राजनीति

15 अगस्त 1947 को लाने वाले सत्ता पर बैठे वो तीन शख्स

इस घिनौने 15 अगस्त को लाने वाले कौन थे? यकीनन सत्ता पर बैठे तीन आदमी गवर्नर जनरल लार्ड माऊंटबैटन, धर्म के नाम पर पाकिस्तान मांगने वाले मोहम्मद अली जिन्ना और बेबस पंडित जवाहर लाल नेहरू। इन्होंने कसमें खाई थीं कि बंटवारे में एक बूंद भी इंसानी खून नहीं बहने देंगे। लार्ड माऊंटबैटन ने 50,000 फौजी जवान तैनात कर दिए तो भी मुसलमान सेना उनके हथियार छीन कर ले गई। कल तक जो सेना आपसी भाईचारे की प्रतीक थी आज वह स्वयं एक-दूसरे की दुश्मन हो गई। दिल बंट गए। देश बंट गए। कल के परममित्र आज शत्रु बन गए। है न बंटवारे की विडम्बना? कल तक जो मुसलमान मेरे खेत में काम करता था, मेरे टुकड़ों पर पलता था आज उसी ने मेरा घर लूट लिया और मेरा गला घोंट दिया। कल तक जो मुस्लिम भाईचारे की दुहाई दे रहा था उसके लिए आज मैं ‘काफिर’ हो गया। घरों पर कब्जा कर हमारे सामने मवेशी हांक कर ले गए। कल तक जो मेरे साथ गुल्ली-डंडा खेलता था आज उसी ने तलवार से मेरा सिर धड़ से अलग कर दिया। 15 अगस्त 1947 को मानवता नाम की चीज दिखाई नहीं देती थी। 

15 अगस्त यानी सावन का महीना तब लगातार बारिश, नदियां-नाले उफान पर थे, 1947 में तो नदी-नालों पर पुल भी नहीं होते थे, मूसलाधार बारिश ऊपर से भारत के बंटवारे की घोषणा, मुस्लिम लीग का डायरैक्ट एक्शन प्लान जिसमें लाखों बेगुनाह हिंदुओं का कत्ल हिंदू-मुसलमानों में आपसी खिंची तलवारें निरंतर ‘अल्लाह-हू-अकबर’ गूंजते नारे और ऊपर से देश बंटवारे की घोषणा कैसा संयोग बना कि 15 अगस्त से पहले ही 1947 आ गया जिसमें सब कुछ बह गया, बर्बाद हो गया। देश का बंटवारा ही नहीं हुआ, दिल तक बंट गए। न कायदा, न कोई कानून। 10 लाख मासूम लोग इस 15 अगस्त ने लील लिए। करोड़ों हिंदू-सिख उजड़ कर भारत आने  के लिए शरणार्थी बना दिए गए। नारी जाति का अपमान किसी देश में ऐसा नहीं हुआ जितना 15 अगस्त देखने के इंतजार में भारत में हुआ। 

आज की पीढ़ी को इन बातों का चित-चेता ही नहीं। इस पीढ़ी को बस इतना पता है कि आज के दिन रंगारंग प्रोग्राम होंगे, मंत्री या जिलाधीश झंडा लहराएंगे, परेड की जाएगी, सलामी लेंगे, दो एक शहीदों के नाम दोहराएंगे, स्कूली बच्चे गिद्दा-भंगड़ा डालेंगे, अगले दिन छुट्टी होगी, स्वतंत्रता सेनानियों को अंगवस्त्र ओढ़ाए जाएंगे और कुछ मेरे जैसे तथा कथित समाज सेवकों को प्रशंसा पत्र प्रदान किए जाएंगे। शेष समाज का 15 अगस्त से कोई ताल्लुक नहीं। मजदूर अपनी पत्नी, बच्चों समेत पत्थर तोड़़ते नजर आएगा। उनके बच्चे तब तक पत्थरों पर ही सोए रहेंगे। गरीब की झोंपड़ी बारिश में टपकती रहेगी। बूढ़े-वृद्ध आचार से हाथ पर रख दो रोटी खा लेंगे। सड़कें, गलियां नालियां-नाले गंदगी से भरे रहेंगे और 15 अगस्त सरकारी समागम होते रहेंगे। नई पीढ़ी वालो, है न कमाल की आजादी। 

मां ने दूध के स्थान पर अपने बच्चों को दातुन का जूस पिला कर ही सुला दिया। अफसोस तो इस बात का है कि किसी आजादी के बाद की सरकार ने इसका नोटिस नहीं लिया। क्यों नहीं आजाद भारत की सरकारों ने 76 वर्ष के कालखंड में इन्हें दोषी ठहराया? नरसंहार के जिम्मेदार इन सत्ताधारियों के विरुद्ध मुकद्दमा चलाया? कम से कम वर्तमान प्रधानमंत्री, सर्वसत्ता सम्प्रभु नरेंद्र मोदी 1947 की नरसंहार घटनाओं की जांच के लिए एक आयोग का गठन तो कर देते। 1947 की त्रासदी के भुगत भोगी जो आज भी जिंदा हैं उनके जख्मों पर मलहम ही लगा देते? 1947 में एक खुशहाल देश भारत दो टुकड़ों में बंट गया जो जरखेज, उपजाऊ और विस्तृत धरोहर थी पाकिस्तान को सौंप दी? मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी विकसित सभ्यताओं के देश भारत को उजाड़ दिया? भगवान शिव के तीर्थ स्थान कटास राज, बाबा नानक की जन्म स्थली ‘ननकाना साहिब’ और करतारपुर कर्मस्थली पावन गुरुद्वारा साहिब को क्यों अपवित्र हाथों  में सौंप दिया। 

लाहौर जैसे सुंदर शहर और कराची जैसे अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह का क्या पाकिस्तान हकदार था। महाराजा रणजीत सिंह की राजधानी उनका किला पाकिस्तान को देते समय तीनों नेताओं का दिल नहीं कांपा? लार्ड माऊंनबैटन तो अंग्रेज  थे उन्हें तो भारत से कोई लगाव नहीं था परन्तु पंडित नेहरू तो अपने थे। विद्वान थे, तनिक सोच तो लेते? लाहौर भगवान राम के सुपुत्र लव की बसाई नगरी थी। देश लुट गया, बर्बाद हो गया 1947 को और  हम मुंह लटकाए अपने ही लोगों को मरते देखते रहे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने आटे में नमक जैसा सहयोग शरणार्थियों को दिया होगा तो एहसान नहीं उनका कत्र्तव्य था। संघ का तो जन्म ही राष्ट्र सेवा के लिए हुआ है। भारत को मिला एक खोखला देश और जिन्ना साहिब को पाकिस्तान के रूप में एक मोती मिल गया। अफसोस इस बात का है कि 1947 में भारत की गुप्तचर एजैंसियां तब कहां छिप गई थीं? उन्होंने लोगों को पहले ही आगाह क्यों नहीं किया कि नरसंहार होगा? 

उन्होंने क्यों भारत के लोगों से यह रहस्य छिपाए रखा कि मोहम्मद अली जिन्ना एक ऐसी नामुराद बीमारी से ग्रस्त है कि वह 6 महीने से ज्यादा जीने वाला नहीं? तो बंटवारा 6 महीने बाद देख लेते। जहां स्वाधीनता की जंग भारत सौ साल से लड़ता आया था 6 महीने और संघर्ष कर लेते। कम से कम जिन्ना को मरने तो देते। शायद तब कांग्रेस को प्रधानमंत्री बनाने की प्रबल इच्छा सताने लगी हो? चलो न सही, कांग्रेस आज की पीढ़ी को इतना ही बता दे कि 15 अगस्त दिखाने के लिए ऐसा नरसंहार क्यों हुआ? अरबों की सम्पत्ति नष्ट क्यों हुई। देश टूटते, बनते, बिगड़ते, बंटवारा होते हुए तो देखे परन्तु 1947 जैसा विप्लव तो आज की पीढ़ी को बेचैन कर देगा। अत: अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में उक्त 3 नेताओं पर ‘क्रीमिनल कांस्पिरैंसी’ और 1947 की ‘सरकारी विफलता’ पर मुकद्दमा तो चलना चाहिए। 

बंटवारा दो देशों में हो गया सो हो गया। पर आज कांग्रेस देश की नई पीढ़ी को यह तो बताए कि बंटवारे के बाद कांग्रेस पार्टी और उसके केंद्रीय मंत्री महात्मा गांधी के ‘आमरण अनशन’ से डर क्यों गए? गांधी के इस कथन पर कांग्रेस क्यों अमल करने लगी कि भारत का कोई मुसलमान पाकिस्तान नहीं जाने देंगे। सरकार महात्मा गांधी के इस धमाके से क्यों दहल गई कि पाकिस्तान को उनके हिस्से का 55 करोड़ रुपए देने होंगे? महात्मा गांधी की प्रगाढ़ इच्छा थी कि वह पाकिस्तान बसना चाहते थे। यह अलग बात है कि पाकिस्तान से किसी ने भी उन्हें पाकिस्तान आने का निमंत्रण नहीं दिया। धर्म के आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान  बना लिया तो उस धर्म के मानने वाले हर व्यक्ति को पाकिस्तान धक्के मार कर भेज देना चाहिए था। आज भारत उस गलती पर पछता रहा है कि भारत में निकट भविष्य में एक नया पाकिस्तान बनने जा रहा है। 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ पक्का समझ लें कि यू.पी. में एक पाकिस्तान बन कर रहेगा। अपनी भूतकाल में की गई गलतियों का परिणाम तो प्रत्येक राष्ट्र को भोगना पड़ता है। केंद्र सरकार क्यों नहीं समाज के सभी वर्गों को एक सा पहरावा, एक सी शिक्षा और एक जैसे अवसर प्रदान करने का कानून बनाती? कानून में भेदभाव क्यों? हिंदू दो ही बच्चा पैदा करे और हिंदुस्तान का मुसलमान होकर भी 4 बीवीयां और 16 बच्चे पैदा करेंगे। सब हिंदुस्तानी और सब हिंदोस्तान का एक ही कानून? देश बचाना है, तो बचाओ अन्यथा 1947 दोहराया जाने वाला है। यह देश हमारा हीरे की कनी है। सरकार भारत को 2047 तक इसे विश्व का विकसित राष्ट्र बनाने की सोच रही है परन्तु यह नहीं पहचान पा रही कि इस देश के घाघरे में चूहे घुसे हुए हैं। देश के गद्दार हिंदुओं में भी हैं। सरकार देश हितैषी और देश विरोधी के बीच के अंतर पर नजर रखे। जहां 15 अगस्त की आजादी मान्य, वहीं इसके पीछे की त्रासदी भी हमारी सोच में रहनी चाहिए।-मा. मोहन लाल

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