संपादकीय

‘एक देश, एक चुनाव’, साथ मिले को बात बने

सरकार शीत सत्र के दौरान ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़ा प्रस्ताव संसद में पेश करने की सोच रही है। लेकिन इसके लिए आवश्यक संख्याबल उसके पास नहीं है। इसका मतलब है, उसे विपक्षी खेमे के सहयोग की जरूरत पड़ेगी। इस लोकसभा चुनाव के बाद से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जिस तरह का रिश्ता रहा है, उसे देखते हुए तो यह उम्मीद व्यावहारिक नहीं लगती कि विपक्ष इस मामले में किसी तरह का सहयोग करेगा।

‘एक देश, एक चुनाव’ पर कोविंद कमिटी की सिफारिशों को मानकर केंद्र सरकार ने भले पहला कदम बढ़ा दिया हो, लेकिन असल चुनौती अब आने वाली है। राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए इस मसले पर विपक्ष को अपनी तरफ करना और इस योजना के व्यावहारिक पक्षों को देखना, ये दो बातें हैं, जो तय करेंगी कि सरकार अपने इस विजन को अमली जामा पहनाने में कितना सफल हो पाती है।

विपक्ष कैसे मानेगा: सरकार शीत सत्र के दौरान ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़ा प्रस्ताव संसद में पेश करने की सोच रही है। लेकिन इसके लिए आवश्यक संख्याबल उसके पास नहीं है। इसका मतलब है, उसे विपक्षी खेमे के सहयोग की जरूरत पड़ेगी। इस लोकसभा चुनाव के बाद से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जिस तरह का रिश्ता रहा है, उसे देखते हुए तो यह उम्मीद व्यावहारिक नहीं लगती कि विपक्ष इस मामले में किसी तरह का सहयोग करेगा।

पक्ष में तर्क: इस मामले पर विचार के लिए बनी उच्च स्तरीय कमिटी ने 62 राजनीतिक दलों से संपर्क किया था। इनमें से 47 ने जवाब दिया। 32 दल पक्ष में थे और 15 ने विरोध किया। पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के पीछे सबसे बड़ा तर्क है कि इससे खर्च में कटौती होगी। और यह तर्क भी जोरदार है कि अभी लगभग हर वक्त ही देश के किसी न किसी हिस्से में चुनावी माहौल चल रहा होता है, जिसके चलते विकास कार्य प्रभावित होते हैं। यह बात भी सही है कि एक साथ चुनाव उन छोटे दलों के लिए सुविधाजनक होंगे, जिनके पास बार-बार प्रचार में उतरने लायक पैसे नहीं होते।

संसाधन कैसे जुटेंगे: बार-बार चुनावों के खर्च से बचने का तर्क अपनी जगह ठीक है, लेकिन यही तर्क इस प्रस्ताव के खिलाफ भी काम करता है। सवाल यह है कि पूरे देश में इलेक्शन कराने के लिए जितने बड़े पैमाने पर संसाधन चाहिए, क्या उसे जुटाया जा सकेगा? हालिया लोकसभा चुनाव सात चरणों में हुए थे। राज्यों के विधानसभा चुनाव भी अलग-अलग चरणों में कराने पड़ रहे हैं।

राजनीतिक विविधता: आजादी के बाद देश में पहले चार चुनाव इसी तर्ज पर हुए थे। उसके बाद भी काफी समय तक यह स्थिति बनी रही। लेकिन तब परिस्थितियां दूसरी थीं। केंद्र और राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार थी। क्षेत्रीय दलों के ताकतवर होने से राजनीतिक विविधता आई है हमारे पॉलिटिकल सिस्टम में। देश के हर राज्य की अपनी जरूरतें हैं और अपने मुद्दे। हर चुनाव इन खास मुद्दों के इर्द-गिर्द लड़ा जाता है। किसी भी बदलाव में देश की इस अनेकता का ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि यही तो हमारी ताकत है।

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