संपादकीय

गुस्सा शांत करने का सियासी प्रयास, दिखावे का आपराधिक बिल

रेप-मर्डर मामले में पारित ‘अपराजिता महिला एवं बाल विधेयक में जांच, न्याय और सजा के लिए जो अवधि तय की गई है, वह अव्यावहारिक है, क्योंकि भारत में न्याय की परतें कई हैं। यदि फास्ट टै्रक कोर्ट आरोपित को फांसी की सजा सुना भी देती है, तो उस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। उच्च न्यायालय के बाद सर्वोच्च अदालत है। अंतत: राष्ट्रपति को दया-याचिका दी जा सकती है। मात्र 10 दिन में इन सभी आयामों से न्याय पाना असंभव है, लिहाजा 10 दिन में फांसी की सजा महज नारेबाजी है। जनता को भ्रमित करने की राजनीति है, ताकि कोलकाता की सडक़ें तमाम तरह की सियासत से मुक्त हो सकें। 2012 के ‘निर्भया कांड’ का अंतिम फैसला 8 लंबे सालों के बाद मिला था। नतीजतन उसके बाद ही बलात्कारियों को फांसी पर लटकाया जा सका।

पश्चिम बंगाल विधानसभा में ‘अपराजिता महिला एवं बाल विधेयक’ (आपराधिक कानून एवं संशोधन) सर्वसम्मति से पारित किया गया। कोलकाता आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर बिटिया के रेप-मर्डर के बाद जो तनाव, गुस्सा, आक्रोश और विरोध-प्रदर्शन बंगाल के कई हिस्सों में देखे गए हैं, उन्हें शांत करने का यह एक सियासी प्रयास है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आशंका है कि इतने व्यापक विरोध से उनका परंपरागत जनाधार बिखर सकता है, लिहाजा बलात्कार, हत्या, यौन उत्पीडऩ की कड़ी सजाओं के मद्देनजर उन्हें यह बिल पारित कराना पड़ा। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने भी बिल का समर्थन किया, क्योंकि यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। अलबत्ता यह दिखावे का बिल साबित होगा और ‘राष्ट्रपति भवन’ में लटक कर रह सकता है। दरअसल कोई भी राज्य केंद्रीय कानूनों के समानांतर कानून नहीं बना सकता। सभी राज्यों में अपराध और अन्य मामलों में केंद्रीय कानून ही प्रभावी और लागू होते हैं। वैसे राज्यों को अलग कानून बनाने का भी अधिकार है, लेकिन वे केंद्रीय कानून में बदलाव नहीं कर सकते। यदि राज्य ऐसा करता है, तो राज्यपाल को उस पारित विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजना होता है। बंगाल विधानसभा में जो बिल पारित किया गया है, उसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012 (पॉक्सो) में संशोधन की बात कही गई है। ये कानून संसद द्वारा पारित किए गए हैं। केंद्रीय कानूनों की धाराओं के तहत बलात्कार, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के लिए 20 साल की सजा, उम्रकैद और फांसी की सजा का प्रावधान है, जबकि ‘अपराजिता बिल’ में सिर्फ फांसी के प्रावधान का ही प्रस्ताव है। बीएनएस के तहत बाल अपराधियों के लिए रियायतों का प्रावधान है, लेकिन ‘अपराजिता’ में उन्हें खत्म करने का प्रस्ताव है।

गौरतलब है कि जांच, न्याय और सजा के लिए जो अवधि तय की गई है, वह अव्यावहारिक है, क्योंकि भारत में न्याय की परतें कई हैं। यदि फास्ट टै्रक कोर्ट आरोपित को फांसी की सजा सुना भी देती है, तो उस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। उच्च न्यायालय के बाद सर्वोच्च अदालत है। अंतत: राष्ट्रपति को दया-याचिका दी जा सकती है। मात्र 10 दिन में इन सभी आयामों से न्याय पाना असंभव है, लिहाजा 10 दिन में फांसी की सजा महज नारेबाजी है। जनता को भ्रमित करने की राजनीति है, ताकि कोलकाता की सडक़ें तमाम तरह की सियासत से मुक्त हो सकें। 2012 के ‘निर्भया कांड’ का अंतिम फैसला 8 लंबे सालों के बाद मिला था। नतीजतन उसके बाद ही बलात्कारियों को फांसी पर लटकाया जा सका। उसके बाद किसी भी बलात्कारी को मृत्युदंड नहीं दिया जा सका। यह हमारे कानून के छिद्र हैं, हालांकि ‘निर्भया कांड’ के बाद जस्टिस जेएस वर्मा आयोग बनाया गया था। इस आयोग ने व्यापक विमर्श के बाद, बहुत ही कम समय में, अपनी रपट दी थी। उसके आधार पर केंद्र ने जो कानून बनाया, उसमें भी दोषी को अधिकतम सजा के तौर पर मृत्युदंड का प्रावधान था। हमारे देश और समाज में बलात्कार के औसतन 86 केस हर रोज दर्ज कराए जाते हैं, कितनों को फांसी की सजा दी जाती है? बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस विपक्षी खेमे की एक महत्वपूर्ण पार्टी है। इससे पहले आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र ने भी ‘मौत की सजा’ को अनिवार्य करने वाले बिल पारित किए थे, लेकिन केंद्र से मंजूरी नहीं दी गई। यही नियति अब बंगाल की हो सकती है। ममता बनर्जी ने बिल की आड़ में भी खुन्नस भरी राजनीति की है। उन्होंने सदन में ही प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और उन मुख्यमंत्रियों के भी इस्तीफे मांग लिए, जिनके राज्यों में बलात्कार की संख्या लगभग निरंतर है। चूंकि प्रधानमंत्री पूरे देश के संवैधानिक प्रभारी हैं, लिहाजा वह इस्तीफा दें, क्योंकि वह महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे हैं। क्या राजनीतिक मजाक है यह! दरअसल बलात्कार को ‘राजनीतिक हथियार’ के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। यह देश की बदनसीबी है।

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