प्रदर्शन, हिरासत, रिहाई और फिर प्रदर्शन : विरोध के ‘रिंग-अ-रिंग-ओ-रोजेज’

रिंग -अ-रिंग-ओ-रोजेज, पॉकेट फुल ऑफ पोजेज’, बच्चों की इस तुकबंदी को याद कीजिए। लेकिन यह महज बालगीत नहीं रह गया है। हमारे ‘विकसित भारत’ में विरोध-प्रदर्शन का नया तौर-तरीका कुछ ऐसा बन गया है, प्रदर्शन करो, हिरासत में लिए जाओ, रिहा होओ और फिर प्रदर्शन करो। पिछले पखवाड़े मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और अब ‘सत्ता परिवर्तन’ की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस और उसके सहयोगियों तथा माकपा के छात्र संगठन ए.आई.एस.ए. की दिल्ली पुलिस के साथ लगातार झड़पों ने इस आवाजाही के चक्र को लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की स्थिति से जुड़े एक बड़े सवाल में बदल दिया है।
असली सवाल यह है कि विरोध करने के अधिकार को संवैधानिक स्वतंत्रता के रूप में संरक्षण मिल रहा है या उसे तेजी से कानून-व्यवस्था की समस्या मान लिया गया है? यदि नागरिकों को विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है, तो उसके इस्तेमाल पर राज्य की कठोर कार्रवाई क्यों होती है? ऐसी कार्रवाई का उद्देश्य क्या है, ङ्क्षहसा रोकना या विरोध को लोगों की नजरों से ओझल करना? यदि सरकार आश्वस्त है, तो अपनी आलोचना में उठती आवाजों से उसे बेचैनी क्यों होनी चाहिए? असहमति अपराध नहीं, मतभेद देशद्रोह नहीं और प्रदर्शनकारी अपने-आप सरकार के शत्रु नहीं हो जाते। यह सही है कि संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन ये स्वतंत्रताएं निरपेक्ष नहीं हैं। संविधान लोक-व्यवस्था, भारत की संप्रभुता और अखंडता सहित निर्धारित आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंधों की अनुमति देता है।
सरकार का वैध दायित्व है कि वह शांतिपूर्ण असहमति के लिए जगह बनाए, कानून-व्यवस्था कायम रखे, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करे, ङ्क्षहसा रोके और जन-सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली आवश्यक सेवाओं में बाधा न आने दे। उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि एक नागरिक की स्वतंत्रता दूसरे नागरिक के लिए दु:स्वप्न न बन जाए। लेकिन केवल असुविधा, आलोचना या सरकार की किरकिरी को असहमति दबाने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। जहां हिरासत में लेने के वैधानिक आधार हों, वहां ऐसी कार्रवाई उचित हो सकती है लेकिन जब बार-बार टकराव हो और कोई सार्थक समाधान न निकले, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। हिरासत संवाद का विकल्प नहीं है। इसी तरह, किसी को हिरासत में लेने के बाद रिहा कर देना इस बात का प्रमाण नहीं कि सरकार ने स्थिति को समझदारी से संभाला। यदि प्रदर्शनकारी इसलिए लौट आते हैं क्योंकि उनकी चिंताओं का जवाब नहीं मिला, तो यह चक्र चलता रहेगा।
दरअसल, जरूरत से ज्यादा कठोर कार्रवाई का उलटा असर भी हो सकता है। कोई स्थानीय प्रदर्शन नागरिक स्वतंत्रताओं, पुलिस के आचरण और सरकार की सुनने की इच्छा पर व्यापक बहस का रूप ले सकता है। ऐसे में मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और ध्यान इस बात पर केंद्रित हो जाता है कि अधिकारियों ने प्रदर्शन से कैसे निपटा। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों को भी समझना चाहिए कि प्रदर्शन का अधिकार कानून तोडऩे, दूसरों को धमकाने, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या पूरे शहर को बंधक बनाने का लाइसैंस नहीं है। संवैधानिक स्वतंत्रताओं के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। सड़क जाम होने से एंबुलैंस अस्पताल नहीं पहुंच पाती। लंबे समय तक किसी स्थान पर कब्जा रहने से लोगों की आजीविका प्रभावित होती है, काम पर जाने वालों को परेशानी होती है और दुकानदारों का कारोबार घटता है। ङ्क्षहसा और धमकी से आम नागरिक भयभीत हो सकते हैं। ये वास्तविक चिंताएं हैं, जिन्हें प्रदर्शनकारी महज बहाना कहकर खारिज नहीं कर सकते। लेकिन यही तर्क दूसरी दिशा में भी लागू होता है। यदि नागरिकों को दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए, तो सरकार को भी उनकी संवैधानिक स्वतंत्रताओं का आदर करना होगा।
नि:संदेह, जब प्रदर्शन लोक-व्यवस्था के लिए खतरा बनें, आवश्यक सेवाएं बाधित करें या रोजमर्रा के काम में लगे लाखों नागरिकों को परेशानी पहुंचाएं, तो सरकार मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। इसके अलावा, कभी-कभी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में असामाजिक तत्व, उपद्रवी और अपराधी भी घुस आते हैं। वे अपने हिसाब चुकाने, ङ्क्षहसा भड़काने या अव्यवस्था फैलाने के लिए भीड़ का इस्तेमाल कर सकते हैं। कानून तोडऩे वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अधिकारियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। एक रास्ता यह है कि प्रशासन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थल, बातचीत से तय किए गए मार्ग, जरूरत पडऩे पर उचित समय-सीमा और स्पष्ट शर्तों की व्यवस्था करे। प्रतिबंध वास्तविक और विशिष्ट जोखिमों पर आधारित होने चाहिएं, अस्पष्ट आशंकाओं पर नहीं। जहां किसी सभा से वास्तविक खतरा पैदा हो, वहां हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है। उद्देश्य परस्पर प्रतिस्पर्धी अधिकारों में संतुलन बनाना होना चाहिए, किसी एक अधिकार को मिटा देना नहीं।
इसलिए चुनौती विरोध के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दायित्व, दोनों के बीच न्यायसंगत संतुलन बनाने की है। प्रशासन को शांतिपूर्ण असहमति जताने वालों और उपद्रवियों, वास्तविक शिकायतों और सुनियोजित उकसावे तथा वैध सभा और जानबूझकर की गई अराजकता के बीच अंतर करना होगा। प्रदर्शनकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने आंदोलन को उन तत्वों के हाथों में न जाने दें, जो उसकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हैं। लोकतंत्र शासन करने वालों से संयम और विरोध करने वालों से जिम्मेदारी की अपेक्षा करता है।-पूनम आई. कौशिश



