में भी दोहराया है। अब आरएसएस के सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबले ने इसकी पुष्टि करते हुए नारे पर मुहर लगा दी है। दत्तात्रेय ने वही बात कही है, जो संघ की कार्यकारिणी ने विमर्श के बाद तय की थी। संघ की दलील है कि लोक कल्याण के लिए ‘हिंदू एकता’ अहम है। ‘राष्ट्रीय एकता’ क्यों अहम नहीं है? मुसलमान, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई आदि समुदायों की एकता बेहद जरूरी क्यों नहीं है? वे भी भारतीय, हिंदुस्तानी हैं। बार-बार सचेत किया जा रहा है कि ‘बंटेंगे, तो कटेंगे। एकजुट रहेंगे, तो नेक रहेंगे।’ देश में करीब 25,000 उपजातियां और करीब 3000 जातियां हैं। वे विभिन्न और विविध हैं, लेकिन भारत राष्ट्र के तले सभी भारतीय हैं। वे विभाजित देश नहीं हैं। ये जातियां हिंदुओं की ही हैं। वे अलग हुई हैं, अपनी अलग पहचान बनाई है, लेकिन वे बुनियादी तौर पर हिंदू हैं। उनकी आस्था सनातन है। यह न तो संविधान-विरोधी है और न ही सनातन-विरोधी है।
देश में करीब 21 करोड़ मुसलमान भी हैं। वे अमूमन भाजपा को वोट नहीं देते। कर्नाटक के चुनाव में 90 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोट कांग्रेस के पक्ष में गए, तो भाजपा को 7-9 फीसदी वोट ही मिले, लेकिन गैर-मुस्लिम वोटों का बहुमत भाजपा के पक्ष में रहता है। यह औसत भारतीय का संवैधानिक मताधिकार है। क्या सवाल और चिंता यह है कि क्षेत्र, जाति, धर्म, वर्ग आदि में बंटेंगे, तो तय है कि कटेंगे? ‘कटेंगे’ शब्द आपत्तिजनक है, क्योंकि 1947 के बाद भारत का दोबारा विभाजन नहीं हुआ है। सभी जातियों, क्षेत्र, धर्म, मत के लोग मताधिकार का इस्तेमाल करते रहे हैं और लोकतांत्रिक सरकारें चुनते रहे हैं। फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में कुछ ही राज्यों में भाजपा की अनपेक्षित, अप्रत्याशित पराजय के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह नारा क्यों दिया? और इसे संघ परिवार का नारा क्यों बना दिया गया? इस नारे का आक्रामक प्रचार क्यों किया जा रहा है? इन सवालों का एक ही जवाब हो सकता है कि यह भाजपा की चुनावी रणनीति है। इसका परिणाम हरियाणा चुनाव में देख चुके हैं, जहां नारे के बाद भाजपा का काडर और समर्थक एकजुट हुए, चुपचाप वोट किए, नतीजतन भाजपा को बहुमत हासिल हुआ। अब यह आजमाइश महाराष्ट्र और झारखंड के चुनावों में की जा रही है। यकीनन भाजपा हिंदू वोट बैंक को बंटने नहीं देना चाहती और उन्हें डरा रही है।
मुसलमानों को भी डराया जाता है। भारत में चुनाव ‘जातीय’ हो गए हैं। भाजपा ने हिंदुओं का यह हथियार ‘जातीय जनगणना’ के समानांतर उठाया है। इस नारे के कुछ नतीजे दिखाई दे रहे हैं और हिंदुओं में लामबंदी शुरू हो रही है। दलित, पिछड़े, आदिवासी आदि की उपजातियां अब भी हिंदू मानती हैं, लेकिन उनके वोट बैंक ध्रुवीकृत होते रहे हैं। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में उनके वोट औसत बिल्कुल बदल गए हैं। जो भाजपा के पक्ष में थे, अब वे भाजपा के विपक्ष में हैं। भाजपा स्पष्ट रूप से हिंदुओं का नाम लेकर अपने खोये जनाधार को वापस हासिल करने के पक्ष में नहीं है, लिहाजा भाषा बदल कर यह नारा दिया गया है। क्या भाजपा सफल होगी? यह तो चुनाव ही तय करेंगे, लेकिन हम ऐसी राजनीति के पक्षधर नहीं हैं।


