सस्ते इलाज के लिए केवल कड़े नियम ही काफी नहीं

हर नागरिक को सरकारी पॉलिसी के मकसद पर सवाल उठाने का संवैधानिक हक है। हाल ही में राज्यसभा में निजी सदस्य विधेयक के रूप में सांसद डा. अजीत गोपछडे ने नैशनल मैडिकल प्राइसिंग एंड रैगुलेशन कमीशन बिल, 2026 पेश किया। मंशा यह कि अस्पताल का एक बिल चंद हफ्तों में परिवार की सारी जमापूंजी चट कर देता है, इसलिए इस बिल का मकसद निष्पक्षता, पारदॢशता और किफायती इलाज है, पर सवाल यह उठता है कि इलाज के लिए जिस गुणवत्ता व पारदर्शिता के भरोसे मरीज हैं, उसे कायम रखे बगैर इलाज सस्ता कैसे होगा? आम लोगों तक सस्ती और उम्दा दवाइयां पहुंचानी हैं तो केवल दाम पर लगाम की कवायद की बजाय सरकारी जन औषधि स्टोरों से दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई जाए।
एक समान दाम व्यावहारिक नहीं : जिला स्तर का नॄसग होम व टॢशयरी केयर अस्पताल एक ही तरह का ऑप्रेशन करते हैं, पर इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टाफ, टैक्नॉलोजी व एमरजैंसी बैकअप में बड़ा फर्क है। एक के पास आई.सी.यू. की बेहद सीमित क्षमता है तो दूसरे के पास 24 घंटे ट्रॉमा सेवा, उन्नत इमेजिंग, एडवांस आई.सी.यू. और इंफैक्शन रोकथाम की मजबूत व्यवस्था। पी.ई.टी. सी.टी. स्कैनर, लीनियर एक्सेलरेटर या रोबोटिक सर्जिकल प्लेटफॉर्म जैसी मशीन ही 5 करोड़ रुपए से अधिक की आती है। औसत एक-समान दाम कम साधन वाले अस्पताल के लिए कमाई और एक एडवांस अस्पताल के लिए घाटे का सौदा है। ऐसे में नए एडवांस और हाईटैक अस्पताल बनने बंद हो जाएंगे। मकसद पारदर्शिता, उचित दाम, क्षमता निर्माण होना चाहिए, न कि कड़ी सख्ती।
29 लाख बैड चाहिएं, हैं सिर्फ 8 लाख : सवाल यह नहीं कि भारत में कितने अस्पताल हैं, बल्कि सवाल यह कि आम आदमी को घर के पास, वक्त पर, किफायती, अच्छा इलाज बिना आॢथक संकट के मिलता है या नहीं। देश में 1.62 लाख सब-हैल्थ सैंटर, 31,000 प्राइमरी हैल्थ सैंटर (पी.एच.सी.), 6000 कम्युनिटी हैल्थ सैंटर (सी.एच.सी.) और 1275 सब डिस्ट्रिक्ट और 767 जिला अस्पताल जैसे बड़े सरकारी नैटवर्क के बावजूद नैशनल हैल्थ पॉलिसी 2017 के तहत प्रति 1000 आबादी के लिए 2 बैड के तय मानक से बहुत पीछे हैं। 145 करोड़ की आबादी के हिसाब से अस्पतालों में करीब 29 लाख बैड चाहिएं जबकि हमारे अस्पतालों की बैड क्षमता सिर्फ 8,18,661 है। यह खाई पाटने को 27,000-30,000 नए पी.एच.सी., 6,000-8,500 सी.एच.सी. और जिला व उपजिला अस्पतालों का अपग्रेडेशन और उसी हिसाब से उपकरण, दवाइयां व जांच सुविधाएं चाहिएं। भारत में 13.88 लाख रजिस्टर्ड एलोपैथिक डॉक्टर और मैडिकल कॉलेजों में एम.बी.बी.एस. की 1.29 लाख सीटें हैं, फिर भी सुपर स्पैशलिस्ट डॉक्टरों का संकट बरकरार है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर देश की जी.डी.पी. का 1.8 प्रतिशत बजट यानी 2025-26 में 6.21 लाख करोड़ रुपए था, जबकि स्वास्थ्य नीति 2017 के तहत जी.डी.पी. का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट में 2.41 लाख करोड़ रुपए की कमी रही। ऐसे में नैशनल मैडिकल प्राइसिंग एंड रैगुलेशन कमीशन बिल जैसी तलवार प्राइवेट हैल्थ सैक्टर पर निर्भर आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी सरकारी स्कीमें भी कमजोर करेगी, क्योंकि 70 प्रतिशत मरीजों का इलाज प्राइवेट अस्पतालों की ओ.पी.डी. में होता है, जबकि 60 प्रतिशत मरीज ऑप्रेशन के लिए प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती होते हैं। हैल्थ सैक्टर पर सख्त नियमों की लगाम इस सैक्टर में न विदेशी पूंजी निवेश होने देगी और न ही देश में मैडिकल टूरिज्म बढ़ेगा। बेहतर रास्ता यही है सरकारी स्वास्थ्य केंद्र इतने बेहतर किए जाएं कि वे प्राइवेट हैल्थ सैक्टर को पछाड़ दें।
विदेशों से सीख : वेनेजुएला में दवाओं के दाम पर लगाम और करेंसी पर कंट्रोल ने वहां स्वास्थ्य सेवाएं ठप्प कर दीं, बड़ी तादाद में स्वास्थ्यकर्मी देश छोड़ गए। दो साल के लिए तय राष्ट्रीय शुल्क सूची के कारण जापान के ज्यादातर अस्पताल घाटे में चले गए। कनाडा की सरकारी फंडिंग वाली स्वास्थ्य सेवाओं में वर्ष 2025 में रैफरल से इलाज तक का औसत इंतजार 28 हफ्ते रहा, जबकि ब्रिटेन में चुनिंदा इलाज की वेटिंग लिस्ट 70 लाख से अधिक है। अकेले इन तथ्यों से यह साबित नहीं होता कि इलाज के लिए लंबा इंतजार प्राइस कंट्रोल से पैदा हुआ, बल्कि इससे यह स्पष्ट होता है कि इलाज की कीमत के अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर व मैडिकल मैन-पावर की क्षमता भी मायने रखती है।
आगे की राह : स्वास्थ्य और शिक्षा बुनियादी जरूरतें हैं, पर इन पर नियंत्रण और नियमों की परतें चढ़ाने से लालफीताशाही और भ्रष्टाचार इनके संसाधन व क्षमता निचोड़ लेते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए तीन पहलुओं पर गौर करना जरूरी है। पहला, सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र को पैमाना बनाइए। हर नागरिक को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध हो, जहां जेब से खर्च बहुत कम हो। जन औषधि स्टोरों का विस्तार हो ताकि सस्ती, गुणवत्ता वाली दवाएं जनता की पहुंच में हों। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को डॉक्टरों, जांच सुविधाओं और नवीनतम उपकरणों से लैस कीजिए ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था गुणवत्ता और सुविधा, दोनों में प्राइवेट हैल्थ सैक्टर से मुकाबला कर सके। दाम सरकारी हुक्म से नहीं, बल्कि मुकाबले से तय होने दीजिए।
दूसरा, निवेश के लिए दरवाजे खोलिए। ग्रामीण और छोटे शहरों व कस्बों के अस्पतालों के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग, टैक्स व वित्तीय रियायतें और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा मिले। स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए विदेशी पूंजी निवेश को प्रोत्साहित कीजिए ताकि भारत को भी मैडिकल टूरिज्म का ठिकाना बनाया जा सके। तीसरा, पारदॢशता लागू हो। अस्पताल क्या वसूल सकते हैं, यह सीमा तय करने से बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिलतीं। अधिक गुणवत्ता वाले अस्पताल बनाकर पब्लिक एवं प्राइवेट हैल्थ सैक्टर में मुकाबले को बढ़ावा देकर बेहतर व किफायती स्वास्थ्य सेवाएं दे सकते हैं।डा. अमृत सागर मित्तल



