संपादकीय

सीमा पर गतिरोध, पुनः बातचीत पर सहमति

वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर चीन और भारत के बीच गतिरोध लगातार जारी है। इस बीच शंघाई सहयोग संगठन में दोनों विदेश मंत्रियों के बीच चर्चा में एक बार फिर से एलएसी पर बातचीत पर सहमति बनी है। आशा की जा सकती है कि कुछ न कुछ हल अवश्य निकलेगा। पर फिर भी चीन की अड़ियल रूख से ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकतीहै। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि चीन की साम्राज्यवादी नीतियां पूरे एशिया के लिये सिरदर्द बनी हुई हैं। चीन की विस्तारवादी नीतियों के चलते ही भारत से उसके संबंध अब तक सामान्य नहीं हो पाए हैं। लेकिन कजाकिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनके चीनी समकक्ष वांग यी के बीच हालिया बातचीत से दोनों देशों में संबंधों में सुधार की उम्मीद जगी है। दोनों विदेश मंत्री शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में इस बात को लेकर सहमत हुए हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी और शेष मुद्दों के समाधान के लिये राजनयिक और सैन्य चैनलों के माध्यम से दोगुने प्रयास किये जाएंगे। निश्चय ही गतिरोध की मौजूदा स्थिति में इस घोषणा को नई उम्मीद मानना चाहिए। लेकिन हकीकत यह भी है कि हाल के वर्षों में पूर्वी लद्दाख में लंबे समय से जारी गतिरोध को दूर करने को लेकर भी बीच-बीच में ऐसे दावे कई बार किये गए हैं। बहरहाल, कजाकिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान दोनों नेता इस बात को लेकर सहमत नजर आए कि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने के लिये नई पहल की जानी चाहिए। निस्संदेह, भारत और चीन एशिया की बड़ी ताकतें हैं और दोनों देशों की लंबी सीमा एक-दूसरे से लगती है। यह भी निर्विवाद सत्य है कि हम अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते, ऐसे में सहयोग और विश्वास के रिश्ते दोनों देशों व दक्षिण एशिया के विकास के लिये भी जरूरी हैं। समय की जरूरत है कि शांति और अमन-चैन के लिये बीते गतिरोध से निकलकर जमीनी स्तर पर कुछ ठोस करने के लिये आगे बढ़ा जाए। विगत में बातचीत के राजनयिक व सैन्य स्तर पर कई दौर चले हैं, लेकिन विडंबना यही है कि धरातल पर प्रगति होती नजर नहीं आई। अब विश्वास किया जाना चाहिए कि बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच दोनों देशों की तरफ से संबंध सुधारने के लिये गंभीर प्रयास किये जाएंगे।

निस्संदेह, चीन के छल-बल का लंबा इतिहास रहा है। भारत वर्ष 1962 के युद्ध के जख्मों को अभी तक नहीं भूला है। हालांकि, भारत राजनीतिक व सैन्य ताकत के रूप में उस दौर से कहीं आगे निकल गया है। यही वजह है दोनों देशों के बीच अविश्वास की कमी गाहे-बगाहे उभरकर आ ही जाती है। इसी विश्वास की कमी का उदाहरण सीमावर्ती गांवों में सैन्य उद्देश्य से किये जाने वाले विकास में भी नजर आता है। अरुणाचल को लेकर चीन द्वारा की जानी वाली घोषणाएं भारत को अक्सर असहज करती रही हैं। यही वजह है कि भारत ने चीन के प्रयासों का जवाब देने के लिए अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब गांव व बस्तियां बसाने का निर्णय किया है। उल्लेखनीय है कि चीन ने अपने क्षेत्रीय दावों को मजबूत करने और अपनी सैन्य तैयारी को बढ़ाने के लिये एलएसी के साथ छह सौ से अधिक समृद्ध गांव स्थापित किए हैं। जिसके जवाब में भारत ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम पिछले साल शुरू किया था। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का लक्ष्य सीमावर्ती राज्यों मसलन अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और सिक्किम के लगभग तीन हजार गांवों को इस दायरे में लाना है। जिसके अंतर्गत सड़क और दूरसंचार कनेक्टिविटी, आवास और पर्यटन सुविधाओं में सुधार पर ध्यान देना बड़ा मकसद है। इसका उद्देश्य है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में अधिक से अधिक ग्रामीण सेना की आंख और कान बनने में मददगार हो सकें। दरअसल, इस चौतरफा बुनियादी ढांचे के निर्माण और सैन्य जमावड़े के मध्य, राजनयिक और सैन्य स्तर पर समय-समय पर होने वाली बातचीत अक्सर अनिर्णायक ही रही हैं। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के मध्य कई बार के शिखर सम्मेलन के मध्य हुई बातचीत भी सार्थक नहीं हो पायी हैं। बहरहाल, एशिया की इन दो बड़ी शक्तियों के बातचीत में शामिल होने के बाद भी एलएसी के मानचित्रों का आदान-प्रदान करने में चीन की

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