चुनाव, कश्मीर को मुट्ठी में रखने वाले अब सैयदों-शेखों की चिंता…

एक जमाना था जब अब्दुल्ला परिवार और सैयद परिवार कश्मीर को अपनी मुट्ठी में समझ कर चलता था। धीरे-धीरे जब कश्मीर के अवाम ने इन दोनों परिवारों की मुट्ठी में दम घुटता देख कर वहां से बाहर निकलने की कोशिश की तो कश्मीर में एक नया प्रयोग हुआ। मुट्ठी खोल कर अवाम को तो खुला छोड़ दो, लेकिन इसको मतदान केन्द्र तक न आने दो, इसी रणनीति के तहत चुनाव के बायकॉट के इवेंट मैनेजमैंट किए जाते थे। कश्मीर में एक जुमला चल पड़ा था कि देश के बाकी हिस्सों में प्रत्याशी इसलिए पैसा खर्चते हैं ताकि मतदाता को मतदान केन्द्र तक लाया जा सके, लेकिन कश्मीर में राजनीतिक दल इसलिए पैसा लुटाते हैं कि किसी भी तरह मतदाताओं को चुनाव केन्द्र तक आने से रोका जा सके। जो पैसा चुनाव प्रचार में लगना चाहिए था, वह आतंकवादियों को दे दिया जाता था।
इनका कहना है कि हम फिर से जम्मू कश्मीर को एक बार फिर से अनुच्छेद 370 में बांधेंगे। फिर से जम्मू में लाखों लोगों को मिले उनके मताधिकार से वंचित कर देंगे। उमर अब्दुल्ला शायद इसी रणनीति से जम्मू वालों को सहमत करवाने के लिए राहुल गांधी को सख्ती से निर्देश देते हैं कि सारा जोर जम्मू में जाकर लगाओ। दुर्भाग्य से जम्मू के लोगों की मानसिकता न पंडित जवाहर लाल नेहरु समझ सके थे और न अब राहुल गांधी समझ रहे हैं। जहां तक कश्मीर के आम कश्मीरी का ताल्लुक है, वह सैयदों और शेखों की इस जुमलेबाजी से हैरान है…
जम्मू-कश्मीर में दस साल बाद वहां की विधानसभा के लिए हो रहे चुनावों में दूसरे चरण का मतदान भी समाप्त हो गया है। विधानसभा के लिए हो रहे चुनावों से कुछ महीने पहले ही लोकसभा के चुनावों में ही जम्मू कश्मीर में हुए परिवर्तन के संकेत मिलने शुरू हो गए थे। कश्मीर संभाग से पूर्व मुख्यमंत्री पीडीपी की सैयदा महबूबा मुफ्ती और एनसी के उमर अब्दुल्ला दोनों ही बुरी तरह पराजित हुए। बारामूला में उमर अब्दुल्ला को जिस शख्स ने हराया वह जेल में बंद था। एक जमाना था जब अब्दुल्ला परिवार और सैयद परिवार कश्मीर को अपनी मु_ी में समझ कर चलता था। धीरे-धीरे जब कश्मीर के अवाम ने इन दोनों परिवारों की मु_ी में दम घुटता देख कर वहां से बाहर निकलने की कोशिश की तो कश्मीर में एक नया प्रयोग हुआ। मु_ी खोल कर अवाम को तो खुला छोड़ दो, लेकिन इसको मतदान केन्द्र तक न आने दो, इसी रणनीति के तहत चुनाव के बायकॉट के इवेंट मैनेजमैंट किए जाते थे। कश्मीर में एक जुमला चल पड़ा था कि देश के बाकी हिस्सों में प्रत्याशी इसलिए पैसा खर्चते हैं ताकि मतदाता को मतदान केन्द्र तक लाया जा सके, लेकिन कश्मीर में राजनीतिक दल इसलिए पैसा लुटाते हैं कि किसी भी तरह मतदाताओं को चुनाव केन्द्र तक आने से रोका जा सके। जो पैसा चुनाव प्रचार में लगना चाहिए था, वह आतंकवादियों को दे दिया जाता था।
आतंकवादी चुनाव के बायकॉट की मुनादी करवा देते थे। भय पैदा करने के लिए पांच-छह लोगों को यमपुरी पहुंचा भी देते थे। बायकॉट के उस मौसम में कुछ चुनींदे मतदाताओं की कुछ हजार या सौ वोटों को लेकर ही कुछ चुनींदे लोग विधानसभा और लोकसभा में पहुंच कर स्वयं को सभी कश्मीरियों का प्रतिनिधि बता कर अजीब अजीब आवाजें निकालते थे। लेकिन अब वे दिन हवा हुए जब खलील खां फाख्ता उड़ाया करते थे। इसकी शुरुआत तो जम्मू कश्मीर में दशकों से अटके स्थानीय निकायों के चुनावों से ही हो गई थी जब इन दोनों परिवारों की इजारेदारी को तोड़ कर गांव गांव से युवा पीढ़ी का नया नेतृत्व आकार ग्रहण करने लगा था। लोकसभा के चुनावों में तो फाख्ताओं ने खलील खांओं को ही हवा में उड़ा दिया। उसका असर इतना गहरा हुआ कि महबूबा मुफ्ती तो विधानसभा चुनाव से पहले ही चुनाव के मैदान से बाहर हो गईं। उमर अब्दुल्ला गांदरबल में अपनी टोपी उतार कर मतदाताओं के सामने गिड़गिड़ाने लगे कि अब्दुल्ला परिवार की इज्जत का सवाल है। लेकिन लोगों के मनोविज्ञान को भांपते हुए बडगाम से भी पेपर दाखिल कर आए। यदि गांदरबल ने संकट की इस घड़ी में सहारा न दिया तो शायद बडगाम वाले रक्षा करें। अब्दुल्ला परिवार को ये दिन भी देखने थे। लेकिन ये हालात बदले कैसे? अनुच्छेद 370 हटने के कारण, कांग्रेस व अब्दुल्ला परिवार द्वारा अपने भविष्य को देखते हुए जम्मू कश्मीर की घेराबंदी समाप्त हो गई। केन्द्र सरकार की नीति बदलने के कारण आतंकवादियों को मिल रहा राजनीतिक संरक्षण समाप्त हो गया। आम मतदाता को लगा कि वह भी अब बिना डर के मतदान कर सकता है और अपनी इच्छा के प्रत्याशी को चुन सकता है। आतंकवादी भी समझ गए कि वे अलगाववाद के नाम पर देश-विदेश से करोड़ों रुपए एकत्रित करके जो आलीशान जिंदगी जी रहे थे, अब उस पैसे का सरकार हिसाब मांग रही है और जब हिसाब मिल नहीं पाता तो बंदूक के बल पर बनाई सम्पत्ति को सरकार जब्त कर रही है। इसलिए आतंकवाद की आड़ में रातों रात करोड़पति बनने का शार्टकट अब न तो लाभकारी रहा है और न ही बिना खतरे वाला। इसलिए लोग बहुत बड़ी संख्या में मतदान केन्द्र पर पहुंचने के रास्ते को परखने के लिए निकले। अब्दुल्ला परिवार और सैयद परिवार दोनों समझते हैं कि लोगों के मतदान केन्द्र पर पहुंचने का अर्थ है, इन दोनों परिवारों का भविष्य खतरे में।
इसलिए ये परिवार दूसरे चरण में बडगाम जिला में हुए 61.35 प्रतिशत और गांदरबल जिला में हुए 62.63 प्रतिशत मतदान से चिंतित हैं। कुल मिला कर जम्मू कश्मीर में, खासकर राजौरी, पुंछ जिला में हुए भारी मतदान से सैयद और शेख चिंतित हैं। उमर अब्दुल्ला की परेशानी साफ दिखाई दे रही है। उसे लगता है कि यदि जम्मू एकजुट हो गया और कश्मीरियों ने सैयदों और शेखों को नकार कर आम देसी कश्मीरियों को, जिनके नाम के आगे नहीं बल्कि नाम के पीछे शेख लगा हुआ है, चुन लिया तो सत्तर साल से जमा हुआ आसन हिल जाएगा। यही कारण है कि उमर अब्दुल्ला, राहुल गांधी को सख्ती से बता रहे हैं कि कश्मीर घाटी में आकर चुनाव प्रचार में वक्त बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। यहां आपके लिए कुछ नहीं रखा। जम्मू में जाकर पूरा जोर लगाओ। यदि वहां जम्मू वालों में फूट डलवा सके तो हमारे हाथों में सत्ता आने की सम्भावना हो सकती है और उसमें आपको भी कुछ न कुछ हिस्सा मिल ही सकता है। यदि जम्मू वाले एकजुट रहे तो श्रीनगर से सैयदों और शेखों के महल भी हिल जाएंगे और आप भी जम्मू कश्मीर से खाली हाथ निकल जाओगे। सत्ता जम्मू और कश्मीर के देसी लोगों के हाथ आ जाएगी। उन लोगों के हाथ भी जिनको आज तक नेहरु, अब्दुल्ला और सैयद परिवारों ने वोट देने का अधिकार तक नहीं दिया था। डरे हुए और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिन्तित अब्दुल्ला और सैयद परिवार ने अब जम्मू वालों की चिन्ता छोड़ दी है। वैसे उन्होंने पिछले सत्तर साल से यह चिन्ता छोड़ ही रखी थी। लेकिन अब जब कश्मीरियों ने अब्दुल्ला व सैयद परिवारों की चिन्ता छोडऩे का मन बना लिया है तो वे किसी न किसी तरह फिर से आम देसी कश्मीरी मुसलमानों को धोखा देकर अपने पाले में खींचने की कोशिश कर रहे हैं।
राहुल गान्धी भी अपने भविष्य की चिन्ता से ग्रस्त उनकी हां में हां मिलाते नजर आ रहे हैं। इनका कहना है कि हम फिर से जम्मू कश्मीर को एक बार फिर से अनुच्छेद 370 में बांधेंगे। फिर से जम्मू में लाखों लोगों को मिले उनके मताधिकार से वंचित कर देंगे। उमर अब्दुल्ला शायद इसी रणनीति से जम्मू वालों को सहमत करवाने के लिए राहुल गान्धी को सख्ती से निर्देश देते हैं कि सारा जोर जम्मू में जाकर लगाओ। दुर्भाग्य से जम्मू के लोगों की मानसिकता न पंडित जवाहर लाल नेहरु समझ सके थे और न अब राहुल गान्धी समझ रहे हैं। जहां तक कश्मीर के आम कश्मीरी का ताल्लुक है, वह सैयदों और शेखों की इस जुमलेबाजी से हैरान है। यदि जम्मू कश्मीर की पांच की पांच लोकसभा सीटें भी कभी न कभी ये सैयद और शेख जीत लें, तब भी क्या लोकसभा में मात्र पांच सदस्यों से सैयदों व शेखों का बहुमत बन जाता है? अलबत्ता पाकिस्तान खुश है। उसका कहना है कि इस बार नेशनल कान्फ्रेंस, पीडीपी, कांग्रेस और पाकिस्तान कश्मीर को लेकर एक ही पेज पर हैं। कांग्रेस की ओर से तो उत्तर शायद सैम पित्रोदा ही देंगे लेकिन सैयद परिवार और अब्दुल्ला परिवार कटघरे में चले गए हैं। अलबत्ता जम्मू कश्मीर का अवाम इसका उत्तर मतदान केन्द्रों के आगे लम्बी लम्बी लाईनों से दे ही रहा है।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री



