संपादकीय

पुतिन का मध्यस्थता का आग्रह, भारत की अहम भूमिका

रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने वैसे खुद पुतिन ने संभावित मध्यस्थ के रूप में तीन देशों- भारत, चीन और ब्राजील- के नाम लिए, लेकिन जैसा कि बाद में उनके प्रवक्ता की ओर से दिए गए बयान से साफ हुआ, इनमें भारत की भूमिका ही प्रमुख मानी जा रही है। रूसी राष्ट्रपति के प्रवक्ता ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि भारत युद्ध में शामिल दोनों ही पक्षों से सीधे सूचनाएं हासिल कर इस प्रक्रिया को अगुआई देने की स्थिति में है। अन्य कोई देश इस स्थिति में नहीं दिख रहा।

पुतिन से पहले यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की भी भारत से शांति प्रक्रिया को बढ़ावा देने का परोक्ष आग्रह करते हुए कह चुके हैं कि उसे अगले शांति सम्मेलन की मेजबानी करनी चाहिए। हालांकि उन्हें मालूम था और बाद में उन्होंने कहा भी कि मेजबानी वही देश कर सकता है, जिसने पहले शांति सम्मेलन के संयुक्त वक्तव्य में हस्ताक्षर किया हो। भारत शांति सम्मेलन में शामिल जरूर हुआ था, लेकिन संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने से उसने इस आधार पर इनकार कर दिया था कि इसमें रूस की भागीदारी नहीं है।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मंगलवार को ईस्टर्न इकॉनमिक फोरम में यह महत्वपूर्ण संकेत दिया कि अगर यूक्रेन चाहे तो वह बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने संभावित मध्यस्थ के रूप में भारत सहित कुछ देशों के नाम भी सुझाए। उनके इस बयान ने ढाई साल से चले आ रहे इस युद्ध की समाप्ति की संभावनाएं जगाई हैं। इसके साथ ही एक स्तर पर रूस की इस पेशकश को भारत के अब तक के स्वतंत्र और संतुलित नजरिए की पुष्टि के रूप में भी देखा जा सकता है।

शांति का पक्षधर
इसके पीछे भारत का दोनों ही पक्षों से सहयोगात्मक संबंध बनाए रखने का आग्रह, पीएम मोदी की दुनिया के नेताओं से बेहतरीन पर्सनल केमिस्ट्री डिवेलप करने की क्षमता और हर हाल में देश हित पर आधारित स्वतंत्र और संतुलित नीति पर टिके रहने की प्रतिबद्धता का जिक्र किया जा सकता है। ध्यान रहे, पिछले दो महीने के अंदर रूस और यूक्रेन दोनों देशों की यात्रा पर जाने वाले पीएम मोदी दुनिया के एकमात्र प्रमुख नेता हैं। पुतिन और वोलोदिमीर जेलेंस्की दोनों से मुलाकात में उन्होंने भारत को शांति का पक्षधर बताते हुए बातचीत शुरू करने का सुझाव दिया था।

दोनों पक्षों की भागीदारी
पुतिन से पहले यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की भी भारत से शांति प्रक्रिया को बढ़ावा देने का परोक्ष आग्रह करते हुए कह चुके हैं कि उसे अगले शांति सम्मेलन की मेजबानी करनी चाहिए। हालांकि उन्हें मालूम था और बाद में उन्होंने कहा भी कि मेजबानी वही देश कर सकता है, जिसने पहले शांति सम्मेलन के संयुक्त वक्तव्य में हस्ताक्षर किया हो। भारत शांति सम्मेलन में शामिल जरूर हुआ था, लेकिन संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने से उसने इस आधार पर इनकार कर दिया था कि इसमें रूस की भागीदारी नहीं है।

पॉजिटिव संकेत शुरू से भारत का यह स्पष्ट मत रहा है कि शांति की राह तभी खुल सकती है जब दोनों ही पक्ष इसके लिए तैयार हों और इस प्रक्रिया में भागीदारी करें। रूसी राष्ट्रपति का ताजा बयान निश्चित रूप से एक पॉजिटिव डिवेलपमेंट है, लेकिन यह महज शुरुआत है। हां, अगर यूक्रेन का रुख भी पॉजिटिव रहा तो दोनों पक्षों की सहमति बात को आगे बढ़ाने का एक ठोस आधार जरूर मुहैया करा सकती है।

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