संपादकीय

लड़कियां फिर आगे,पूर्वाग्रह का वार

देश के प्रायः सभी समाजों में और परिवार के अंदर लड़कियों को जिस पूर्वाग्रह भरी दृष्टि का सामना करना पड़ता है उसका एक ज्वलंत उदाहरण रिपोर्ट में इस तथ्य के रूप में उभरता है कि देश भर में प्राइवेट स्कूलों में लड़कों और सरकारी स्कूलों में लड़कियों की संख्या ज्यादा है। साफ है कि मां-बाप चाहते हैं बेटे ज्यादा अच्छी और महंगी शिक्षा पाएं। बेटियों को जैसे-तैसे पढ़ा देना काफी माना जाता है।

शिक्षा मंत्रालय की ओर से किया गया 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं का विश्लेषण कई गंभीर मसलों की ओर ध्यान खींचता है, लेकिन इसका सबसे अहम पहलू है स्कूलों में लड़कियों की ओर से लिखी जा रही कामयाबी की सुनहरी कथाएं। यह लगातार दूसरा साल है जब शिक्षा मंत्रालय ने देश के 59 स्कूल बोर्डों के रिजल्ट्स का विश्लेषण करते हुए अपनी रिपोर्ट पेश की है।

पूर्वाग्रह का वार
समाज में और परिवार के अंदर लड़कियों को जिस पूर्वाग्रह भरी दृष्टि का सामना करना पड़ता है उसका एक ज्वलंत उदाहरण रिपोर्ट में इस तथ्य के रूप में उभरता है कि देश भर में प्राइवेट स्कूलों में लड़कों और सरकारी स्कूलों में लड़कियों की संख्या ज्यादा है। साफ है कि मां-बाप चाहते हैं बेटे ज्यादा अच्छी और महंगी शिक्षा पाएं। बेटियों को जैसे-तैसे पढ़ा देना काफी माना जाता है।

प्रदर्शन का जज्बा
दिलचस्प है कि यह पूर्वाग्रह लड़कियों के जज्बे को कमजोर करने के बजाय उसे और मजबूती दे रहा है। रिजल्ट्स का विश्लेषण बताता है कि बोर्डों, स्कूलों और विषयों के भेदों से ऊपर उठते हुए लड़कियां, लड़कों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। 10वीं और 12वीं दोनों में, चाहे स्टेट बोर्ड हों या नैशनल और चाहे प्राइवेट स्कूल हों या सरकारी, लड़कियों का पासिंग पर्सेटेंज लड़कों से काफी ज्यादा है।

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