अमरीका से मिला संदेश : कोई भी नेता जनता से बड़ा नहीं

अमरीकी मध्यावधि चुनावों में डोनाल्ड ट्रम्प की हार रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक झटके से कहीं अधिक है। यह हर जगह के राजनेताओं के लिए एक चेतावनी है कि एक बार हासिल की गई सत्ता को कभी भी स्थायी या गृहीत नहीं माना जा सकता। कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल करते हुए डैमोक्रेट्स की व्यापक जीत ने आम अमरीकियों के बढ़ते असंतोष को उजागर कर दिया है, जो ऐसे नेतृत्व से निराश थे, जो उनके रोजमर्रा के सरोकारों से लगातार कटता जा रहा था। सवाल यह है कि क्या ट्रम्प अपने घमंड, अपनी नीतियों, ईरान के साथ युद्ध के कारण हारे, या फिर अमरीका केवल यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में चल रहे एक बड़े राजनीतिक आंदोलन को प्रतिबिंबित कर रहा है। इसका उत्तर शायद इन सभी कारकों का एक संयोजन है।
ट्रम्प ने हमेशा शक्ति प्रदर्शन में विश्वास किया है। उनकी राजनीतिक शैली टकराव वाली है, उनकी भाषा अक्सर कठोर होती है और उनका आत्मविश्वास कभी-कभी घमंड की सीमा को छूने लगता है। उन्होंने बार-बार खुद को अमरीका को बचाने में सक्षम एकमात्र व्यक्ति के रूप में पेश किया है। लेकिन एक समय ऐसा आता है जब सत्ता का निरंतर प्रदर्शन उन लोगों को भी दूर करने लगता है जिन्होंने कभी इसका समर्थन किया था। कई अमरीकी इस निष्कर्ष पर पहुंचते दिखे कि उनके राष्ट्रपति अपनी कठिनाइयों को समझने की बजाय अपने अधिकार का प्रदर्शन करने में अधिक चिंतित थे। हालांकि, अर्थव्यवस्था चुनावी परिणाम का सबसे शक्तिशाली स्पष्टीकरण बनी हुई है। ट्रम्प ने कीमतें नीचे लाने और आम अमरीकियों के जीवन में सुधार करने का वादा किया था। इसकी बजाय, किराने का सामान, आवास, स्वास्थ्य सेवा और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च परिवारों पर भारी पड़ता रहा। मुद्रास्फीति केवल एक आॢथक आंकड़ा नहीं, यह किसी परिवार के बचत करने में सक्षम होने और अगले वेतन के दिन तक जीवित रहने के लिए संघर्ष करने के बीच का अंतर है।
अमरीकी उद्योगों की रक्षा के उद्देश्य से बनाई गई उनकी टैरिफ नीतियों ने भी आॢथक अनिश्चितता और उच्च लागत में योगदान दिया। जिन मतदाताओं को तत्काल राहत की उम्मीद थी, वे यह सवाल उठाने लगे कि क्या ये नीतियां वास्तव में उनके पक्ष में काम कर रही हैं? अमरीकी मतदाता ट्रम्प को एक और मौका देने के लिए तैयार रहे होंगे लेकिन धैर्य की भी एक सीमा होती है। ईरान के साथ युद्ध एक और निर्णायक कारक बन गया। इस संघर्ष ने अनिश्चितता, बढ़ती ऊर्जा लागत और यह सवाल पैदा किया कि अमरीका एक और लंबे सैन्य जुड़ाव में क्यों शामिल हुआ। ऐसे समय में, जब परिवार जीवन-यापन की लागत से जूझ रहे थे, युद्ध पर भारी राशि खर्च करने के विचार को उचित ठहराना बेहद मुश्किल हो गया। ट्रम्प ने खुद स्वीकार किया कि ईरान युद्ध ने चुनाव को प्रभावित किया था। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि विदेश नीति, जो अक्सर आम मतदाता से दूर दिखाई देती है, अंतत: घरेलू बजट में अपना रास्ता तलाश ही लेती है। ईंधन की ऊंची कीमतें, अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता और तनाव बढऩे का डर हर किसी को प्रभावित करता है।
यूरोप ने लोकलुभावन पाॢटयों के उदय, विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक अस्थिरता को देखा है। आॢथक तंगी, जनता के असंतोष और बदलती राजनीतिक निष्ठाओं के दबाव में सरकारें गिर गई हैं या कमजोर हो गई हैं। फिर भी यह प्रवृत्ति एक समान नहीं है। कुछ देशों में, लोकलुभावन आंदोलन मजबूत हो रहे हैं, दूसरों में, मतदाता उन्हें खारिज कर रहे हैं। सांझा सूत्र यह है कि पारंपरिक राजनीतिक निष्ठाएं कम भरोसेमंद होती जा रही हैं। मध्य पूर्व में अनिश्चितता एक और आयाम जोड़ती है। युद्ध, विस्थापन, ऊर्जा असुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय तनाव ने यह भावना पैदा की है कि दुनिया तेजी से अस्थिर होती जा रही है। हर जगह नागरिक पूछ रहे हैं कि क्या उनकी सरकारें उनके आॢथक हितों की रक्षा करने और एक सुरक्षित भविष्य प्रदान करने में सक्षम हैं।
विश्वास का एक गहरा संकट भी है। राजनेताओं को अब उनके भाषणों से नहीं, बल्कि इस बात से आंका जाता है कि वे परिणाम देते हैं या नहीं। बड़ी घोषणाएं, अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन और शक्ति का प्रदर्शन बेरोजगारी, महंगे आवास या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए ट्रम्प की हार की व्याख्या केवल एक व्यक्ति की अस्वीकृति के रूप में नहीं की जानी चाहिए। यह राजनीतिक व्यक्तित्व की सीमाओं और जनता के असंतोष की उपेक्षा के परिणामों को दर्शाती है। उनके विरोधियों के पास अब बदलाव के वादों को पूरा करने का अपना कठिन कार्य हो सकता है। चुनाव जीतना एक बात है, सफलतापूर्वक शासन करना दूसरी।
आर्थिक वृद्धि, बुनियादी ढांचा और अंतर्राष्ट्रीय स्थिति महत्वपूर्ण हैं लेकिन आम नागरिक किफायती जरूरतें, रोजगार, सुरक्षा और सम्मान भी चाहता है। कोई भी सरकार यह नहीं मान सकती कि उसकी लोकप्रियता आॢथक तंगी से अछूती रहेगी। दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जिसमें मतदाता अधिक तत्काल उत्तरों की मांग कर रहे हैं। उनके पास घमंड, राजनीतिक नाटकबाजी और अधूरे रह जाने वाले वादों के लिए कम धैर्य है। अंतत:, ट्रम्प की हार हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र के पास सत्ता की ज्यादतियों को सुधारने का एक तरीका है। मतपेटी उन लोगों की आवाज बन जाती है जो खुद को अनसुना महसूस करते हैं। और जब वह आवाज इतनी मजबूत हो जाती है, तो सबसे शक्तिशाली नेता को भी सुनना ही पड़ता है। अमरीका से मिला संदेश स्पष्ट है-कोई भी नेता जनता से बड़ा नहीं है और कोई भी राजनीतिक जनादेश स्थायी नहीं है।-देवी चेरियन



