संपादकीय

ईडी की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की नसीहत, छापों से नहीं आरोप साबित करने से तय होगी साख

केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनरई विजयन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस सवाल को केंद्र में ला दिया है कि जांच एजेंसी की ताकत का पैमाना केवल छापे, गिरफ्तारियां और संपत्तियों की कुर्की नहीं, बल्कि निष्पक्ष पड़ताल और अदालत में आरोपों का साबित होना भी है।

अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को कहा कि वह धनशोधन निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई आगे बढ़ाए, लेकिन वैधानिक सीमा लांघकर दूसरी एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में दखल न दे। यह केवल कानूनी प्रक्रिया की हिदायत नहीं, संस्थाओं के बीच अधिकारों के संतुलन का सवाल भी है।

यह कोई पहली बार नहीं है जब शीर्ष अदालत ने ईडी की कार्यशैली को लेकर नाराजगी जताई है। पहले भी ऐसे सवाल उठ चुके हैं कि ईडी जिन आरोपों के साथ किसी नेता के खिलाफ कार्रवाई शुरू करती है, वे अंतिम तौर पर कितने सही साबित होते हैं और उनमें दोषसिद्धि की दर कितनी है। खुद सरकार की ओर से संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक, जून, 2014 से अक्तूबर, 2025 के बीच ईडी ने धनशोधन निवारण अधिनियम के तहत छह हजार तीन सौ बारह मामले दर्ज किए, लेकिन उनमें केवल एक सौ बीस मामलों में सजा संभव हो सकी। कुल मामलों की तुलना में अपराध सिद्ध होने की दर इस संस्था की कार्यशैली को दर्शाती है।

STORIES YOU MAY LIKE

जाहिर है, ईडी द्वारा हजारों दर्ज मामलों और अंतिम फैसलों के बीच का अंतर इसकी कार्यशैली से लेकर विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। राजनीतिक निष्पक्षता की कसौटी भी इसी से जुड़ी है। विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई में भले बदले का प्रमाण न हो, लेकिन अलग-अलग मामलों में कार्रवाई के मानदंडों को लेकर उठते सवालों का जवाब देना भी जरूरी है। सत्ता से निकटता जांच से छूट का आधार नहीं हो सकती और केवल विपक्ष में होना कार्रवाई का कारण नहीं।

सुप्रीम कोर्ट की नसीहत का निहितार्थ यही है कि जांच एजेंसी की स्वतंत्रता का प्रमाण उसके अधिकारों की व्यापकता नहीं, बल्कि सत्ता के अनुकूल या प्रतिकूल हुए बिना कानून लागू करने की क्षमता है। विडंबना यह है कि जिस संस्था को निष्पक्षता और ईमानदारी के साथ काम करते हुए अपनी साख बरकरार रखनी चाहिए, उसकी कार्यशैली को लेकर शीर्ष अदालत को हिदायत देनी पड़ती है।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button