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स्तरहीन उच्च शिक्षा का काला साया

क्या उचित कदमों से सरकारों द्वारा संस्थानों दी जा रही वित्तीय सहायता को और ज्यादा तर्कसंगत नहीं बनाया जा सकता? उच्च शिक्षा से जुड़े हर शिक्षक को स्वयं लगातार पढऩे वाला व्यक्ति होना चाहिए। जिस किसी शिक्षक ने वर्षों से कोई नई पुस्तक, शोधपत्र या विषय-संबंधी सामग्री गंभीरता से नहीं पढ़ी, उससे विद्यार्थियों में बौद्धिक जिज्ञासा पैदा करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। सुनने में आता है कि कुछेक तो एक बार नोट्स बना लेते हैं और बीस-बीस वर्ष छात्रों को वही बासी रोटी परोसते रहते हैं। न खुद अपडेट होते हैं, न छात्रों को अपडेट करते हैं…

कॉलेज और उच्च शिक्षा में पढ़ाई की अकादमिक गुणवत्ता में आ रही गिरावट एक गंभीर और चिंताजनक सामाजिक मुद्दा है। स्तरहीन उच्च शिक्षा के कारण ही स्कूल शिक्षा पूरी करने के बाद अधिकतर छात्र बड़े शहरों में या फिर विदेश में बेहतर शिक्षा के लिए जा रहे हैं। स्तरहीन और हल्की गुणवत्ता की उच्च शिक्षा वर्तमान समय में वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर चिंता का विषय है। जब किसी देश की उच्च शिक्षा प्रणाली डिग्री बांटने वाले कारखानों में बदल जाती है और व्यावहारिक ज्ञान देने में विफल रहती है, तो उसे स्तरहीन शिक्षा कहा जाता है। शिक्षा का तेजी से बाजारीकरण हुआ है। कई निजी कॉलेज और विश्वविद्यालय केवल मुनाफे के लिए चल रहे हैं, जहां पढ़ाई से ज्यादा ध्यान फीस वसूलने पर होता है। ये उच्च शिक्षा में स्तरहीनता को बढ़ा रहे हैं। आजकल अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा वित्तीय मजबूरी के चलते ओपन दाखिला प्रणाली को शुरू कर यानी कि रवायती कॉलेज कोर्स खुद शुरू करके इन पुराने कॉलेज छात्रों की संख्या को कमजोर कर दिया गया है इसका नतीजा यह हो रहा है कि छोटे कस्बों और छोटे शहरों के अनेक कॉलेज छात्रों की एनरोलमेंट के लिए तरस रहे हैं और धीरे धीरे पैसों की कमी के चलते बंद होने की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। उच्च शिक्षा के स्तरहीन होने के अनेक प्रशासनिक कारण भी हैं। कुछ रिपोर्ट बताती है कि कई संस्थानों में प्रभावी प्रशासन का अभाव है और शिक्षण और प्रशासनिक कार्यों में शिथिल स्टाफ की जवाबदेही तय नहीं हो पाती है। अनेक राज्यों में रेगुलर कॉलेज प्रिंसिपल और वांछित शिक्षक ही नहीं हैं। मेधावी व्यक्ति कई बार शिक्षण कार्य को अन्य विकल्पों में सफलता न मिलने पर अंतिम विकल्प के रूप में चुन लेते हैं।

ऐसे में ये लोग शायद अपने काम से न्याय नहीं कर पाते हैं। आज भी बहुसंख्या में छात्र केवल समय बिताने या डिग्री हासिल करने के लिए दाखिला लेते हैं। उनकी विषय की गहराई में जाने में कोई रुचि नहीं होती, न ही उन्हें क्लास हाजिरी की फिक्र होती है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों को फीस देने वाले छात्र चाहिए, चाहे वे छात्र कैम्पस में आएं या न आएं, क्लास लगाएं या न लगाएं। यह सभी राज्यों में देखा जा रहा है। डिजिटल मोड ऑफ लर्निंग के चलते क्लासरूम पढ़ाई की मौलिकता और प्रासंगिकता भी खत्म होती जा रही है। यह शिक्षा की वह पारंपरिक और बुनियादी नींव है, जिसे डिजिटल युग की तकनीकें भी पूरी तरह से प्रतिस्थापित नहीं कर सकतीं। क्लासरूम सिर्फ ज्ञान प्राप्त करने की जगह नहीं है, बल्कि यह एक छात्र के सर्वांगीण विकास का प्राथमिक केंद्र है। क्लासरूम में छात्र और शिक्षक के बीच सीधा संवाद होता है। छात्र अपने प्रश्नों का उत्तर तुरंत पा सकते हैं, जिससे सीखने की गति और स्पष्टता बढ़ती है। एक शिक्षक छात्र के चेहरे के हाव-भाव देखकर समझ सकता है कि उसे विषय समझ आ रहा है या नहीं, जो ऑनलाइन स्क्रीन पर संभव नहीं है। छात्र अपने हमउम्र साथियों के साथ बैठते हैं, जिससे उनमें टीम वर्क, सहयोग और नेतृत्व जैसे गुण विकसित होते हैं। अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए बच्चों के साथ रहकर वे सामाजिक ताने-बाने और आपसी सम्मान को सीखते हैं। क्लासरूम का एक तय समय और समय-सारणी होती है, जो छात्रों के जीवन में समय प्रबंधन और अनुशासन की भावना पैदा करती है। घर के वातावरण की तुलना में क्लासरूम का माहौल पढ़ाई के लिए अधिक अनुकूल होता है, जिससे ध्यान भटकने की संभावना कम होती है। क्लासरूम में केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य सिखाए जाते हैं। शिक्षक एक रोल मॉडल के रूप में छात्रों को ईमानदारी, धैर्य और कड़ी मेहनत की प्रेरणा देते हैं। एक समय था जब माना जाता था कि अच्छी कॉलेज डिग्री मिलने के बाद अच्छी नौकरी और बेहतर सैलरी लगभग तय होती है। लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं।

केवल डिग्री हासिल करना ही सफलता की गारंटी नहीं रह गया है। आज मार्किट, मार्कशीट से ज्यादा स्किल और काम करने की क्षमता को महत्व दे रही हैं। इससे आने वाले वक्त में रवायती कॉलेज चल नहीं पाएंगे, इनका तो अब भी बुरा हाल है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कमजोर और कम संख्या वाले कॉलेज एकीकृत किए जाने की बात कही गई है। इस दिशा में काम किए जाने की जरूरत है। छोटे छोटे गांवों और छोटे छोटे कस्बों में निजी हितों की पूर्ति के लिए पचास, सौ से भी कम छात्र संख्या के कॉलेज खोलने से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का ग्राफ गिर रहा है। कई कॉलेज ऐसे हैं जहां टीचर का वर्क लोड ग्रांट इन ऐड के अनुरूप नहीं है। कई कॉलेज बजट बचाने के लिए कम योग्य शिक्षकों से काम कराते हैं, जिससे शिक्षण की गुणवत्ता गिरती है। आज भी कई विश्वविद्यालयों में दशकों पुराना सिलेबस पढ़ाया जा रहा है, जिसका वर्तमान उद्योग और आधुनिक तकनीकों (जैसे डेटा साइंस) से कोई तालमेल नहीं है। सभी राज्यों में ग्रांट इन ऐड नियमों के पूर्ण विश्लेषण और फिर से परिभाषित किए जाने की भी जरूरत है। इसमें अलग अलग मानदंड नजर आ रहे हैं। क्या उचित कदमों से सरकारों द्वारा संस्थानों दी जा रही वित्तीय सहायता को और ज्यादा तर्कसंगत नहीं बनाया जा सकता। उच्च शिक्षा से जुड़े हर शिक्षक को स्वयं लगातार पढऩे वाला व्यक्ति होना चाहिए। जिस किसी शिक्षक ने वर्षों से कोई नई पुस्तक, शोधपत्र या विषय-संबंधी सामग्री गंभीरता से नहीं पढ़ी, उससे विद्यार्थियों में बौद्धिक जिज्ञासा पैदा करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। सुनने में आता है कि कुछेक तो एक बार नोट्स बना लेते हैं और बीस बीस वर्ष छात्रों को वही बासी रोटी परोसते रहते हैं। न खुद अपडेट होते हैं, न छात्रों को अपडेट करते हैं। इस पर सच्चाई क्या है? क्या इससे छात्रों की बौद्धिक क्षमता विकसित होगी।

छात्रों के सर्वांगीण विकास का अर्थ केवल किताबी ज्ञान या अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि उनके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और बौद्धिक पक्षों का संतुलित विकास करना है। यह काम पूरा करने में उच्च शिक्षा संस्थान कामयाब नहीं हो पा रहे हंै। स्तरहीन उच्च शिक्षा के लिए धीमी गति से चल रहे परीक्षा सुधार भी जिम्मेवार हैं। कई जगह सालाना/समेस्टर कॉलेज परीक्षा इतनी औपचारिक बन गई है कि विद्यार्थी थोड़ी-सी तैयारी, मॉडल प्रश्नों और रटने के सहारे परीक्षा पार कर लेते हैं। यदि परीक्षा मूल्यांकन का स्तर गिरता रहेगा तो उच्च शिक्षा की गुणवत्ता भी सार्थकता खो देगी। इसके लिए सुधार कौन करेगा? इसके विकल्प के रूप में कॉलेज -विश्वविद्यालय परीक्षा स्तर पर निरंतर स्टूडेंट मूल्यांकन प्रणाली को शुरू किया जाए। स्तरहीन और हल्की गुणवत्ता की उच्च शिक्षा पर युवाओं में रोजगार और स्वरोजगार कमजोर करने का भी दोष लगाया जा सकता है। क्या यह दोष सही है या फिर गलत है? इस काले सच पर उच्च शिक्षा से जुड़े सभी सरकारी और गैर सरकारी पक्षों को विश्लेषण और दिमागी कसरत करनी चाहिए और दुरुस्त करने के लिए तुरंत आगे आना चाहिए। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता होना बहुत जरूरी है।-डा. वरिंद्र भाटिया

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