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हिंदू की पहचान को लेकर बहस कभी बंद नहीं होती, भारतीय समाज की पहचान का प्रश्न

हमलावर हिंदुस्तान में आए तो सबसे पहले तो इन्होंने ईसाई पंथ व इस्लाम पंथ की तर्ज पर हिंदू को भी एक पंथ या रिलीजन ही मान लिया। उसके बाद ये लोग इस रिलीजन की पहचान करने का प्रयास करने लगे। हिंदू, जिसे इन्होंने रिलीजन समझ लिया था, उसकी पहचान समझने के लिए इन्होंने अपने अपने रिलीजन के पैमाने ही प्रयोग करने शुरू किए। लेकिन मामला पकड़ में नहीं आ रहा था क्योंकि भारतीय/हिदू समाज को समझने के लिए जिन कारकों का प्रयोग किया जा रहा था, वे कारक ही गलत थे। यह संकट प्रत्यक्ष रूप में 1881 में सामने आया जब ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की कुल जनसंख्या की गणना करने के लिए एक नया विभाग स्थापित किया। जनगणना करवाना तो आसान काम ही था। लेकिन सरकार ने लगे हाथ मजहब/रिलीजन के आधार पर भी संख्या जान लेना जरूरी समझा। इसलिए जनगणना फार्म में रिलीजन को लेकर तीन कॉलम बनाए गए। हिंदू/मुसलमान/ईसाई। है विभाजन का यह तरीका अवैज्ञानिक था, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों को इन प्रश्नों की चिंता नहीं थी…

 हिंदू की पहचान को लेकर बहस कभी बंद नहीं होती। इस बहस की शुरुआत भारत में अरबों, तुर्कों, मुगलों, पुर्तगालियों व अंग्रेजों के आने के बाद ही शुरू हुई। उससे पहले इस प्रश्न पर बहस नहीं होती थी। ये सभी विदेशी हमलावर या तो इस्लाम पंथ को मानने वाले थे या फिर ईसाई मत को मानने वाले थे। इन लोगों का सामाजिक-सांस्कृतिक व राजनीतिक जीवन इन दोनों में से किसी एक रिलीजन से समग्र रूप में संचालित होता था। उनकी पहचान के आधार भी निश्चित थे/हैं। जो व्यक्ति न्यू टैस्टामैंट में विश्वास करता है, ईसा मसीह को परमात्मा का पुत्र मानता है और चर्च में जाकर पूजा करता है, वह ईसाई है। इसी प्रकार इस्लाम पंथ को मानने वालों की पहचान भी निश्चित थी। जो व्यक्ति हजरत मोहम्मद को अल्लाह का रसूल मानता है, कुरान शरीफ को स्वीकारता है, मस्जिद में जाकर ईश्वर की इबादत करता है, वह इस्लाम पंथ को मानने वाला यानी मुसलमान है। जाहिर है जब एक निश्चित स्थान पर जाकर पूजा करता है तो वहां पूजा का कर्मकांड करवाने वाला भी चाहिए। इस्लाम पंथ में यह पूजा पाठ करवाने वाला मुल्ला मौलवी था। हर मस्जिद का एक मौलवी निश्चित था। उसे वायज, मीरवायज या इमाम कहा जाता था। इसी प्रकार ईसाई पंथ में पूजा का स्थान चर्च कहलाने लगा और वहां पूजा पाठ करवाने वाला व्यक्ति पादरी कहलाने लगा। लेकिन धीरे ईसाई पंथ में पूजा करवाने वाले लोगों की एक पूरी संगठित जमात खड़ी हो गई जिसका मुखिया पोप कहलाता है।

जब ये हमलावर हिंदुस्तान में आए तो सबसे पहले तो इन्होंने ईसाई पंथ व इस्लाम पंथ की तर्ज पर हिंदू को भी एक पंथ या रिलीजन ही मान लिया। उसके बाद ये लोग इस रिलीजन की पहचान करने का प्रयास करने लगे। हिंदू, जिसे इन्होंने रिलीजन समझ लिया था, उसकी पहचान समझने के लिए इन्होंने अपने अपने रिलीजन के पैमाने ही प्रयोग करने शुरू किए। लेकिन मामला पकड़ में नहीं आ रहा था क्योंकि भारतीय/हिदू समाज को समझने के लिए जिन कारकों का प्रयोग किया जा रहा था, वे कारक ही गलत थे। यह संकट प्रत्यक्ष रूप में 1881 में सामने आया जब ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की कुल जनसंख्या की गणना करने के लिए एक नया विभाग स्थापित किया। जनगणना करवाना तो आसान काम ही था। लेकिन सरकार ने लगे हाथ मजहब/रिलीजन के आधार पर भी संख्या जान लेना जरूरी समझा। इसलिए जनगणना फार्म में रिलीजन को लेकर तीन कॉलम बनाए गए। हिंदू/मुसलमान/ईसाई। जाहिर है इससे स्पष्ट पता चल गया कि हिंदुस्तान में 712 के बाद से देश में कितने लोग मुसलमान या ईसाई बन गए हैं। एटीएम (अरब-तुर्क-मुगल) मूल के मुसलमानों के सात-आठ सौ साल के शासन के दौरान कुछ करोड़ भारतीय/हिंदू भी मतांतरित हो गए थे। अंग्रेजों के शासनकाल में कुछ भारतीय ईसाई भी हो रहे थे। जाहिर है उनकी संख्या भारतीयों/हिंदुओं के मुकाबले बहुत कम ही थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि 1885 में कांग्रेस की स्थापना और 1905 में मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद अंग्रेज शासकों ने मजहब के आधार पर कुछ सीमित संख्या में भारतीयों को भी स्थानीय प्रशासन में हिस्सेदारी देना शुरू कर दिया था। तब एटीएम मूल के मुसलमानों को जिनका शासन समाप्त हो चुका था, इस बात की चिंता हुई कि संख्या के कारण अब उनको सत्ता मिलने की संभावना कम हो गई थी। इसलिए सबसे पहला काम तो उन्होंने भारतीय मुसलमानों को भी अपने खेमे में जोडऩे या हांकने के प्रयास शुरू किए। लेकिन इसके बावजूद उनकी संख्या भला कितनी हो सकती थी? इसलिए दूसरा प्रयास किसी तरह से हिंदुओं की संख्या कम करने के प्रयास किए।

लेकिन यह काम अंग्रेज शासकों की मदद के बिना नहीं हो सकता था क्योंकि अब सत्ता तुर्कों-मुगलों के हाथ में नहीं थी, बल्कि इंग्लैंड के गोरों के हाथ में थी। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बकौल बाबा साहिब अंबेडकर, एटीएम मूल के आगा खान ने 1910 की जनगणना से पहले वायसराय को एक ज्ञापन दिया। उसके उपरांत ब्रिटिश सरकार ने जनगणना के प्रत्यक्ष और परोक्ष दो पैमाने निर्धारित किए। परोक्ष पैमाना तो यह था कि ब्रिटिश सरकार ने हिदू समाज को सीमित करते हुए हिंदू केवल उसी को माना जो ‘जाति व्यवस्था’ से संचालित था, जबकि वस्तुस्थिति यह थी/है कि हिंदू समाज का बहुत बड़ा हिस्सा जाति व्यवस्था से बाहर है। एक नई अवधारणा स्थापित करने का प्रयास पहली बार हुआ कि सभी भारतीय/हिंदू जाति व्यवस्था से संचालित हैं। मूल रूप से यह अवधारणा ही गलत है। सभी भारतीय/हिंदू जाति व्यवस्था से संचालित नहीं हैं। हिंदू समाज का बहुत बड़ा हिस्सा जाति व्यवस्था से संचालित नहीं है। मध्य भारत, पूर्वोत्तर भारत में अधिकांश समुदाय मसलन मिजो, कुकी, खासी, गारो, निशी, शेरदुखपेन, संथाल, गोंड, पश्चिमोत्तर भारत में भोट, बलती जाति व्यवस्था से संचालित नहीं हैं। इस निराधार अवधारणा को आधार बना कर जनगणना अधिकारियों ने हिंदू को पहचानने के लिए नई कसौटियां बनाईं। जो उन कसौटियों पर पूरा नहीं उतरता था उसे हिंदू की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। इनमें से एक कसौटी ब्राह्मण को लेकर थी। जनगणना करने वाले अधिकारी घर में जाकर पूछते थे कि आपके जीवन के दैनिक व्यवहार, कर्मकांड में ब्राह्मण का कोई स्थान है? यदि उत्तर नकारात्मक है तो तुरंत उस व्यक्ति को हिंदू समाज से बाहर कर दिया गया। जो हिंदू समाज जाति व्यवस्था से संचालित है, उस हिंदू समाज में तो ब्राह्मण की स्थिति पर बात की जा सकती है, लेकिन जो हिंदू जाति व्यवस्था से संचालित ही नहीं है, उनकी व्यवस्था में ब्राह्मण की स्थिति का प्रश्न कहां पैदा होता है? वह कर्मकांड के लिए ब्राह्मण को क्यों आमंत्रित करेगा? ब्रिटिश सरकार ही नहीं, देश के समाजशास्त्री अच्छी तरह जानते हैं कि ब्राह्मण जाति का अस्तित्व हिंदू समाज के केवल उस हिस्से में है जो जाति व्यवस्था से बंधा है। हिंदू समाज का बहुत बड़ा हिस्सा जाति व्यवस्था के अंतर्गत आता ही नहीं है, इसलिए वहां ब्राह्मण से जुड़े हुए जितने कर्म गिनाए गए हैं, उन सभी का अस्तित्व हो ही नहीं सकता। लेकिन ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने बड़ी होशियारी से जाति व्यवस्था से न संचालित होने वाले हिंदू समाज को गैर हिंदू ही घोषित कर दिया।

इन मानदंडों में से एक मानदंड यह भी था कि क्या आप हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं? जनगणना विभाग ने ‘गॉड्स’ शब्द का इस्तेमाल किया है, लेकिन हम मान लेते हैं कि इसमें देवी-देवता दोनों ही शामिल हैं। लेकिन मूल प्रश्न है कि यह कैसे पता चलता है कि कोई देवी-देवता हिंदू है या नहीं? हिंदू गॉड्स की क्या अवधारणा है? शायद ब्रिटिश उपनिवेशवादियों का किसी से भी यह प्रश्न पूछते समय भाव यह रहा होगा कि जिन देवी-देवताओं की पूजा भारतीय/हिंदू करते हैं, उनकी पूजा आप भी करते हैं। यह ऐसा प्रश्न है जिसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है। आज भी यदि गणना की जाए तो भारतीय/हिंदू समाज में पूजे जाने वाले देवी-देवताओं के नामों की ही सूची तैयार करनी हो तो उसकी संख्या करोड़ों को पार कर जाएगी। इस समाज में ग्राम देवता की अवधारणा है। यह अवधारणा पूरे भारतीय समाज में मोटे तौर पर अभी भी प्रचलित है। हर गांव का एक अपना देवता भी है। इसका अर्थ हुआ जितने गांव उतने देवता। यह मामला ऐसा है कि एक स्थान का हिंदू यह नहीं जानता कि पांच सौ कोस दूर रहने वाला हिंदू किस देवता की पूजा कर रहा है। बहरहाल, जाहिर है विभाजन का यह तरीका अवैज्ञानिक था, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों को इन प्रश्नों की चिंता नहीं थी। उन्हें हिंदू/भारतीय समाज को छोटे-छोटे समुदायों में विभाजित कर उनकी अलग-अलग पहचान स्थापित करनी थी। पश्चिमी शासकों और समाजशास्त्रियों ने हिंदू की पहचान के जो पैमाने निश्चित किए, आज भारत के समाजशास्त्री भी उन्हीं पैमानों के आधार पर भारतीय/हिंदू समाज को समझने के लिए प्रयोग कर रहे हैं। उसके परिणाम सामने आ ही रहे हैं।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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