तकनीकी

इंटरनैट की जंग में आम आदमी का कितना फायदा?

पिछले कुछ समय से देश में सस्ते इंटरनैट ने भारतीयों के जीवन में बड़ा बदलाव किया है। शिक्षा, मनोरंजन, बैंकिंग, भुगतान और खरीदारी पहले से अधिक सुलभ हुए हैं लेकिन इंटरनैट की बढ़ी सुविधा के साथ कुछ नई समस्याएं भी आई हैं। मात्र कम कीमत मिलने से उपभोक्ता का हित पूरा नहीं हुआ, बल्कि वह नई खरीदारी और उसके उपभोग का मुख्य स्रोत बन गया है, क्योंकि उसकी डिजिटल गतिविधियां, पसंद और व्यवहार कंपनियों के लिए कारोबारी जानकारी बनते जा रहे हैं।

इससे वह इंटरनैट की सुविधा के माध्यम से अनजाने में अपने व्यवहार का ऐसा विवरण भी उपलब्ध करा रहा है, जिसका इस्तेमाल उसे ही अधिक खरीदारी के लिए प्रेरित करने में हो रहा है। जियो और स्टारलिंक की प्रतिस्पर्धा इसलिए केवल दो उद्योगपतियों की कारोबारी लड़ाई नहीं है। यह भारतीय उपभोक्ता के वास्तविक लाभ, उसकी आॢथक स्थिति और उसकी निजता से जुड़ा प्रश्न भी है। भारत में इंटरनैट का विस्तार नई सदी के आरंभ से हुआ लेकिन 2016 में जियो के प्रवेश ने दूरसंचार बाजार की तस्वीर बदल दी। आरंभिक मुफ्त सेवाओं ने इंटरनैट को देश की बड़ी आबादी तक पहुंचाया। इसके बाद घरेलू बाजार में तीव्र प्रतिस्पर्धा ने डाटा की कीमतें घटाईं और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा दिया। नोटबंदी के बाद डिजिटल भुगतान का चलन बढ़ा, जबकि कोरोना महामारी ने ऑनलाइन शिक्षा, घर से काम और ऑनलाइन खरीदारी को व्यापक रूप से स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इलैक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2022 से 2023 में भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का आकार 31.64 लाख करोड़ रुपए था, जो राष्ट्रीय आय का 11.74 फीसदी था। डिजिटल भुगतान में बदलाव का पैमाना भी विशाल है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के अनुसार, सितम्बर 2026 में यू.पी.आई. के माध्यम से 24.07 अरब का लेनदेन हुआ, जिनका कुल मूल्य लगभग 29.37 लाख करोड़ रुपए था। अब कुछ बुनियादी प्रश्न उठते हैं। क्या डिजिटल अर्थव्यवस्था का बढ़ता कारोबार आम परिवार की आय और बचत भी बढ़ा पाया है? क्या आसान खरीदारी और छूट के आकर्षक प्रस्तावों ने लोगों को अधिक खर्च करने के लिए प्रेरित किया है? क्या ऑनलाइन शिक्षा से पढ़ाई सस्ती हुई है? क्या ऑनलाइन खरीदारी से छोटे उद्यमियों की शुद्ध आय बढ़ी है? क्या ओ.टी.टी. की सदस्यता ने परिवारों का कुल खर्च बढ़ाया है?

एक क्लिक पर खरीदारी, व्यक्तिगत पसंद के अनुसार दिखाए जाने वाले विज्ञापन और सीमित समय के प्रस्ताव लोगों को ऐसी वस्तुएं खरीदने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, जिनकी उन्हें तत्काल आवश्यकता नहीं होती। आय में वृद्धि के बिना खर्च बढ़ता है, तो बचत प्रभावित हो सकती है। महंगाई, बेरोजगारी, कर्ज और घरेलू जरूरतें भी बचत को प्रभावित करती हैं। इसलिए डिजिटल सेवाओं को इसका एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। फिर भी यह पूछना उचित है कि डिजिटल बाजार नागरिक की वित्तीय समझ और स्वतंत्र निर्णय क्षमता को मजबूत कर रहा है या उसे अधिक उपभोग की ओर धकेल रहा है। कारोबार और लेन-देन में वृद्धि आॢथक गतिविधियों का संकेत है लेकिन अपने आप में यह समाज या आम आदमी की आॢथक समृद्धि का प्रमाण नहीं है। अगर नागरिक की डिजिटल गतिविधियां कंपनियों को अधिक सटीक विपणन और अधिक मुनाफा कमाने में मदद करती हैं, तो क्या लोगों को यह जानने और तय करने का वास्तविक अधिकार नहीं होना चाहिए कि उनकी जानकारी का उपयोग कैसे किया जाए? 

आज नागरिक अपनी आय से सेवाएं खरीदता है और अपने व्यवहार से कंपनियों को बाजार संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी देता है। उसकी डिजिटल गतिविधियों से पैदा होने वाले आॢथक मूल्य का बड़ा हिस्सा कारोबारी संस्थाओं को मिल सकता है, जबकि नागरिक की भूमिका केवल ग्राहक तक सीमित रह जाती है। यह प्रश्न केवल निजता का नहीं, बल्कि आॢथक विकास के लाभों के वितरण का भी है। अगर बड़ी कंपनियां नागरिक के व्यवहार और उसकी जरूरतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर अपना कारोबार बढ़ाती हैं, तो यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि इस प्रक्रिया में नागरिक के अधिकार कमजोर न पड़ें और आॢथक असमानता बढ़ाने वाली प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन न मिले।

जियो का प्रस्तावित आई.पी.ओ. इस बहस को एक और आयाम देता है। यहां प्रश्न केवल निवेश का नहीं है। क्या इस आई.पी.ओ. में निवेश करने वाले आम आदमी की बचत को उचित प्रतिफल मिल सकेगा? क्या कंपनी का मूल्यांकन उसकी भविष्य की कमाई के अनुरूप है? क्या ग्राहकों को तकनीकी प्रगति का लाभ उचित कीमतों के रूप में प्राप्त होगा? इसलिए इस आई.पी.ओ. का मूल्यांकन केवल लोकप्रियता से नहीं, बल्कि भविष्य की कमाई, उचित मूल्यांकन, जोखिम और पारदर्शिता के आधार पर होना चाहिए। इंटरनैट ने जीवन को आसान बनाया है, पर उसकी सफलता तभी सार्थक होगी जब देश की डिजिटल व्यवस्था में भारतीय नागरिक को यह भरोसा हो कि उसकी जानकारी केवल इसलिए कारोबारी संसाधन नहीं बन जाएगी कि वह इंटरनैट का उपयोग करता है। इसलिए अब डिजिटल क्रांति का अगला चरण केवल अधिक डाटा, अधिक लेनदेन और अधिक मुनाफे का नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा का होना चाहिए।-पी.एस. वोहरा

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