अडवानी जी : एक शताब्दी की ओर बढ़ती प्रेरणादायी यात्रा

आज 8 नवम्बर को श्री लालकृष्ण अडवानी जी अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। यह कितना सुखद संयोग है कि आज ही दीपावली का पावन पर्व भी है। प्रभु श्रीराम और दीपों के इस उत्सव के साथ अडवानी जी के जीवन का इतना महत्वपूर्ण पड़ाव जुडऩा, इस अवसर को और भी यादगार बनाता है। इस संयोग को एक और बात विशेष बनाती है। इसी वर्ष हम जनसंघ की स्थापना के 75 वर्ष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती भी मना रहे हैं।
आज का यह अवसर मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भावुक कर देने वाला है। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे हमेशा अडवानी जी का स्नेह, सान्निध्य और मार्गदर्शन मिलता रहा है। आज उनके साथ बिताए हुए अनगिनत पल, उनसे जुड़ी कितनी ही स्मृतियां मन में उमड़ रही हैं। उन्होंने मेरा हाथ थामकर मुझे राजनीति की बारीकियां सिखाईं, कदम-कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया। जीवन में जब भी कोई कठिन परिस्थिति आई, उनका अनुभव और उनकी सीख मेरे लिए संबल बने। आज भी जब मैं उनसे मिलने जाता हूं, तो उनके साथ बिताया हुआ समय मुझे नई ऊर्जा और नई प्रेरणा से भर देता है। आज इस अवसर पर श्रद्धेय अडवानी जी के लिए मन में एक ही भाव उमड़ रहा है :
‘जीवेत शरद: शतं, पश्येम शरद: शतं, शृणुयाम शरद: शतं।’
अडवानी जी का जन्म 8 नवम्बर, 1927 को देव दीपावली के दिन हुआ था। 1947 में, जब वह युवा थे, तब उन्हें विभाजन की पीड़ा सहनी पड़ी। सिंध में अपना घर, अपना परिवेश, अपनी जानी-पहचानी दुनिया छोड़कर उन्हें आना पड़ा और जीवन की नई शुरुआत शून्य से करनी पड़ी। लेकिन इस कठिन अनुभव को लेकर उनके मन में कभी कोई कड़वाहट या पछतावा नहीं रहा। कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हों, नए सिरे से कुछ खड़ा करने का उनका यह संकल्प जीवनभर उनके साथ रहा। जनसंघ को मजबूत बनाने और बाद में भारतीय जनता पार्टी के निर्माण में भी उनका यही गुण सामने आया।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में देश की राजनीति ने बड़े बदलाव देखे। 1989 में कांग्रेस की सीटें 400 से घटकर 200 से भी नीचे आ गईं। 1996 में भाजपा पहली बार देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अडवानी जी ने कार्यकत्र्ताओं की अनेक पीढिय़ों को तैयार किया। उन्होंने ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत पर पार्टी की मजबूत नींव रखी।
यहां मैं अडवानी जी के व्यक्तित्व की 2 ऐसी विशेषताओं का उल्लेख करना चाहूंगा, जो एक नेता के रूप में उन्हें अलग पहचान देती हैं। पहली है, उनकी वैचारिक स्पष्टता और बौद्धिक प्रखरता। उनके भाषणों और लेखन में इसकी झलक साफ दिखाई देती थी। जनसंघ और भाजपा के लिए उन्होंने जो प्रस्ताव लिखे, वे आज भी पढऩे और समझने योग्य हैं। उनके इंटरव्यू में भी विचारों की गहराई के साथ शब्दों की स्पष्टता और सटीकता दिखाई देती थी। दूसरी विशेषता थी, भारतीय राजनीति में लंबे समय तक हावी रही छद्म धर्मनिरपेक्षता को लेकर उनका स्पष्ट और निर्भीक रुख। दिल्ली में उन्हें अटल जी के साथ मिलकर काम करने का अवसर मिला। दोनों ने दशकों तक कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। अडवानी जी के लिए अटल जी हमेशा उनके नेता और मार्गदर्शक रहे। राजनीति के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं, जब दो बड़े कद के नेता इतने लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ खड़े रहे हों। इतिहास साक्षी है, 5-6 दशकों की इस लंबी यात्रा में दोनों एक-दूसरे के सहयोगी बने रहे। एक.दूसरे के प्रति उनका विश्वास और सम्मान हमेशा बना रहा।
1967 में वह दिल्ली महानगर परिषद के अध्यक्ष बने। इस दौरान उन्होंने स्वर्गीय विजय कुमार मल्होत्रा जी के साथ मिलकर काम किया, जो मुख्य कार्यकारी पार्षद बने थे। एक सांसद के रूप में अडवानी जी की यात्रा 1970 के दशक से शुरू हुई। संसद में उनकी सक्रिय भागीदारी की आज भी सराहना होती है। एक सांसद के रूप में, दोनों सदनों में विपक्ष के नेता के रूप में और सत्ता पक्ष में रहते हुए भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। 1991 के लोकसभा चुनाव की स्मृतियां आज भी मेरे मन में ताजा हैं। उस समय तय हुआ था कि अडवानी जी 2 लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ेंगे। इनमें से एक सीट गांधीनगर की थी। 1976 में, जब देश में आपातकाल अपने चरम पर था, तब अडवानी जी गुजरात से राज्यसभा सांसद भी बने थे। इस तरह 1991 में गांधीनगर से चुनाव लडऩा उनके लिए एक तरह से घर वापसी जैसा था। गांधीनगर की जनता ने भी उन्हें बार-बार बड़े बहुमत से विजयी बनाकर संसद भेजा। अपने संसदीय क्षेत्र और वहां के लोगों के प्रति उनका लगाव, उनकी ङ्क्षचता और उनकी जरूरतों का ध्यान रखने का उनका भाव, हम सभी के लिए सीखने योग्य है।
आपातकाल अडवानी जी के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उस दौर में वे लोकतंत्र को बचाने और संविधान की रक्षा के संघर्ष में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे। आपातकाल के दौरान उन्होंने जो कुछ देखा, अनुभव किया और महसूस किया, उसकी झलक उनकी पुस्तक A Prisoner’s Scrap-Book’ में भी मिलती है। इस पुस्तक का एक हिस्सा है ‘A Tale of Two Emergencies’। इसमें उन्होंने जून 1975 से भारत में शुरू हुई घटनाओं और 1933 में हिटलर के शासन के दौरान जर्मनी में हुई घटनाओं के बीच आश्चर्यजनक समानताओं का बहुत प्रभावी ढंग से वर्णन किया है। अडवानी जी विपक्ष में जितने प्रखर नेता रहे, प्रशासन में भी उतने ही कुशल साबित हुए। 1977 में जब जनता सरकार बनी, तो उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। इस मंत्रालय में उनके कार्यकाल को आज भी विशेष रूप से प्रभावशाली माना जाता है। बाद में उप प्रधानमंत्री और देश में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले गृह मंत्रियों में से एक के रूप में उन्होंने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख हमेशा स्पष्ट और दृढ़ रहा। उनके इसी संकल्प के कारण देश को आतंकवाद से निपटने के लिए एक सख्त कानून मिला।
सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा अडवानी जी के जीवन का एक ऐतिहासिक अध्याय है। इस यात्रा ने भारतीय समाज को एक नई और सकारात्मक दिशा दी। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे इस ऐतिहासिक यात्रा से जुडऩे का अवसर मिला। इतनी लंबी यात्रा अपने आप में एक बड़ी चुनौती होती है। अडवानी जी ने इस पूरी यात्रा में जिस जीवटता और संकल्पशक्ति का परिचय दिया, वह अपने आप में प्रेरणादायी है। इस यात्रा से जुड़ा एक प्रसंग आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है। बिहार में अडवानी जी की गिरफ्तारी हम सभी के लिए बहुत दुखद क्षण था। उस समय गुजरात में भाजपा ने चिमनभाई पटेल की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके पीछे संदेश बिल्कुल स्पष्ट था… अपनी विचारधारा और राम मंदिर के निर्माण के संकल्प पर कोई समझौता नहीं होगा। और फिर वर्षों बाद वह ऐतिहासिक अवसर भी आया, जब जनता-जनार्दन के आशीर्वाद से अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का सपना साकार हुआ।
अडवानी जी ने अपने आचरण से हमेशा सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और शुचिता का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्हें पढऩे का बहुत शौक है। जो लोग उनके साथ रहे हैं, वे जानते हैं कि वह अखबारों को भी कितने ध्यान से और कितनी बारीकी से पढ़ते रहे हैं। सिनेमा और रंगमंच से भी उनका गहरा लगाव रहा है। वर्षों तक वह बड़े उत्साह से फिल्मों की समीक्षा भी करते रहे हैं। इतिहास के प्रति उनकी गहरी समझ और उसे सहेजकर रखने की उनकी भावना भी उल्लेखनीय है। उनकी पुस्तक ‘My Country My Life’ में इसकी सुंदर झलक मिलती है। अडवानी जी के व्यक्तित्व के ऐसे अनेक पहलू हैं, जो उन्हें और भी विशिष्ट बनाते हैं। उनकी सादगी और सरलता भी ऐसी ही एक विशेषता है। नवनिर्माण आंदोलन के बाद अडवानी जी जूनागढ़ आए थे। वहां वे एक सामान्य कार्यकत्र्ता की तरह पूरे एक महीने तक रहे और विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करने में जुटे रहे। इन चुनावों में जनता ने इंदिरा गांधी की कांग्रेस को नकार दिया था।
अडवानी जी का अपनी सिंधी संस्कृति से हमेशा गहरा जुड़ाव रहा है। लेह के पास सिंधू दर्शन पूजा को लोकप्रिय बनाने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुझे स्वयं भी एक बार अडवानी जी और जॉर्ज फर्नांडिस जी के साथ सिंधू दर्शन पूजा में शामिल होने का सौभाग्य मिला था। अडवानी जी की इस असाधारण जीवन यात्रा की बात हो और कमला अडवानी जी का उल्लेख न हो, तो यह यात्रा अधूरी रह जाएगी। इतने लंबे सार्वजनिक जीवन में कमला जी हमेशा उनकी शक्ति और संबल बनी रहीं। हर कदम पर उनका साथ दिया।
देश के प्रति उनके योगदान के लिए कृतज्ञ राष्ट्र ने वर्ष 2024 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। आज जब अडवानी जी अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तो मैं ईश्वर से उनके उत्तम स्वास्थ्य की प्रार्थना करता हूं। वह इसी तरह हम सभी को प्रेरणा देते रहें, हमारा मार्गदर्शन करते रहें।-नरेंद्र मोदी (भारत के प्रधानमंत्री)



