राष्ट्रीय

छात्रों की दर्दनाक मौत, कोचिंग सेंटरों का काला सच

दिल्ली को सिविल सेवाओं की तैयारी का गढ़ माना जाता है। इसलिए देशभर के छात्र अपना भविष्य बनाने की चाह लेकर कोचिंग सेंटरों में पहुंचते हैं, भारी भरकम फीस भरते हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर सिर्फ हादसे और मौत से सामना होता है। ज्यादातर कोचिंग सेंटर किराए के मकानों में संचालित हैं जिनमें जरूरत की सुविधाएं बिल्कुल भी नहीं होतीं। यदि ऐसे हादसों को रोकना है तो देश में नियम बनाने की जरूरत है, जहां नियमों के तहत ही कोचिंग सेंटर चल पाएं, मनमाने तरीके से नहीं। जिस तरह एक बड़ा अस्पताल, होटल या मॉल खुलता है तो उसे तमाम विभागों से अनुमति लेना अनिवार्य होता है, उसी तरह यदि सरकार चाहे तो कोचिंग सेंटर के इस तंत्र को नियंत्रित कर सकती है। ऐसे में यदि कोचिंग सेंटर और संबंधित एजेंसियां पारदर्शिता से अपना कर्तव्य निभाएं तो ऐसे हादसों पर काफी हद तक रोक लग सकेगी। देश की राजधानी दिल्ली में कोचिंग सेंटर में हुए हादसे ने सभी को हिला दिया है। जिसे देखो, वो कोचिंग सेंटर के संचालकों पर उंगली उठा रहा है, जबकि ऐसे हादसों में केवल उनकी गलती नहीं होती। यह बात जगजाहिर है कि हर एक कोचिंग सेंटर के साथ एक संगठित क्षेत्र जुड़ा होता है…

दिल्ली स्थित एक आईएएस कोचिंग सेंटर में पानी भरने से हुई तीन छात्रों की दर्दनाक मौत ने कोचिंग सेंटरों की कार्यशैली पर फिर से बड़ा सवाल खड़ा किया है। देशभर के छात्र अपना भविष्य बनाने की चाह लेकर कोचिंग सेंटरों में पहुंचते हैं, भारी भरकम फीस भरते हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर सिर्फ हादसे और मौत से सामना होता है। दिल्ली को सिविल सेवाओं की तैयारी का गढ़ माना जाता है। ज्यादातर कोचिंग सेंटर किराए के मकानों में संचालित हैं जिनमें जरूरत की सुविधाएं बिल्कुल भी नहीं होतीं। राजधानी के ओल्ड राजेंद्र नगर में जिस कोचिंग सेंटर में हादसा हुआ है, वह भी किराए पर था। बेसमेंट में बारिश का पानी हमेशा से भरता रहता था, जिसे सेंटर वालों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। आस पड़ोस और चश्मदीदों ने बताया कि सेंटर में पानी जमा होने की समस्या पुरानी है। ड्रेनेज की सही व्यवस्था नहीं है और साफ-सफाई भी नियमित रूप से नहीं होती। स्टूडेंट्स के रहने की व्यवस्था भी ठीक नहीं थी। जगह-जगह पर बिजली के तार भी गिरे रहते हैं, जिससे किसी को भी करंट लग सकता है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, पूरे देश में छोटे-छोटे कस्बों में, अनगिनत कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं। पर, कोचिंग लेने वालों को पढ़ाई के अलावा सुरक्षा से संबंधित जो सुविधाएं मुहैया करवानी चाहिए, वो नहीं मिलती। कुछ कोचिंग सेंटर वालों को सिर्फ शिक्षा के नाम पर धंधा करना होता है। इनके तार ताकतवर लोगों तक होते हैं ताकि कोई अनहोनी घटना होने पर सुलझा लिया जाए।

कोचिंग सेंटरों में हादसे होने की एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि ज्यादातर सेंटर बेसमेंट में हैं और लाइब्रेरियां भी उन्हीं में हंै। ऐसा राजनीतिक नेताओं, एमसीडी अधिकारी और जमीन मालिकों के बीच सांठगांठ से संभव होता है। दिल्ली के करीब 90 फीसदी कोचिंग सेंटरों की लाइब्रेरी बेसमेंट में मौजूद हैं। इसके अलावा कोचिंग सेंटर में पढऩे वाले छात्र छोटे-छोटे कमरों में रहते हैं जिनमें न खिड़कियां होती हैं और न घटना होने पर निकलने की कोई आपात सुविधाएं। दिल्ली में कोचिंग सेंटरों के पास उपयुक्त इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। उन्होंने सडक़ों पर अतिक्रमण किया हुआ है। दीवारें होर्डिंग से पाट रखी हैं। क्या यह सब एमसीडी अधिकारियों को नहीं दिखाई देता? कुल मिलाकर ऐसे हादसे राजनीतिक पहुंच, एमसीडी और कोचिंग संस्थानों के मालिकों के बीच गठजोड़ का ही नतीजा होते हैं। घटना के बाद कई कोचिंग सेंटरों को सील किया गया है। जांच के नाम पर धरपकड़ तेज हुई है। लेकिन यह तभी तक है, जब तक घटना का शोर रहेगा, शोर शांत होते ही कोचिंग वाले फिर से एक्टिव हो जाएंगे। कोचिंग संस्थानों का बढ़ता मकडज़ाल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। ये कोचिंग संस्थान बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाएं उत्तीर्ण कराने में तो सफल हो जाते हैं, पर इसका दूरगामी असर यह पड़ रहा है कि बच्चों को विषय की पूरी जानकारी ही नहीं हो पा रही है, जिसका परिणाम यह हो रहा कि बच्चों का समुचित ज्ञानवर्धन नहीं हो पा रहा है। देश में उच्च माध्यमिक शिक्षा स्तर तक तो कोचिंग रूपी एक समानांतर शिक्षा प्रणाली परिपक्व हो गई है। क्यों समाज के अधिकांश हिस्से ने यह स्वीकार कर लिया है कि किसी भी बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने को कोचिंग में पढ़ाना जरूरी ही नहीं, अनिवार्य है। यह साबित करता है कि समानांतर रूप से दो शिक्षण व्यवस्थाएं चल रही हैं। वे कहते हैं कि कोचिंग में पढ़ाना गलत नहीं है क्योंकि यह निश्चित ही अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्यों से किए गए प्रयास में से एक है और प्रत्येक को आवश्यकतानुसार करना भी चाहिए।

लेकिन यदि शैक्षणिक संस्थानों के साथ कोचिंग में पढऩा अपरिहार्य हो जाए तो निश्चित ही चिंता का विषय है। सदैव से ही शिक्षार्थियों की समस्त शैक्षणिक आवश्यकताओं को उनके अध्ययनरत संस्थानों के माध्यम से ही पूरा कराया जाना निर्धारित रहा है। ऐसी दशा में कोचिंग के माध्यम से शैक्षणिक जरूरतों को पूर्ण कराए जाने के चलन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। वर्तमान में कोचिंग के स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ है और इनके पुराने असंगठित स्वरूप के साथ अब संगठित क्षेत्र में बड़े-बड़े कोचिंग केंद्रों तथा ऑनलाइन कोचिंगों का चलन प्रचलित हो रहा है। इस प्रकार अब लगभग प्रत्येक स्तर की औपचारिक शिक्षा के लिए निर्दिष्ट शिक्षण संस्थानों के साथ में समानांतर रूप से कोचिंग की व्यवस्था उपलब्ध हो चुकी है। इस प्रकार की समानांतर शिक्षा व्यवस्थाओं से निश्चित ही प्रत्येक स्तर के शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत छात्रों की पढ़ाई की कठिनाइयों को दूर करते हुए अच्छी शिक्षा ग्रहण करने के अवसर तो उपलब्ध हो गए हैं, लेकिन इस परिपक्व हो रही नई व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं का मूल्यांकन जरूरी है। देश की शिक्षा व्यवस्था में ऐसी क्या कमी है कि विद्यार्थियों को एक्स्ट्रा कोचिंग लेनी पड़ती है? स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम को ऐसा क्यों नहीं बनाया जाता है कि जिस भी विद्यार्थी को सिविल सेवाओं या अन्य किसी विशेष सेवा में जाना हो तो उसे उसी के कॉलेज में वह शिक्षा मिले।

यदि एक्स्ट्रा कोचिंग जरूरी हो तो भी तमाम कोचिंग सेंटरों को मौजूदा स्कूलों और कॉलेजों में ही क्यों न चलाया जाए? यदि ऐसा किया जाए तो कोचिंग सेंटर चलाने वालों को भी एक व्यवस्थित जगह मिल जाएगी और विद्यार्थियों को भी खुले वातावरण में पढऩे का मौका मिलेगा। यदि ऐसे हादसों को रोकना है तो देश में नियम बनाने की जरूरत है, जहां नियमों के तहत ही कोचिंग सेंटर चल पाएं, मनमाने तरीके से नहीं। जिस तरह एक बड़ा अस्पताल, होटल या मॉल खुलता है तो उसे तमाम विभागों से अनुमति लेना अनिवार्य होता है, उसी तरह यदि सरकार चाहे तो कोचिंग सेंटर के इस तंत्र को नियंत्रित कर सकती है। ऐसे में यदि कोचिंग सेंटर और संबंधित एजेंसियां पारदर्शिता से अपना कर्तव्य निभाएं तो ऐसे हादसों पर काफी हद तक रोक लग सकेगी। देश की राजधानी दिल्ली में कोचिंग सेंटर में हुए हादसे ने सभी को हिला दिया है। जिसे देखो, वो कोचिंग सेंटर के संचालकों पर उंगली उठा रहा है, जबकि ऐसे हादसों में केवल उनकी गलती नहीं होती। यह बात जगजाहिर है कि हर एक कोचिंग सेंटर के साथ एक संगठित क्षेत्र जुड़ा होता है। फिर वो चाहे वहां पढऩे वाले विद्यार्थियों के रहने के लिए हॉस्टल व्यवस्था हो, भोजन व्यवस्था वाले हों, किताब की दुकानें हों या अन्य संबंधित व्यवस्था प्रदान करने वाले हों। परंतु जब भी कभी कोई हादसा होता है तो केवल कोचिंग सेंटर को ही कटघरे में क्यों लाया जाता है? क्या कोचिंग सेंटर चलाने को अनुमति प्रदान करने वाली एजेंसियां इसकी जिम्मेदार नहीं हैं? यही हमारे आसपास चल रहे कोचिंग सेंटरों का काला सच है।-डा. वरिंद्र भाटिया

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