संपादकीय

पीएम मोदी की यात्राः रूस-भारत-चीन मंच फिर से ‘गतिशील’ हो रहा

मामले का सार यह है कि न तो भारत और न ही चीन प्रिमाकोव की बहुध्रुवीयता की क्रांतिकारी अवधारणा को पूरी तरह से सांझा करते थे, जो रूस के पश्चिम से मोहभंग से पैदा हुई थी। चीन प्रगतिशील सोच में भारत से कुछ आगे था और शायद वह आने वाले दशकों के लिए मुख्य वैश्विक विकास प्रवृत्तियों के प्रिमाकोव के पूर्वानुमान में अस्तित्व के कारण को देख सकता था। 1997 के रूसी-चीनी दस्तावेज जिसका शीर्षक था ‘बहुध्रुवीय विश्व पर संयुक्त घोषणा और एक नई अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना’ ने इसका संकेत दिया। लेकिन भारत एक निराशाजनक पिछड़ा हुआ देश था, जो वाशिंगटन सहमति में फंस गया था। अब, 25 साल बाद, चीजें अभूतपूर्व रूप से बदल गई हैं। नाटो विस्तार को लेकर पश्चिम के साथ तनाव के ज्वालामुखी विस्फोट के बाद यूक्रेन में जमीन पर नए तथ्य बनाने के लिए फरवरी 2022 में रूस का कदम, पश्चिमी दुनिया के बाहर शक्ति और विकास के नए केंद्रों का उदय, व्यापक और समान सहयोग पर अंतर्राष्ट्रीय संबंध बनाने की व्यापक इच्छा, वैश्वीकरण से क्षेत्रीय सहयोग पर ध्यान केंद्रित करना जैसे ये प्रमुख रुझान बन गए हैं। यह कहना पर्याप्त है कि प्रिमाकोव के विचार के लिए समय आ गया है कि आर.आई.सी. त्रिकोण बहुध्रुवीय दुनिया और उसके मूल का प्रतीक बन जाना चाहिए। 

ऐसे संकेत हैं कि रूस-भारत-चीन मंच कुछ वर्षों के अंतराल के बाद ‘गतिशील’ हो रहा है। पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मॉस्को की आधिकारिक यात्रा ने प्रतीकात्मकता पर बहुत जोर दिया। यह यात्रा वाशिंगटन में नाटो के शिखर सम्मेलन के साथ हुई, जिसने निश्चित रूप से वर्तमान इतिहास में परिवर्तनकारी क्षेत्रीय वातावरण में रूसी-भारतीय संबंधों के वैश्विक चरित्र पर ध्यान आकर्षित किया। मुख्य रूप से, 26 जून को मास्को में 10वें प्रिमाकोव रीडिंग्स फोरम में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का संबोधन सुनने को मिला। मोदी की यात्रा से बमुश्किल 10 दिन पहले इस संबंध में यह  महत्वपूर्ण संकेत था। प्रिमाकोव रीडिंग्स फोरम एक प्रतिष्ठित आयोजन है। 

सोवियत नायकों के समूह में येवगेनी प्रिमाकोव का एक अनूठा स्थान है। उन्होंने एक सांझे यूरोपीय घर में रूस की खोज की विफलता के बाद सोवियत-पश्चात संक्रमण को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए अपनी उल्लेखनीय बहुमुखी प्रतिभा को संयोजित किया। प्रिमाकोव का दूरदर्शी दिमाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रूस-भारत-चीन (आर.आई.सी.) ‘कॉलेजियम’ शीत  युद्ध के बाद उभरती विश्व व्यवस्था में महत्वपूर्ण हो सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रिमाकोव अपने समय से आगे की सोच रहे थे। निष्पक्षता से कहें तो, न तो नई दिल्ली, जो उस समय अपनी ‘एकध्रुवीय स्थिति’ से ग्रस्त थी और अमरीका का ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बनने की लालसा रखती थी, न ही बीजिंग, जो अमेरिका और चीन (2 सबसे महत्वपूर्ण विश्व अर्थव्यवस्थाएं) से बने काल्पनिक जी-2 समूह से मोहित था, विश्वास की इस युगांतकारी छलांग के लिए तैयार था। 

लावरोव ने प्रिमाकोव फोरम की बैठक में कहा कि लगभग एक साल पहले, हमने एक आर.आई.सी. त्रिपक्षीय प्रारूप बनाने का प्रस्ताव रखा था। हाल ही में, हमने फिर से इस विचार किया। लेकिन अभी तक, हमारे भारतीय मित्रों का मानना है कि सीमा की स्थिति (चीन के साथ) को पहले पूरी तरह से हल किया जाना चाहिए। हम इस बात को समझते हैं। वैसे भी, बीजिंग और नई दिल्ली दोनों त्रिपक्षीय सहयोग प्रारूप को संरक्षित करने में स्पष्ट रुचि दिखा रहे हैं। मुझे यकीन है कि तीनों में से प्रत्येक को सांझा दृष्टिकोण विकसित करने और यूरेशियन और वैश्विक एजैंडे पर प्रमुख मुद्दों पर संरेखित रुख अपनाने से लाभ होगा। बेशक, पश्चिम को आर.आई.सी. द्वारा अपनी एकजुटता को मजबूत करने और सांझा स्थिति से बातचीत करने के किसी भी संकेत से नफरत है। मोदी की मॉस्को यात्रा के संदर्भ में अमरीका का विघटनकारी प्रयास स्वयं स्पष्ट है। 

वास्तव में, आर.आई.सी. प्रारूप में विरोधाभास है जिनका अमरीका फायदा उठाना जारी रखेगा। क्वाड इसका विशिष्ट उदाहरण है। इसके अलावा, न तो चीन और न ही भारत अमरीकियों द्वारा निर्धारित वैश्वीकरण की नींव और तंत्र पर सवाल उठाने के लिए तैयार है और न ही रूस डी-डॉलरीकरण प्रक्रिया को तेज करने के जुनूनी अभियान को सांझा करने के लिए तैयार है। रूस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि उसे पश्चिमी बैंकिंग प्रणाली से बाहर कर दिया गया है, जबकि भारत और चीन को डॉलर के उपयोग पर निर्भर रहने में कोई समस्या नहीं है। इसी तरह, चीन और भारत अपने वित्तीय, निवेश और व्यापार समझौतों, आपूर्ति शृंखलाओं और उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की मात्रा के संदर्भ में वैश्वीकरण की पश्चिमी प्रणाली में गहराई से शामिल हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, भारत को उम्मीद है कि चीनी निवेश भारत में धन ला सकता है और भारतीय उद्योगों के उन्नयन और इसके आर्थिक ढांचे के अनुकूलन को बढ़ावा दे सकता है। 

आर्थिक सहयोग के माध्यम से, भारत और चीन आपसी लाभ के आधार पर समझ और विश्वास को बढ़ावा दे सकते हैं। धीरे-धीरे राजनीतिक मतभेदों और अनिश्चितताओं को हल कर सकते हैं। इस भागीदारी से दोनों देशों की आर्थिक वृद्धि को लाभ होगा और क्षेत्रीय तथा वैश्विक शांति में योगदान मिलेगा। यह एक सकारात्मक संकेत है। भारत-चीन संबंधों में सूत्रधार बनना रूस के हित में है। संभवत: मोदी और पुतिन ने पिछले महीने मास्को में अपनी अनौपचारिक वार्ता के दौरान इस संबंध में विचार सांझा किए हों। लेखक पूर्व राजनयिक हैं,(साभार एक्सप्रैस न्यूज)-एम.के. भद्रकुमार

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