त्यौहारी सीजन : खुशियों, अपनेपन और जेब की थोड़ी चिंता का समय

भारत में त्यौहारी सीजन में एक अलग ही जादू होता है। जैसे ही दशहरा आता है, माहौल बदलने लगता है। बाजार रंग-बिरंगे हो जाते हैं, दुकानें रोशनी से सज जाती हैं, घरों की साफ-सफाई और तैयारियां शुरू हो जाती हैं तथा परिवार दीवाली की योजनाएं बनाने लगते हैं। हवा में एक उत्साह, एक उत्सुकता और यह अहसास घुल जाता है कि रोजमर्रा के तमाम संघर्षों के बावजूद जिंदगी के पास देने के लिए कुछ बहुत खूबसूरत है।
त्यौहारी सीजन सिर्फ धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। यह लोगों के एक साथ आने, लंबे अरसे बाद परिवारों के मिलने, दोस्तों के साथ बैठने, बच्चों के उपहारों का इंतजार करने और हर किसी के सजने-संवरने, अच्छा खाने और जश्न मनाने का एक बहाना ढूंढने का समय है। कुछ हफ्तों के लिए जिंदगी थोड़ी और रोशन लगने लगती है और आम से आम दिन भी उत्सव के रंग में रंग जाते हैं। दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और कई परिवारों के लिए यह उन उत्सवों की शुरुआत होती है, जो दीवाली तक चलते हैं। उत्साह धीरे-धीरे बढ़ता है क्योंकि लोग कपड़े, उपहार, मिठाइयां, सजावटी लाइटें और घर का सामान खरीदना शुरू कर देते हैं। बाजारों में भीड़ उमड़ पड़ती है, दुकानदारों की उम्मीदें जाग उठती हैं और रेस्तरां, होटल व पार्टी स्थल भीड़ का स्वागत करने की तैयारी में जुट जाते हैं। फिजा में एक ऐसी ऊर्जा होती है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है, पर महसूस करना बेहद आसान।
खरीदारी बेशक सबसे बड़े आकर्षणों में से एक बन जाती है। कुछ लोगों के लिए इसका मतलब दीवाली के लिए एक नई पोशाक खरीदना होता है। दूसरों के लिए यह पुराना घरेलू उपकरण बदलने, घर के लिए कुछ खास खरीदने या रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए उपहार लेने का सालाना मौका होता है। बच्चों की अपनी पसंद की सूची होती है और माता-पिता अक्सर बच्चों की चाहत और परिवार के बजट के बीच सामंजस्य बिठाते नजर आते हैं। साथ मिलकर खरीदारी करने का भी अपना एक अलग आनंद है। मां-बेटियों का कपड़ों को देखना, पतियों का दुकानों के बाहर धैर्यपूर्वक इंतजार करना, दोस्तों का एक-दूसरे को राय देना कि क्या खरीदा जाए और परिवारों का यह तय करने में बहस करना कि कौन सी मिठाई घर ले जाई जाए, ये सब जाने-पहचाने दृश्य हैं। कभी-कभी खरीदारी में उम्मीद से ज्यादा समय लग जाता है, लोग चिड़चिड़े हो जाते हैं और कोई न कोई भीड़ की शिकायत जरूर करता है। फिर भी, यही छोटे-छोटे पल अक्सर वे यादें बन जाते हैं, जिन पर हम बाद में हंसते हैं।
दीवाली विशेष रूप से अपनी एक अलग गर्माहट लेकर आती है। घर साफ किए जाते हैं, दीये सजाए जाते हैं, दरवाजों पर फूल लगते हैं और रोशनियां बालकनियों व आंगनों का रूप बदल देती हैं। रसोई में तैयारियां तेज हो जाती हैं, मिठाइयों का आदान-प्रदान होता है और रिश्तेदारों का आना शुरू हो जाता है। यहां तक कि जो परिवार साल के बाकी दिनों में मुश्किल से एक साथ बैठ पाते हैं, वे भी एक ही मेज के इर्द-गिर्द जुटने की पूरी कोशिश करते हैं। बहुत से लोगों के लिए सबसे बड़ा सुख कोई महंगा तोहफा या भव्य सजावट नहीं होती। असली खुशी सबको एक ही छत के नीचे देखने में होती है। दादा-दादी और नाना-नानी अपने पोते-पोतियों को त्यौहार का आनंद लेते देखते हैं, भाई-बहन मिलकर किस्से सांझे करते हैं और चचेरे-ममेरे भाई-बहन उस सहज दोस्ती को फिर से जी लेते हैं, जिसे दूरियों और व्यस्त दिनचर्या ने रोक रखा था। ऐसी दुनिया में, जहां हर कोई एक काम से दूसरे काम की ओर भाग रहा है, ये अवसर हमें याद दिलाते हैं कि रिश्तों को समय, ध्यान और सांझे अनुभवों की जरूरत होती है।
त्यौहारी सीजन दोस्ती के नाम भी होता है। रात के खाने, दोपहर के भोजन, ताश की पार्टियों और मेल-मिलाप के न्यौते आने लगते हैं। जो दोस्त महीनों से नहीं मिले, वे अचानक एक-दूसरे के लिए वक्त निकाल लेते हैं। घर बातचीत, ठहाकों, संगीत और इस जाने-पहचाने सवाल से भर जाते हैं कि कौन क्या ला रहा है। कुछ लोगों के लिए ताश की सालाना पार्टी अपने आप में एक परंपरा जैसी होती है, जिसमें खेल के साथ दोस्ताना मुकाबला, हंसी-मजाक और ढेर सारी गपशप चलती है। बेशक, त्यौहारी पाॢटयां भव्य रूप ले सकती हैं। लोग कपड़ों, गहनों, उपहारों, खाने-पीने और सजावट पर खर्च करते हैं, कभी इसलिए क्योंकि उन्हें सच में आतिथ्य सत्कार पसंद होता है और कभी इसलिए क्योंकि वे दूसरों की बराबरी करने का दबाव महसूस करते हैं। लेकिन क्या हमें सचमुच ऐसा करने की जरूरत है?
सच तो यह है कि त्यौहारी सीजन ऐसे समय में आता है जब कई परिवार पहले से ही बढ़ती महंगाई का दबाव झेल रहे होते हैं। किराने का सामान, खाना पकाने का तेल, दालें, आटा, सब्जियां, दूध, पैट्रोल, परिवहन और रोजमर्रा की सेवाएं, सब परिवार के बजट में अपना हिस्सा मांगते हैं। परिवार चाहे दिल खोलकर जश्न मनाना चाहें, फिर भी उन्हें यह हिसाब लगाना पड़ता है कि वे कितना खर्च कर सकते हैं। महंगाई त्यौहारों के आनंद को चुपके से कम कर सकती है। जिस परिवार ने पिछले साल एक निश्चित रकम खर्च की थी, वह पा सकता है कि उसी खरीदारी के लिए इस साल कहीं ज्यादा पैसे लग रहे हैं। मिठाई का एक डिब्बा, दोस्तों के लिए एक सादा डिनर या सजावट की कुछ चीजें अलग-अलग देखने में किफायती लग सकती हैं लेकिन मिलकर वे मासिक बजट पर भारी पड़ जाती हैं।
कोई भी बच्चों को निराश नहीं करना चाहता, किसी रिश्तेदार के घर खाली हाथ नहीं जाना चाहता या हर सामाजिक न्यौते को ठुकराना नहीं चाहता। साथ ही, स्कूल की फीस, बिजली के बिल, इलाज के खर्चे, घर की जरूरतें और बचत जैसी चीजों का भी ध्यान रखना होता है। नतीजतन, कई परिवारों को यह कठिन फैसला लेना पड़ता है कि कहां खर्च करें और कहां कटौती करें। फिर भी, शायद यह इस त्यौहार के असली मायने की ओर लौटने का एक अवसर है। किसी उत्सव को उपहारों की संख्या, कपड़ों की कीमत या किसी पार्टी पर हुए खर्च से मापने की जरूरत नहीं। दोस्तों के साथ घर पर बना सादा खाना भी किसी महंगे रेस्तरां के डिनर जितना ही यादगार हो सकता है। सादी सजावट भी उतनी ही गर्माहट पैदा कर सकती है, जितना कि कोई भव्य प्रदर्शन। जिम्मेदारी से जश्न मनाने को लेकर भी जागरूकता बढ़ रही है। स्थानीय उत्पादों को चुनना, छोटे व्यापारियों का समर्थन करना, खाने की बर्बादी रोकना और प्लास्टिक की सजावट कम करना त्यौहारों को और अधिक अर्थपूर्ण बना सकता है।
आखिरकार, दशहरा और दीवाली हमें उम्मीद, नएपन, उदारता और बुराई पर अच्छाई की जीत की याद दिलाते हैं। उनका महत्व इस बात में नहीं है कि हम कितना खर्च करते हैं, बल्कि उस भावना में है, जिससे हम जश्न मनाते हैं। प्यार, अपनापन और साथ रहने की खुशी ही इसे असली मायने देती है। इसलिए घरों को जगमगाने दें, बाजारों में चहल-पहल रहने दें, दोस्तों को मिलने दें और ठहाकों को गूंजने दें। महंगाई जेब पर भारी पड़ सकती है और इस साल बजट पर थोड़ा और विचार करना पड़ सकता है लेकिन इसे अपनी खुशी छीनने न दें।-देवी एम. चेरियन



