राजनीति

आपराधिक छवि वालों को अयोग्य घोषित करो

अपराधिक प्रवृति के लोगों को संसद और विधानसभा से बाहर करने की मांग काफी लंबे समय से हो रही है। इस पर न्यायालयों ने भी अपनी सहमति जाहिर की है,लेकिन बेशर्म राजनैतिक दल अपने हकतों से बाज नहीं आते । यही कारण है कि अपराधिक प्रवृति के लोग संसद पहुंच गए हैं। दागी सांसदों में भाजपा के 63, कांग्रेस के 32, समाजवादी पार्टी के 17 सांसदों पर गंभीर अपराध दर्ज हैं। तृणमूल कांग्रेस के साथ डीएमके के छह, तेगलुदेशम पार्टी के पांच और शिव सेना के चार सांसदों के नाम हैं। जरा ध्यान दीजिए, संसद पहुंचने वाले दागी सांसदों में से सबसे ऊपर नाम केरल की इडुक्की सीट से कांग्रेस के डीन कुरियाकोस है, फिर भी यह 133000 वोटों से जीत गया है। उस पर करीब 88 मामले दर्ज हैं। इस सूची में दूसरा नाम कांग्रेस के शफी परम्बिल और तीसरा भाजपा के एतेला राजेंद्र का है। मेरा भारत सरकार से और विशेषकर भारत के मतदाताओं से, भारत के भविष्य के हित में यह निवेदन है कि जो आपराधिक छवि वाले राजनेता हैं, उन्हें कभी चुनाव लडऩे की इजाजत न दी जाए…

अपने देश की जनता और परिवारों को सुरक्षित रखने के लिए, लूटपाट से बचाने के लिए, उनके जीवन की रक्षा के लिए सरकारी आदेश और निर्देश यह रहता है कि जब भी अपने घर, दुकान, संस्थान में कोई नया कर्मचारी रखें अथवा किराएदार रखें तो पुलिस को, विशेषकर अपने क्षेत्र के पुलिस स्टेशन को उसकी जानकारी देनी चाहिए। जब पुलिस यह निश्चित कर दे कि उस व्यक्ति का कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है, तभी उसे किराएदार या कर्मचारी के रूप में रखा जाए। सरकारी नौकरी में भी जो व्यक्ति चुना जाता है, उसकी पहले पुलिस वैरिफिकेशन करवाई जाती है, उसके बाद ही उसे सरकार द्वारा नियुक्ति पत्र मिलता है अथवा नियुक्ति पत्र देने के बाद भी काम करने के पहले दो महीनों में ही पुलिस से जांच आवश्यक कही गई है, पर अब यह प्रश्न पैदा होता है कि जब सरकारी कर्मचारी के लिए नौकरी में आने से पहले पुलिस वैरिफिकेशन जरूरी है तो सरकार के लिए क्यों नहीं। सन् 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इतना ज्यादा दलबदल हुआ जिसने पुराने सारे रिकार्ड तोड़ दिए। साठ के दशक के आया राम गया राम से लेकर 2023 के पलटू राम तक दल बदलने वाले नेताओं की चर्चा खूब रही। 2024 के चुनावों में बहुत से राजनीतिक दलों ने दूसरी पार्टियों के बागी या निकाले गए कार्यकर्ताओं को अपनी पार्टी में शामिल ही नहीं किया, अपितु उनको संसद के लिए प्रत्याशी भी बनाया। कुछ ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व भी एक दल से दूसरे दल में गए अथवा बुलाए गए जिनका अतीत अपराध, भ्रष्टाचार और घोटालों से भरा था।

ऐसे भी नेता लिए गए जो कुछ महीने पहले तक भगवान श्रीराम का नाम भी आदर से नहीं लेते थे और राम मंदिर का मुखर विरोध भी करते रहे, पर वे सभी उस पार्टी में गए जिन्होंने श्रीराम के नाम से ही दो दशक पहले सत्ता प्राप्त की थी। आश्चर्य है कि समाजवादी भाजपा वाले हो गए, भाजपा वाले अकाली हो गए, अकाली और भाजपा दोनों ही आप में भी चले गए। कांग्रेस के वे नेता जो वर्षों से संसद में कांग्रेस के प्रतिनिधि बनकर बैठे थे, दल बदलने में पीछे न रहे। महाराष्ट्र के तो कुछ ऐसे भी प्रसंग सुनने को मिले कि जो नेता सत्ता पक्ष की शरण में आ गए, उन पर अरबों के घोटालों की गाज गिरने वाली थी, पर उन्होंने सत्ता पक्ष का अभेद्य कवच ओढ़ लिया। भारत की जनता का तो धन्यवाद कि जागरूक मतदाताओं ने अधिकतर दलबदलुओं को हराया। मेरा सरकारों से प्रश्न तो यह है कि जब पुलिस यह आदेश-निर्देश देती है कि कोई नया व्यक्ति घर में, व्यापार में, उद्योग में जोडऩे से पहले उनकी पृष्ठभूमि की पुलिस से जांच करवाई जाए, तो ये जो बड़े-बड़े नेता दल बदलकर दूसरी पार्टी में जाते हैं, उन पार्टियों ने कभी इस नियम का पालन किया, जो आम जनता के लिए है। वैसे भी हमारे विद्वानों ने यह कहा है कि जिसके कुल शील का ज्ञान नहीं, उसे अपने घर-संस्थान में कभी स्थान न दें। वास्तविकता तो यह है कि राजनेताओं के अपराध या उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि किसी से छुपी नहीं होती। समाचार पत्रों की सुर्खियों में रहती है। सोशल मीडिया द्वारा लोग उसको जानते हैं, फिर भी देश का बड़े से बड़ा नेता उन्हें गले लगाता है। दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाने का नाटक टेलीविजन पर सारी दुनिया को दिखाया जाता है। पुष्पगुच्छ भेंट करना, गले में अपनी-अपनी पार्टी का सिरोपा पहनाना, मन से दुखी होते हुए भी मुख पर मुस्कुराहट लाना, यह दलबदलुओं का आम खेल है।

भारत की जनता का सीधा-सीधा सवाल सरकार से है, प्रदेशों की सरकारों से भी कि जो कानून हमारे ऊपर अर्थात आम आदमी के ऊपर लागू होते हैं, वे नेताओं पर क्यों नहीं? एक प्रश्न और चुनाव से पूर्व सभी प्रत्याशी चुनाव आयोग को यह जानकारी देते हैं कि उनके ऊपर किस-किस अपराध में मुकदमे चल रहे हैं या उनको दंड देने का अदालत ने निर्णय कर लिया है, फिर भी उनको चुनाव लडऩे की इजाजत क्यों? एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी जिन अपराधों के कारण सरकारी नौकरी के अयोग्य है, उन्हीं अपराधों को या आपराधिक पृष्ठभूमि को स्वीकार करते हुए चुनावी प्रत्याशी चुनाव लडऩे की आज्ञा पा लेता है। आखिर ऐसा क्यों? एसोसिएशन ऑफ डेमाक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार 18वीं लोकसभा के लिए जो 543 सांसद चुने गए उनमें से 251 अर्थात 46 प्रतिशत पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें से 27 सांसदों को अलग-अलग अदालतों से दोषी करार दिया जा चुका है। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार दागी सांसदों का यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इससे पहले 2019 में क्रिमिनल केस वाले 233 अर्थात 43 प्रतिशत सांसद लोकसभा में पहुंचे थे। भारत के मतदाता गंभीरता से सोचें कि यह संख्या बढ़ती क्यों जा रही है। 2009 में 162, 2014 में 185, 2019 में 233 दागी छवि वाले या बहुत से गंभीर अपराध करने वाले संसद में पहुंचे थे, भारत की सरकार बने थे। दुनिया भर की सुख-सुविधाएं उनको मिल गईं। आजीवन पेंशन, मुफ्त रेल यात्राएं, आरक्षण की सुविधा, सब कुछ उनको मिल गया। अब 2009 से 2024 तक गंभीर आपराधिक मामलों वाले सांसदों की संख्या 124 प्रतिशत बढ़ गई। क्या देश का चुनाव आयोग, देश की लोकसभा यह नियम नहीं बना सकती कि जिन कारणों से एक साधारण व्यक्ति चपरासी भी नहीं बन सकता, वैसा ही व्यक्ति अगर नेता है, धनपति, बाहुबली है तो वह संसद में पहुंचकर सरकार बनने के काबिल नहीं होगा। एडीआर के अनुसार ही नए चुने गए सांसदों में से जो 251 दागी हैं, उनमें से 170 पर बलात्कार, हत्या या हत्या का प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे केस हैं।

जानकारी यह भी दी गई है कि दागी सांसदों में भाजपा के 63, कांग्रेस के 32, समाजवादी पार्टी के 17 सांसदों पर गंभीर अपराध दर्ज हैं। तृणमूल कांग्रेस के साथ डीएमके के छह, तेगलुदेशम पार्टी के पांच और शिव सेना के चार सांसदों के नाम हैं। जरा ध्यान दीजिए, संसद पहुंचने वाले दागी सांसदों में से सबसे ऊपर नाम केरल की इडुक्की सीट से कांग्रेस के डीन कुरियाकोस है, फिर भी यह 133000 वोटों से जीत गया है। उस पर करीब 88 मामले दर्ज हैं। इस सूची में दूसरा नाम कांग्रेस के शफी परम्बिल और तीसरा भाजपा के एतेला राजेंद्र का है। मेरा भारत सरकार से और विशेषकर भारत के मतदाताओं से, भारत के भविष्य के हित में यह निवेदन है कि जो आपराधिक छवि वाले राजनेता हैं, उन्हें कभी चुनाव लडऩे की इजाजत न दी जाए। अगर राजनेता उनको प्रत्याशी बना ही लेते हैं तो जनता उनके लिए मतदान न करे। सबसे जरूरी बात, हर पार्टी चुनावी नारों में नशों पर नियंत्रण की बात करती है। बहुत अच्छा हो कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जो नशा करने-कराने वाले हैं, उन्हें भी चुनावी रंग से दूर ही रखा जाए। शराब को नशा मानना उतना ही आवश्यक है जितना दूसरे नशे की चर्चा सरकारें करती हैं

लक्ष्मीकांता चावला

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