राष्ट्रीय

भारत पर अमेरिकी दबाव, मोदी के रूस दौरे से मिल गया जवाब

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूस दौरे से यह तय हो गया कि अब भारत अमेरिकी दबाव में नहीं आएगा और स्वतंत्र होकर काम करेगा। पहले भी अमेरिका द्वारा भारत दबाव बनाने का प्रयास िकया गया था तथा रूस से कच्चा तेल खरीदने पर मनाही की गई थी। बावजूद इसके भारत ने अमेरिकी दबाव में न आते हुए रूस से तेल खरीदना जारी रखा।

हाल ही में पीएम मोदी के रूस दौरे की काफी चर्चा हुई। भारत से कहीं अधिक चर्चा अमेरिका और दूसरे देशों में हुई। पीएम मोदी की इस यात्रा पर सबसे अधिक पैनी नजर अमेरिका की थी। कहा जा रहा था कि मोदी के वहां जाने से भारत के साथ रिश्तों पर इसका असर पड़ सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह पहली रूस यात्रा थी। इसलिए भी इस दौरे पर अधिक नजर थी। भारत और रूस के बीच गहराते रिश्तों से अमेरिका और यूरोपीय देश एक अलग तरह की बेचैनी महसूस कर रहे थे। मोदी के दौरे के बाद जिस तरीके से अमेरिका की ओर से बयान सामने आए उससे एक बात और अधिक क्लियर हो गई कि भारत का स्टैंड बदला नहीं है।

इसी का नतीजा है कि अमेरिका के बाइडन प्रशासन ने कहा है कि रूस के साथ अपने संबंधों को लेकर चिंताओं के बावजूद भारत वाशिंगटन का रणनीतिक साझेदार बना रहेगा। पेंटागन के प्रेस सचिव ने वाशिंगटन में संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि भारत और रूस के बीच काफी लंबे समय से रिश्ते हैं। अमेरिका के नजरिये से भारत एक रणनीतिक साझेदार है, जिसके साथ हम रूस से उसके रिश्तों सहित पूर्ण और स्पष्ट बातचीत करना जारी रख रहे हैं। वहीं दूसरी ओर अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने कहा कि अमेरिका, रूस से भारत के रिश्तों को लेकर अपनी चिंताओं के बारे में बिल्कुल स्पष्ट रहा है। हमने अपनी चिंताओं को निजी तौर पर सीधे भारत सरकार के समक्ष जाहिर किया है और हम ऐसा करना जारी रख रहे हैं। इसमें बदलाव नहीं हुआ है। ऐसे में सवाल है कि क्या ऐसे बयान पहले संभव थे।

भारत और रूस के बीच गहरी दोस्ती जगजाहिर है लेकिन एक सवाल यह कि क्या अमेरिका की ओर से कुछ साल पहले इसी तरह की प्रतिक्रिया सामने आती। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने आर्थिक क्षति पहुंचाने के लिए रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। इनमें अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली ‘स्विफ्ट’ से रूस को बाहर करना शामिल था। इससे रूस पर विदेशी भुगतान प्राप्त करने की समस्या खड़ी हो गई। इतना ही नहीं रूस से व्यापार करने वाले देशों के लिए भी इसमें एक छिपी चेतावनी थी। इस फैसले के बीच भारत एक अलग ही राह पर चल पड़ा और उसने रूस से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल खरीदने का फैसला हुआ। यूक्रेन संघर्ष के बाद वैश्विक आर्थिक स्थितियों में बदलाव और इस दिशा में भारत के प्रयासों के कारण, दिल्ली ने अब 20 से अधिक देशों के साथ रुपये में लेनदेन शुरू कर दिया है। इन सभी बदलावों की बदौलत अमेरिका और उसके डॉलर का दबदबा कम होने लगा है। इन सभी परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में भारत और रूस के बीच घनिष्ठ संबंधों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यूक्रेन में जारी युद्ध के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी बातचीत पर पश्चिमी देशों की करीबी नजर थी। पुतिन से बातचीत में मोदी ने उनसे कहा कि यूक्रेन संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान पर संभव नहीं है और शांति के प्रयास बम और बंदूकों के बीच सफल नहीं होते हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रस्ताव पर वोटिंग हुई जिसमें रूस से यूक्रेन के खिलाफ आक्रामकता तुरंत रोकने की अपील की गई है। भारत इस वोटिंग से दूर रहा। 193 सदस्यों वाली महासभा में 99 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। बेलारूस, क्यूबा, उत्तर कोरिया, रूस और सीरिया सहित 9 देशों ने इसके खिलाफ मतदान किया। भारत, बांग्लादेश, भूटान, चीन, मिस्र, नेपाल, पाकिस्तान, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और श्रीलंका सहित 60 देश मतदान से दूर रहे। अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी की एक टिप्पणी हाल ही में सामने आई जिसमें उन्होंने कहा कि हम सिर्फ अपना भविष्य भारत में नहीं देखते और भारत केवल अपना भविष्य अमेरिका में नहीं देखता, बल्कि दुनिया हमारे संबंधों में बड़ी चीजें देख सकती है। इस बयान के भी अलग-अलग मायने मतलब निकाले जा सकते हैं लेकिन भारत की ओर से जो बात बार-बार कही जा रही है कि देश का हित पहले अब भी वह उस पर कायम है। बिना इसकी परवाह किए कि कौन नाराज होगा।

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