राजनीति

राष्ट्र सर्वोपरि तो अग्निवीर भर्ती क्यों?

आधुनिक जमाने में अपने आर्थिक हितों के मद्देनजर जिस प्रकार से चीन और अमरीका आक्रामक अंदाज में एक-दूसरे से उलझ रहे हैं, इसके दृष्टिगत यह वक्त का तकाजा है कि सरकार न केवल हमारे सैनिकों को आधुनिक बनाए, बल्कि सारी भारतीय सेना की अत्याधुनिक हथियारों की जरूरतों को
पूरा करे…

भारत एक शांतिप्रिय देश है और प्राचीन काल से भारत भूमि राजकौशल, युद्धकला और रणनीतियों की वीरभूमि रही है। लेकिन अब आधुनिक युद्ध कौशल, सैन्य साजो-सामान और तकनीकों के आने से सेना अपने नए लॉन्च किए गए ‘प्रोजेक्ट उद्भव’ के माध्यम से और यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया (यूएसआई) के सहयोग से भारतीय सैन्य प्रणालियों, युद्धकला और सामरिक विकास के दृष्टिकोण से बदलाव की ओर अग्रसर है। इस अध्ययन का समग्र उद्देश्य आधुनिक सैन्य शिक्षाशास्त्र के साथ सदियों पुराने ज्ञान को एकीकृत करना है। साल 2023 की ग्लोबल फायर पावर रिपोर्ट के अनुसार भारतीय सेना की गिनती दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सेनाओं में की जाती है। एक बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि जब से अग्निवीर भर्ती योजना आई है, तब से नेपाल में किसी भी तरह की भर्ती रैली का आयोजन नहीं हुआ है। आजादी से पहले तक गोरखा रेजिमेंट में करीब 90 फीसदी गोरखा सैनिक नेपाल के होते थे और 10 फीसदी भारतीय गोरखा, लेकिन बाद में इसे 60 फीसदी नेपाली डोमेसाइल गोरखा और 40 फीसदी भारतीय डोमेसाइल गोरखा कर दिया गया। लिहाजा भारत सरकार को भारतीय युवाओं और गोरखा सैनिकों की नियमित सैनिक भर्ती को अनुमति देनी चाहिए। भारतीय सशस्त्र बलों का एक गौरवशाली अतीत रहा है और बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा स्थापना में हमारे अधिकारियों एवं जवानों ने वीरता और बलिदान की अतुलनीय एवं अनुकरणीय गाथाएं रची हैं।

इतना ही नहीं, आजादी के बाद देश की सीमाओं के भीतर आंतरिक सुरक्षा की बात हो, आतंकवाद से मुकाबले की बात हो, घुसपैठ का मामला हो या कानून व्यवस्था का मसला हो, सीमापार से थोपी हुई लड़ाइयां हों अथवा संयुक्त राष्ट्र संघ शांति स्थापना अभियान, प्रत्येक मोर्चे पर हमारे सशस्त्र सेनाओं के अधिकारियों एवं जवानों ने अपनी बहादुरी की अद्भुत दास्तानें लिखी हैं जो आज भी हमारी पीढिय़ों को प्रेरित करती हैं। हमारे सैनिकों की बहादुरी एवं बलिदान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आजादी के बाद हुई लड़ाइयों और आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों में भारतीय सशस्त्र सेनाओं के 25942 अधिकारी और जवान शहीद हुए हैं। आजकल जो भर्तियां होती हैं, वे किसी भी राज्य की पुरुष जनसंख्या के अनुपात को ध्यान में रखकर की जा रही हैं, जिस वजह से भारतीय सशस्त्र सेनाओं में हिमाचली युवाओं की भागीदारी घटी है। ऐसा माना जाता है कि श्मशीन के पीछे खड़ा आदमी ही महत्वपूर्ण है, लिहाजा हमारी सैन्य तैयारियों में हथियारों को स्त्रोन्नत करने के साथ-साथ उन आधुनिक मशीनों और हथियारों को चलाने वाले सैनिकों को भी उच्च प्रशिक्षित कर उन्हें हुनरमंद, सक्षम, कुशल तथा योग्य बनाने की होनी चाहिए जो अग्निवीर भर्ती योजना में संभव नहीं है। लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) एचएस पनाग के अनुसार वर्ष 2020 से नियमित सैनिकों की कोई भर्ती नहीं की गई है, जबकि हर साल 50 से 60 हजार के बीच सैन्यकर्मी रिटायर होते हैं। 2020 से 2023 के बीच दो लाख से लेकर 2.4 लाख के बीच सैनिक रिटायर हुए हैं, जबकि पेंशन खर्च से बचने की नीति के चलते अब तक केवल 72340 अग्निवीर ही ट्रेनिंग के बाद यूनिटों में शामिल किए गए हैं। इस तरह 127660 से लेकर 168660 कर्मियों की कमी हो गई है। इस कमी के कारण सेनाओं की ऑपरेशनल कुशलता पर काफी बुरा असर पड़ा है।

भारतीय सेना में अफसरों की वैसे ही कमी चल रही है और हमारी सेना कुल 18.3 फीसदी अधिकारियों की कमी से जूझ रही है। पेंशन बिल में कमी आने में अभी 15 से 20 साल लगेंगे। जब सेवारत अग्निवीरों का प्रतिशत बढ़ेगा और उसी अनुपात में रिटायर होने वाले नियमित सैनिकों की संख्या कम होगी, यहां यह बताना उपयुक्त होगा कि तब तक अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था 20 ट्रिलियन डॉलर की हो जाएगी और तब जीडीपी के 2-3 फीसदी के बराबर के रक्षा बजट का आकार करीब 400/600 अरब डॉलर के बराबर हो जाएगा। यह वृद्धि वेतन तथा पेंशन बिल में वृद्धि के अलावा सेनाओं में बदलाव के उपायों को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा। लिहाजा अग्निवीर भर्ती योजना में बदलाव अपेक्षित है। यह देखते हुए कि आने वाले समय में लड़े जाने वाले युद्ध परमाणुयुक्त, एनबीसी वारफेयर और अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक पर आधारित होंगे, इसलिए हमारे सैनिकों को व्यवहार कुशल एवं बौद्धिक रूप से सक्षम बनाने, कम्प्यूटर प्रशिक्षण, कम्युनिकेशन स्किल, साइबर लर्निंग, इलेक्ट्रॉनिक्स वारफेयर, प्रोपेगैंडा, मनोवैज्ञानिक तौर तरीके, मीडिया तथा सोशल मीडिया, हनिट्रेप आदि पर आधारित नई लड़ाइयों से निपटने की सिखलाई देने की आवश्यकता है। सख्त शारीरिक प्रशिक्षण के अतिरिक्त विशेषज्ञों और मोटिवेटरों द्वारा सैनिकों के मोटिवेशन लेवल को बढ़ाने की भी जरूरत है। सैनिकों में बढ़ते असंतोष के दृष्टिगत पुरानी पारम्परिक कार्यप्रणालियों, नियमों, रहन-सहन एवं खानपान संबंधी व्यवस्थाओं में बदलाव की जरूरत है।

भर्ती संबंधी नियमों में बदलाव लाकर निचले स्तर पर सीधे जेसीओज एवं हवलदार पदों पर उच्च शिक्षित युवाओं को भर्ती करने तथा पुराने रैंक्स का नाम बदलकर वायुसेना की तर्ज पर नए पदनाम दिए जाने चाहिए। हमारे अधिकारियों एवं सैनिकों ने पिछले 70 सालों में हुए युद्धों एवं आतंकवाद के विरुद्ध हुई लड़ाइयों में अपनी श्रेष्ठता साबित की है। आधुनिक जमाने में अपने आर्थिक हितों के मद्देनजर जिस प्रकार से चीन और अमरीका आक्रामक अंदाज में एक-दूसरे से उलझ रहे हैं, इसके दृष्टिगत यह वक्त का तकाजा है कि सरकार न केवल हमारे सैनिकों को आधुनिक बनाए, बल्कि सारी भारतीय सेना की अत्याधुनिक हथियारों की जरूरतों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करे और रक्षा खरीद सौदों को सिरे चढ़ाए। अग्निवीर की जगह नियमित सैनिकों की भर्ती, पेशेवर सैन्य शिक्षा एवं प्रशिक्षण द्वारा ही हम भविष्य में लड़ी जाने वाली लड़ाइयों में अपने दुश्मनों को जवाब दे पाएंगे।

अनुज आचार्य

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