दिव्यांग बेटियां भी बनी चैम्पियन और पदकवीर

राजस्थान की अवनि लेखरा ने तो इतिहास ही रच दिया, जब टोक्यो के बाद पेरिस पैरालंपिक में भी उन्होंने निशानेबाजी का स्वर्ण पदक हासिल किया। अभी तो प्रतियोगिताएं शेष हैं। इस बार अवनि का लक्ष्य है कि ‘गोल्डन हैट्रिक’ जीत कर ही वह घर लौटेंगी। उन्होंने अपने पापा से यह वायदा किया है। यह असाध्य भी नहीं है, क्योंकि टोक्यो पैरालंपिक में अवनि ने दो स्वर्ण पदक समेत तीन पदक जीते थे। यदि वह अपने लक्ष्य में कामयाब हो जाती हैं, तो भारत और एशिया की प्रथम दिव्यांग महिला निशानेबाज होंगी।
इस बार देश की दिव्यांग बेटियों ने भी चैम्पियन और पदकवीर बनकर भारत को गौरवान्वित किया है। अजीब संयोग है कि ओलंपिक में मनु भाकर ने पदक जीत कर भारत का खाता खोला था और पैरालंपिक में भी अवनि लेखरा ने स्वर्ण पदक जीत कर इस सिलसिले को स्वर्णिम बना दिया। दोनों ही खिलाड़ी निशानेबाज हैं। पैरालंपिक में दिव्यांग बेटियों का शारीरिक आधा-अधूरापन, उनकी असहायता, असमर्थता और अपाहिज होने की स्थिति भी उनके खेल-हुनर को बांध नहीं सकीं और पेरिस पैरालंपिक में भी बेटियां पदकवीर बनीं। निशानेबाजी में ही, राजस्थान की ही, मोना अग्रवाल ने कांस्य पदक जीत कर एक और मील-पत्थर स्थापित किया है। आज मोना 37 वर्षीय और दो बच्चों की मां हैं, लेकिन उन्हें वह लम्हा आज भी याद है, जब उन्होंने घर छोड़ा था, क्योंकि उन पर शादी का दबाव बनाया जा रहा था। मोना को 2016 से पहले तक यह भी नहीं पता था कि पैरालंपिक खेल भी होते हैं। निशानेबाजी में मात्र 3 साल के अनुभव ने ही उन्हें पैरालंपिक पदकवीर बना दिया। कभी कल्पना की जा सकती थी कि दिव्यांग, धावक बेटी 100 मीटर की दौड़ में हिस्सा लेगी और पैरालंपिक में कांस्य पदक विजेता बनेगी? कमोबेश हमने तो ऐसी कल्पना नहीं की थी, लेकिन मेरठ की प्रीति पाल ने यह लक्ष्य हासिल कर ‘अभूतपूर्व कारनामा’ करके दिखा दिया। पिता ने दूध बेचकर और अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर दिव्यांग बेटी को पैरालंपिक पदकवीर बनाकर तमाम विरोधाभासों को खारिज कर दिया। निशानेबाजी में ही रुबीना फ्रांसिस के खेल को विस्मृत नहीं कर सकते। उन्होंने भी कांस्य पदक हासिल किया। इन बेटियों को सलाम! शाबाश! सोचिए, किसी दुर्घटना में बेटी अपाहिज हो गई। किसी को प्रकृति ने ही विकलांग जन्म दिया। किसी को बीमारी ने आधा-अधूरा कर दिया।
किसी का निचला हिस्सा बिलकुल निष्क्रिय है, किसी की टांगें नहीं रहीं, किसी की एक बाजू और पांव टेढ़ा है, किसी को कृत्रिम अंग लगवाने पड़े हैं। कितनी तकलीफ, कितनी यंत्रणा और कितने तनाव से गुजरी होंगी ये खिलाड़ी बेटियां! उसके बावजूद ये सफलताएं अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों को पराजित कर हासिल की हैं। वाह! देश की चैम्पियन बेटियो! यहां हमें जम्मू-कश्मीर की 17-18 वर्षीय शीतल देवी की याद आती है, जो मुंह और पांव की अंगुलियों से प्रत्यंचा खींच कर तीरंदाजी करती हैं। ऐसा करते हुए उन्होंने 703 का स्कोर बनाया था और 698 के पिछले विश्व रिकॉर्ड को तोड़ा था। यह दीगर है कि खेल के दौरान ही उनका विश्व रिकॉर्ड एक अंक से टूट गया। बेशक शीतल पदकवीर नहीं बन पाईं और एक अंक से पिछड़ गईं, लेकिन उनकी सटीक तीरंदाजी को देख कर लगता है मानो उनके भीतर कोई दैवीय शक्ति विराजमान हो! ये सभी बेटियां पदकवीर खिलाड़ी तो बन चुकी हैं, लेकिन जिंदा इतिहास भी हैं। इतिहास की शिलालेख भी हैं। इन खिलाडिय़ों ने अनथक परिश्रम किया है, संघर्षों से गुजऱी हैं, आर्थिक स्थितियां भी अच्छी नहीं थीं, फिर भी भारत का ‘तिरंगा’ लहराया है और पैरालंपिक के दौरान ‘जन गन…’ भी गूंजा है। ये कम उपलब्धियां नहीं हैं। बेशक सरकार इन खिलाडिय़ों को आर्थिक मदद दे रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण दिलाए हैं, फिर भी प्रतिभा तो खिलाडिय़ों की है, जो नए प्रतिमान स्थापित कर रही है। अब भी भारत पैरालंपिक में 20वें स्थान पर है। अभी तो बैडमिंटन, भाला फेंक और अन्य प्रतियोगिताओं में पदक निश्चित लग रहे हैं, फिर भी सर्वश्रेष्ठता की श्रेणी में आने के लिए हमें ऐसी ही बेटियों के चयन करने पड़ेंगे और खेल को ‘एकलव्य-सा’ लक्ष्य बनाना होगा। पैरालंपिक में भारत की बेटियां जिस तरह से जलवा बिखेर रही हैं, वह वाकई कबिले तारीफ है। हौसलों की उड़ान पर सवार इन बेटियों ने अपनी वीरता से भारतीय झंड़े का मान और बढ़ा दिया है। इन खिलाडिय़ों का जज्बा और हौसला देखकर ये कहना बिलकुल भी गलत नहीं है कि परों से नहीं, हौसलों से उड़ान होती है। ये उदाहरण उन लोगों के लिए मोटिवेशन का काम करेंगे जो बात-बात में निराश हो जाते हैं। इन बेटियों ने यह साबित कर दिया है कि मन में अगर जीतने का जज्बा हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है।



